मौसम की मार और इथेनॉल की घटती मांग से बिहार के मक्का किसानों की मुश्किलें बढ़ीं

इथेनॉल प्लांट लगने के बाद बिहार में मक्का का उत्पादन बढ़ गया, लेकिन एक ओर जहां मक्के की मांग घट गई, रही-सही कसर मौसम ने भी पूरी कर दी
20 मार्च को हुई भारी बारिश में बिहार के सुपौल जिला स्थित बीना पंचायत क्षेत्र में मक्के की फसल को काफी नुकसान हुआ है। फोटो: राहुल कुमार गौरव
20 मार्च को हुई भारी बारिश में बिहार के सुपौल जिला स्थित बीना पंचायत क्षेत्र में मक्के की फसल को काफी नुकसान हुआ है। फोटो: राहुल कुमार गौरव
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“12 बीघा में लगा हुआ मकई आधे से ज्यादा बर्बाद हो गया है। खाद, पटवन, बीज, बुआई और दवाई मिलाकर लगभग एक बीघा में 12,000 रुपए खर्च हुआ है। हम जैसे बटाईदार किसान के लिए यह मौत से कम नहीं है।” यह कहना है, बिहार के सहरसा जिला के कोसी दियारा स्थित सलखुआ प्रखंड के कोटुम्बर के वार्ड नंबर 6 के रहने वाले सोती लाल का।

वहीं सीमांचल स्थित पूर्णिया जिला के कोढा शीशिया के रहने वाले भोला कुमार बताते हैंं, “तेज आंधी, तूफान, ओलावृष्टि और बारिश से खेत में लगी गेहूं और मक्के की फसलें पूरी तरह बर्बाद हो गई। कुछ ही महीनों में फसल तैयार होनी थी लेकिन पहले ही टूट कर गिर गई है।”

दरअसल 20 मार्च 2026 को बिहार में मौसम के बदले मिजाज ने भारी तबाही मचाई है। मक्का का हब कहा जाने सीमांचल और कोसी इलाका में तेज आंधी और मूसलाधार बारिश के कारण राज्य में रबी फसल खास कर मक्के की फसल को काफी नुकसान हुआ है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक क्षति हुई है। बिहार भारत के मुख्य मक्का उत्पादक राज्यों में से एक है। 

पहले एथेनॉल प्लांट और अब तूफान
बिहार के सहरसा जिला स्थित महिषी के रहने वाले बब्बू ठाकुर बताते हैं, “अभी बिहार में मक्का 1500 से 1600 रुपए क्विंटल मिल रहा है। 2 साल पहले 2500 रुपए क्विंटल खरीदा गया था। पिछले साल भी बढ़िया रेट था। मार्केट में इस वजह से किसान अनाज बेच नहीं रहा है। अब देखिए मार्केट जाने से पहले ही खेत में पूरा फसल बर्बाद हो गया। आखिर अब सरकार से मांग नहीं करेंगे तो किससे करेंगे?”

वहीं पूर्णिया जिला स्थित बनमनखी प्रखंड के रहने वाले जैबांर मियां बताते हैं, "तूफान-आंधी से खेत में लगी फसल पूरी तरह बर्बाद होने से सबसे ज्यादा दुखी मक्का की किसान है। इसमें काफी रुपया लगता है। मेरा लगभग 50 प्रतिशत खेत बर्बाद हो चुका है। भविष्य में थोड़ा भी मौसम खराब हुआ तो पूरा बर्बाद हो जाएगा। सरकार अगर मदद नहीं करेगी तो हमारे जैसा छोटा किसान इतना महंगा फसल नहीं लग पाएगा। पहले ही इथेनॉल कंपनी की स्थिति खराब होने के कारण 2200-2400 रुपये प्रति क्विंटल बिकने वाली मक्का 1200-1600 रुपये पर सिमट गई है।”

मक्का किसानों के मुताबिक पिछले कुछ सालों में मक्का से इथेनॉल उत्पादन ने बिहार के किसानों को भारी आर्थिक नुकसान से बचाने में बड़ी भूमिका निभाई है। जिस फसल को बेचने में मुश्किल हो रही थी, उसे अब नई कीमत और नया बाजार मिला है। कृषि विभाग के रिपोर्ट के मुताबिक मक्का 14.91 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर 58.65 लाख मीट्रिक टन हो चुका है।

हालांकि अब इथेनॉल प्लांट की डिमांड कम होने से मक्का की कीमत आधी हो गई है। इससे बिहार और यहां के किसानों को नुकसान हो रहा है।

भाजपा के विधायक और पूर्व मंत्री नीरज सिंह बबलू ने यह मुद्दा विधानसभा में उठाया। उन्होंने कहा,"इथेनॉल से जुड़ी नीतिगत परिस्थितियों और पर्याप्त सरकारी खरीद न होने के कारण मक्का का भाव 2600 रुपए प्रति क्विंटल से गिरकर लगभग 1600 रुपए प्रति क्विंटल रह गया है। इससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। अनेक छोटे-मध्यम उद्योग बंद होने की कगार पर हैं और रोजगार संकट गहराता जा रहा है।" 

वहीं राज्य के उद्योग मंत्री दिलीप जायसवाल ने इस मुद्दे पर कहा,”राज्य में 11 समर्पित इथेनॉल प्लांट कार्यरत हैं, जो केंद्र सरकार से समझौते के तहत संचालित होते हैं। पहले पेट्रोलियम कंपनियां इनसे प्रतिवर्ष 46 करोड़ लीटर इथेनॉल खरीदती थीं। इस वर्ष 11 करोड़ लीटर की खरीदारी में कमी आई है, लेकिन अब यह प्रक्रिया पुनः चालू हो जाएगी। वहीं, 8 अन्य इथेनॉल प्लांट ऐसे हैं, जिनका केंद्र सरकार से कोई समझौता नहीं है। ऐसे प्लांटों की खरीद-बिक्री की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की नहीं होगी।" 

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