अरुणाचल प्रदेश के तवांग में 4,086 मीटर ऊंचाई पर वैज्ञानिकों ने नई पौध प्रजाति डोरोनिकम सैंक्टम खोजी।
भारत में पहली बार डोरोनिकम प्रजाति पूर्वोत्तर क्षेत्र में दर्ज हुई, इससे हिमालयी जैव विविधता का महत्व बढ़ा।
वैज्ञानिकों ने सूक्ष्म अध्ययन और पुराने रिकॉर्ड की तुलना के बाद पौधे को अलग नई प्रजाति के रूप में पहचाना।
सर्वेक्षण में केवल 10 से 12 पौधे मिले, इसलिए वैज्ञानिकों ने फिलहाल इसे डेटा डिफिशिएंट श्रेणी में रखा।
चुमी ग्यात्से पवित्र जलप्रपात के पास मिलने के कारण नई प्रजाति का नाम सैंक्टम रखा गया।
अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले की ऊंची पहाड़ियों में वैज्ञानिकों को पौधों की एक नई प्रजाति मिली है। इस नई प्रजाति का नाम डोरोनिकम सैंक्टम रखा गया है। यह पौधा सूरजमुखी परिवार से जुड़ा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, भारत में पहली बार डोरोनिकम प्रजाति का पौधा पूर्वोत्तर में दर्ज किया गया है। इससे हिमालय के इस हिस्से में छिपी जैव विविधता के बारे में नई जानकारी सामने आई है।
यह खोज सीएसआईआर-इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन बायोरिसोर्स टेक्नोलॉजी (आईएचबीटी) के शोधकर्ताओं ने की। वैज्ञानिक हिमालयी इलाकों में पौधों और जैव विविधता का अध्ययन करने के लिए सर्वेक्षण कर रहे थे। इसी दौरान उन्हें यह अनोखा पौधा मिला। यह अध्ययन बायोलोजिया नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
4,086 मीटर की ऊंचाई पर मिली प्रजाति
शोध के मुताबिक, शोधकर्ताओं ने इस पौधे को समुद्र तल से करीब 4,086 मीटर की ऊंचाई पर देखा। यह पौधा तवांग जिले में डामटेंग की ओर जाने वाली कठिन पहाड़ी ढलानों पर मिला। यह इलाका ऊंचे पहाड़ों, ठंडे मौसम और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के लिए जाना जाता है।
पौधे की पहचान करना आसान नहीं था। वैज्ञानिकों ने पहले इसके नमूने एकत्र किए और फिर प्रयोगशाला में उनका विस्तार से अध्ययन किया। पौधे की बनावट और दूसरे हिस्सों को देखने के लिए विशेष सूक्ष्मदर्शी का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद नमूनों की तुलना पुराने हर्बेरियम रिकॉर्ड और दुनिया भर में उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारी से की गई।
चीन और तिब्बत की प्रजातियों से अलग
पहली नजर में यह पौधा चीन और तिब्बत में मिलने वाली कुछ डोरोनिकम प्रजातियों जैसा दिखाई देता है। लेकिन वैज्ञानिकों को इसके आकार और फूलों में कई ऐसे गुण मिले, जो इसे दूसरी प्रजातियों से अलग करते हैं।
इस पौधे के फूल पीले रंग के हैं और इसकी पत्तियां दिल के आकार की दिखाई देती हैं। वैज्ञानिकों ने इसके बीजों और फूलों की बनावट में भी खास अंतर पाया। इसके फूल के डंठल का ऊपरी हिस्सा कुछ मोटा होता है। इसके अलावा फूल को घेरने वाली हरी पत्तियां चपटी और भाले के आकार की हैं। इन विशेषताओं के आधार पर वैज्ञानिकों ने इसे एक अलग और नई प्रजाति के रूप में पहचाना। यह पौधा चीन में मिलने वाली डी. कोनाएन्स और डी. स्टेनोग्लोसम जैसी प्रजातियों से भी अलग है।
पहली बार पूर्वोत्तर भारत में डोरोनिकम
इस खोज की सबसे बड़ी खासियत यह है कि भारत में अब तक डोरोनिकम प्रजाति के पौधों का रिकॉर्ड मुख्य रूप से पश्चिमी हिमालय तक सीमित था। पूर्वोत्तर भारत में इस समूह का कोई पौधा पहले दर्ज नहीं किया गया था।
इसलिए डोरोनिकम सैंक्टम की खोज केवल एक नई पौध प्रजाति मिलने की घटना नहीं है, बल्कि यह भारत के हिमालयी वनस्पति ज्ञान में एक महत्वपूर्ण जुड़ाव है। इससे यह भी पता चलता है कि अरुणाचल प्रदेश के दूर-दराज और ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में अभी कई ऐसी प्रजातियां मौजूद हो सकती हैं, जिनकी वैज्ञानिक पहचान नहीं हुई है।
पवित्र झरने से जुड़ा है नाम
नई प्रजाति का नाम भी स्थानीय इलाके से जुड़ा हुआ है। वैज्ञानिकों ने इसका नाम सैंक्टम रखा है। लैटिन भाषा में सैंक्टम का अर्थ पवित्र या पावन होता है।
जिस जगह के पास यह पौधा मिला, वह चुमी ग्यात्से पवित्र जलप्रपात के नजदीक है। स्थानीय लोगों के लिए इस स्थान का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। इसी कारण वैज्ञानिकों ने पौधे के नाम में उस क्षेत्र की पवित्रता को सम्मान देने की कोशिश की।
बेहद कम संख्या में मिले पौधे
वैज्ञानिकों के लिए इस खोज के साथ चिंता की बात भी सामने आई है। सर्वेक्षण के दौरान इस पौधे के केवल 10 से 12 पौधे ही दिखाई दिए। इससे पता चलता है कि डोरोनिकम सैंक्टम बहुत दुर्लभ हो सकता है।
हालांकि अभी इसके संरक्षण की स्थिति को डेटा डिफिशिएंट, यानी पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं होने वाली श्रेणी में रखा गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस पौधे की वास्तविक संख्या और इसका फैलाव जानने के लिए आगे और सर्वेक्षण की जरूरत है।
हिमालय की जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण खोज
डोरोनिकम सैंक्टम की खोज एक बार फिर बताती है कि पूर्वी हिमालय प्राकृतिक संपदा से कितना समृद्ध है। यहां ऊंचे पहाड़ों और कठिन मौसम के कारण कई इलाकों में अब भी वैज्ञानिक अध्ययन सीमित हैं।
नई प्रजाति की खोज से वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि आने वाले समय में इस क्षेत्र में और भी अनोखे पौधों की जानकारी मिल सकती है। साथ ही, यह खोज हिमालय के नाजुक पर्यावरण को बचाने की जरूरत को भी सामने लाती है। दुर्लभ पौधों और उनके प्राकृतिक आवासों का संरक्षण किया जाए, तो आने वाली पीढ़ियां इस अनमोल जैव विविधता को देख और समझ सकेंगी।