तिलहन में चीन की क्रांति, भारत तरल गुड़ में उलझा: भारत के कृषि अनुसंधान पर सवाल
इलस्ट्रेशन: रितिका बोहरा / सीएसई

तिलहन में चीन की क्रांति, भारत तरल गुड़ में उलझा: भारत के कृषि अनुसंधान पर सवाल

जहां एक ओर फसलों की पैदावार घटती जा रही है और खासकर तिलहन का आयात आसमान छू रहा है, वहीं दूसरी ओर भारत का विशाल कृषि अनुसंधान नेटवर्क बड़ी कामयाबी हासिल करने में नाकाम रहा है
Published on
सारांश
  • चीन ने सरसों के लिए 20के सॉलिड-फेज जीन चिप ‘झोंगक्सिन ऑयल नंबर 1’ विकसित कर तिलहन उत्पादन में क्रांतिकारी बढ़त हासिल की।

  • इससे चीन की आयात पर निर्भरता घटेगी और स्मार्ट ब्रीडिंग को बढ़ावा मिलेगा।

  • इसके विपरीत भारत का कृषि अनुसंधान तरल गुड़ जैसे गैर-जरूरी नवाचारों में उलझा है, जबकि तिलहन आत्मनिर्भरता और मजबूत रिसर्च रणनीति की तत्काल जरूरत है।

  • भारत का आईसीएआर ढीले-ढाले ढांचे, पेटेंट बाधाओं और तरल गुड़ जैसे मामूली प्रोजेक्टों में फंसा है।

  • जबकि देश को तिलहन मिशन, मजबूत नीतियों और किसान-केंद्रित रणनीति की जरूरत है।

यदि कोई इस बात को समझना चाहे कि किसी देश के विज्ञान की दिशा और दशा कैसी है तो मई 2026 के शुरुआती हफ्तों से भारत और चीन की विरोधाभासी उपलब्धियों के उदाहरण साफ तौर पर मिल जाते हैं। ये दोनों ही उदाहरण कृषि विज्ञान के क्षेत्र से जुड़े हैं। जहां एक ओर चीन के अनुसंधान और विकास से जुड़ी बड़ी कामयाबी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरीं, वहीं भारत की उपलब्धि को घरेलू अखबारों के अंदरूनी पन्नों में महज एक छोटी सी रिपोर्ट के रूप में जगह मिल सकी।

ऐसे समय में जब जलवायु परिवर्तन, जल संसाधनों की भारी कमी और घटती पैदावार ने दुनियाभर में कृषि अनुसंधान को केंद्र में ला दिया है, तब इन दोनों घटनाक्रमों के बीच का अंतर हैरान करने वाला है। सरसों की खेती में सुधार को लेकर चीन ने जो असाधारण सफलता हासिल की है, वह एक ऐसा निर्णायक मोड़ साबित होगी, जो आयात पर उसकी निर्भरता खत्म कर देगी और उसकी तकनीक को विश्व स्तरीय बना देगी। वहीं, इस दौरान भारत गैर-जरूरी मुद्दों में उलझा हुआ दिखाई दिया, जैसे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के एक संस्थान द्वारा “तरल गुड़” का विकास करना। गौरतलब है कि तरल गुड़ बाजार में दर्जनों कंपनियों के पास पहले से ही प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।

अगर आपको यह तुलना ठीक नहीं लगती है, तो मेरे पास इसके लिए वाजिब तर्क मौजूद हैं। दरअसल, पिछले कई दशकों से आईसीएआर ने कोई खास उपलब्धि हासिल नहीं की है, सिवाय पिछले साल विकसित की गई जीनोम-संपादित (जीई) धान की दो किस्मों के। और इससे भी भारत के किसानों को नाममात्र का ही लाभ पहुंचा है, क्योंकि इन जीनोम-संपादित (जीई) किस्मों को व्यवसायिक खेती के लिए अब तक जारी नहीं किया गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस जीनोम-संपादित धान को पेटेंटेड क्रिस्पर (सीआरआईएसपीआर) टूल्स की मदद से विकसित किया गया था, जिनका उपयोग केवल प्रयोगशाला अनुसंधान (लेबोरेट्री रिसर्च) के लिए ही किया जा सकता है। इस शोध के व्यवसायिकरण के लिए पेटेंट धारक को भारी-भरकम शुल्क का भुगतान करना होगा। हालांकि, दलहन (दालों) सहित विभिन्न फसलों में जीनोम एडिटिंग के इस्तेमाल की बड़ी-बड़ी योजनाएं घोषित की गई हैं, लेकिन एडिटिंग टूल्स के अभाव के कारण इस दिशा में बात आगे नहीं बढ़ पाई है। ऐसे में हमें आईसीएआर-गन्ना प्रजनन संस्थान तरल गुड़ की बड़े पैमाने पर लाइसेंसिंग करके इसे बढ़ावा देने के लिए तेजी से की जा रही कोशिशों से ही संतोष करना पड़ रहा है। लेकिन, आखिर इसकी जरूरत क्यों पड़ी? तरल गुड़ तो पहले से ही बाजार में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। वहीं दूसरी तरफ, सरसों उत्पादन के क्षेत्र में चीन की यह प्रगति बेहद महत्वपूर्ण है। सरसों चीन की प्रमुख तिलहन फसल है, जो अब तक पूरी तरह से मौसम पर निर्भर पारंपरिक तौर-तरीकों से उगाई जाती रही है। लेकिन, यह नई तकनीक चीन को “स्मार्ट ब्रीडिंग” की ओर ले जाती है। यह कदम वैश्विक बीज आपूर्तिकर्ताओं के एकाधिकार को समाप्त कर देगा, इसलिए दुनिया भर की प्रमुख कृषि पत्रिकाओं और वेबसाइटों पर भी इसकी चर्चा हो रही है। आखिर वह बड़ी सफलता क्या है, जिसने इतनी बड़ी हलचल पैदा कर दी है?

मई के मध्य में चीन के “साइंस एंड टेक्नोलॉजी डेली” ने खबर दी कि जियांग्शी कृषि विज्ञान अकादमी ने हुआझोंग कृषि विश्वविद्यालय और सूजौ लासुओ बायोचिप टेक्नोलॉजी कंपनी के सहयोग से राई (ब्रेसिका नेपस) के लिए आधिकारिक तौर पर एक “20के सॉलिड-फेज जीन चिप” जारी की है, जिसका कोडनेम “झोंगक्सिन ऑयल नंबर 1” है।

बाजार में किसी नई और आधुनिक तकनीक को लाने का यह चीन का एक खास तरीका है। इसमें बड़े सरकारी रिसर्च संस्थान और प्राइवेट कंपनियां मिलकर काम करते हैं। इससे किसी भी नई खोज को जल्दी से लागू करने में मदद मिलती है। खबर में इस तकनीक को विकसित करने के दिलचस्प सफर की जानकारी भी दी गई है। इस तकनीक की वजह से अब चीन को बाहर से महंगा तिलहन और खाने का तेल कम मंगाना पड़ेगा। यह रिपोर्ट दिखाती है कि इस सफर के दौरान कई बड़ी नाकामियों के बावजूद टीम ने हार नहीं मानी

और 6 साल में आखिर कैसे सफलता हासिल की। रिपोर्ट के अनुसार, चीन की रिसर्च टीम ने प्रयोगों की 1,600 से ज्यादा नोटबुक्स तैयार कीं। उन्होंने 2,700 से ज्यादा रिसर्च रिपोर्ट लिखीं और 1 करोड़ से अधिक स्कैनिंग तस्वीरें इकट्ठा कीं।

खेती को फिर से बेहतर बनाने के लिए भारत को एक मजबूत रिसर्च और सटीक रणनीति की जितनी जरूरत आज है, उतनी पहले कभी नहीं थी

एक समय ऐसा भी था, जब इस रिसर्च के फेल होने की संभावना 99.9 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। लेकिन असली कामयाबी पिछले साल अप्रैल में मिली। 23 अप्रैल को सरसों उत्पादन सुधार परिषद और चीन की मुख्य कृषि अकादमी चाइनीज अकैडमी ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेस (सीएएएस) की एक बैठक में इसके शानदार नतीजे सामने रखे गए। सुइचुआन काउंटी के 400 हेक्टेयर बड़े खेत में इसका ट्रायल किया गया था। यहां साल में तीन फसलें (धान-धान-सरसों) उगाने के नए तरीके और “झोंगयु जाओ नंबर 1” नाम की नई किस्म ने रिकॉर्ड पैदावार दी।

इन सब बातों को बताने का मकसद यह समझाना है कि चीन ने इस प्रोजेक्ट पर कितनी योजना बनाकर और बड़े पैमाने पर काम किया है। यह इस बात से भी पता चलता है कि इसमें कई बड़े संस्थान शामिल थे। इसके अलावा, यह दिखाता है कि ऐसे जरूरी अभियानों में नए और युवा वैज्ञानिकों की कितनी जरूरत होती है। एक और खास बात इस टीम के लीडर की काबिलियत और उनकी बड़ी साख है। इस पूरे प्रोजेक्ट के हेड “वांग हानझोंग” थे। वह सरसों जेनेटिक्स के बड़े इंजीनियर हैं और साथ ही सीएएएस के उपाध्यक्ष भी हैं। दुख की बात यह है कि हमारे आईसीएआर के पास न तो इतनी गहराई है और न ही अलग-अलग विषयों के ऐसे विशेषज्ञ, जिन्हें चीन अपने खास प्रोजेक्ट्स के लिए एक साथ काम पर लगा देता है।

आईसीएआर में ढीले-ढाले कामकाज और हाइरार्की सिस्टम की वजह से कोई ढंग की रिसर्च हो पाना लगभग नामुमकिन सा हो गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यहां कभी इस बात की जांच (परफॉर्मेंस ऑडिट) ही नहीं हुई कि किसने कैसा काम किया है। इस संस्था के कामकाज को सुधारने की जब भी कोशिश हुई, उसे वहां के कुछ ताकतवर वैज्ञानिकों और सरकारी अफसरों के गुट ने मिलकर रोक दिया। वे सब मिलकर इस व्यवस्था को चलाते हैं। आज मौसम के बदलते मिजाज और मिट्टी की कम होती ताकत की वजह से हमारी खेती पर बड़ा संकट है। इसलिए, खेती को फिर से बेहतर बनाने के लिए भारत को एक मजबूत रिसर्च और सटीक रणनीति की जितनी जरूरत आज है, उतनी पहले कभी नहीं थी। खासकर तिलहन के क्षेत्र पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि बाहर से मंगाए जाने वाले तेल का खर्च बहुत तेजी से बढ़ रहा है, जिसे संभालना अब मुश्किल होता जा रहा है। प्रधानमंत्री को आगे बढ़कर कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। उनका लोगों से सिर्फ यह अपील करने से काम नहीं चलेगा कि खाने का तेल कम इस्तेमाल करें, क्योंकि देश की एक बहुत बड़ी आबादी ऐसी है जो खाने का तेल बमुश्किल खरीद पाती है, तेल पर फिजूलखर्ची करना तो बहुत दूर की बात है। लेकिन इसके बावजूद, देश में तेल की कुल खपत लगातार बढ़ रही है।

पिछले 11 सालों में भारत में बाहर से मंगाया जाने वाला वनस्पति तेल दोगुना हो गया है। साल 2013-14 में यह 79 लाख टन था, जो 2024-25 में बढ़कर 1 करोड़ 64 लाख टन हो गया। अगर पैसों के लिहाज से देखें तो यह उछाल और भी बड़ा है। डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत लगातार गिरने की वजह से यह खर्च 7.2 अरब डॉलर से बढ़कर 20.8 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। नरेंद्र मोदी को भी ठीक वैसा ही कदम उठाने की जरूरत है, जैसा 1980 के दशक में राजीव गांधी ने किया था। राजीव गांधी ने तिलहन पर एक “टेक्नोलॉजी मिशन” शुरू किया था। उन्होंने तकनीकी दिग्गजों और इस क्षेत्र के विशेषज्ञों को एक साथ जोड़ा। साथ ही उन्होंने वैज्ञानिकों और सरकारी अफसरों को एक साफ जिम्मेदारी दी कि वे भारत को खाने के तेल के मामले में आत्मनिर्भर बनाने की योजना तैयार करें। उस समय भारत हर साल करीब 1 अरब डॉलर का तेल बाहर से मंगाता था। नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड के मुखिया रहे महान वर्गीज कुरियन और तकनीकी जानकार सैम पित्रोदा जैसे दिग्गजों के मार्गदर्शन में राजीव गांधी ने इस असंभव काम को मुमकिन कर दिखाया था।

इतिहास में यह पहला और इकलौता मौका था, जब भारत खाने के तेल के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर बना। इस बात को पिछले साल खुद मौजूदा सरकार ने भी स्वीकार किया है। साल 1990 तक आते-आते देश की हालत यह हो गई थी कि भारत बाहर से तेल मंगाने के बजाय, हर साल 60 करोड़ डॉलर की खल दूसरे देशों को बेचने (निर्यात करने) लगा था। यह बड़ा और चमत्कारी बदलाव मुख्य रूप से कुछ खास वजहों से मुमकिन हुआ था। जैसे ज्यादा पैदावार देने वाली बीजों की किस्मों का इस्तेमाल करना, खेती के सही तरीके अपनाना, बाजार की कीमतों पर सख्त नजर रखना और छोटे किसानों को सही मदद देना।

वर्गीज कुरियन ने बाद में याद करते हुए बताया था कि इस मिशन का सबसे जरूरी हिस्सा बाजार की व्यवस्था को सुधारना था। ऐसा इसलिए किया गया ताकि फसल उगाने वाले छोटे किसानों को बिचौलिए या तेल के बड़े कारोबारी धोखा न दे सकें और उन्हें न लूट सकें। अब मोदी सरकार ने भी ठीक इसी मकसद के साथ अपना “राष्ट्रीय खाद्य तेल-तिलहन मिशन” शुरू किया है, ताकि साल 2030-31 तक भारत तेल के मामले में आत्मनिर्भर हो सके। अगर सरकार भी उसी बड़ी और दूरदर्शी सोच पर चले जो राजीव गांधी ने दिखाई थी, तो यह बहुत अच्छा होगा। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सरकार व्यापारियों के बजाय देश के गरीब किसान को इस पूरे प्रोजेक्ट के केंद्र में रख पाएगी?

Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in