भारत में तेलंगाना और उत्तर प्रदेश के जल क्षेत्रों से तीन नई एम्फिओप्स गुबरैला प्रजातियों की वैज्ञानिकों ने खोज की।
जेडएसआई के शोधकर्ताओं ने डीएनए बारकोडिंग और संरचनात्मक अध्ययन से एम्फीओप्स हैदराबादी, किन्नरसानी और सैंडी को नई प्रजाति घोषित किया।
पहले भारत में केवल तीन एम्फिओप्स प्रजातियां थीं, अब नई खोज से संख्या बढ़कर कुल छह हो गई है।
इन गुबरैलों में 7 से 17 प्रतिशत तक आनुवंशिक अंतर पाया गया, जिससे उनकी अलग विकासवादी पहचान सिद्ध हुई।
वैज्ञानिकों ने कहा कि यह खोज भारत के जल पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता संरक्षण की महत्ता को उजागर करती है।
भारत के वैज्ञानिकों ने पानी में रहने वाले गुबरैला, भृंग यानी बीटल की तीन नई प्रजातियों की खोज की है। यह खोज तेलंगाना और उत्तर प्रदेश के ताजे या मीठे पानी वाले इलाकों में की गई। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह भारतीय जैव विविधता के अध्ययन में एक बड़ी उपलब्धि है। इन नई प्रजातियों के नाम एम्फीओप्स हैदराबादी, एम्फीओप्स किन्नरसानी और एम्फीओप्स सैंडी रखे गए हैं। ये सभी एम्फिओप्स नाम के जलीय गुबरैला समूह से संबंधित हैं।
यह शोध भारतीय प्राणी सर्वेक्षण यानी जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जेडएसआई) और अन्य संस्थानों के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया। इस अध्ययन के नतीजे जर्नल ऑफ नेचुरल हिस्ट्री नामक वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं।
तालाबों और जलाशयों में पाए गए गुबरैला
वैज्ञानिकों के अनुसार, ये गुबरैला छोटे तालाबों, गीली जमीन, झीलों और उथले मीठे पानी वाले क्षेत्रों में रहते हैं। एम्फिओप्स हैदराबादी को हैदराबाद के एक मौसमी तालाब से खोजा गया। वहीं एम्फिओप्स किन्नरसानी तेलंगाना के किन्नेरासानी वन्यजीव अभयारण्य के पास एक सड़क किनारे बने तालाब में मिला। तीसरी प्रजाति एम्फिओप्स सैंडी उत्तर प्रदेश के संडी पक्षी विहार में पाई गई।
शोधकर्ताओं ने बताया कि इन तीनों प्रजातियों के शरीर की बनावट, शरीर पर बने छोटे निशान और प्रजनन अंगों की संरचना अन्य ज्ञात प्रजातियों से अलग हैं। इसी आधार पर इन्हें नई प्रजाति माना गया।
डीएनए जांच से हुई पुष्टि
वैज्ञानिकों ने केवल बाहरी बनावट ही नहीं देखी, बल्कि डीएनए जांच भी की। इसके लिए माइटोकॉन्ड्रियल सीओआई जीन सीक्वेंसिंग तकनीक का उपयोग किया गया। जांच में पाया गया कि इन प्रजातियों में 7 से 17 प्रतिशत तक आनुवंशिक अंतर है। इससे यह साबित हुआ कि ये अलग-अलग विकासक्रम वाली नई प्रजातियां हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि आधुनिक तकनीक के उपयोग से अब नई प्रजातियों की पहचान अधिक सटीक तरीके से की जा सकती है। इससे जीवों के विकास और उनके इतिहास को समझने में मदद मिलती है।
भारत में बढ़ी गुबरैला प्रजातियों की संख्या
शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि इससे पहले भारत में एम्फिओप्स समूह की केवल तीन प्रजातियां ही ज्ञात थीं। अब नई खोज के बाद इनकी संख्या बढ़कर छह हो गई है। यह खोज बताती है कि भारत के जल क्षेत्रों में अभी भी कई जीव ऐसे हैं जिनके बारे में जानकारी नहीं है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि भारतीय प्रायद्वीप एम्फिओप्स समूह के विकास का एक महत्वपूर्ण केंद्र हो सकता है। यहां की जलवायु और पर्यावरण दक्षिण-पूर्व एशिया की प्रजातियों से भी जुड़ाव दिखाते हैं।
जल स्रोतों के संरक्षण की जरूरत
शोध में कहा गया है कि कि यह खोज जल स्रोतों के संरक्षण की जरूरत को सामने लाती है। आज शहरीकरण, प्रदूषण और प्राकृतिक क्षेत्रों के नष्ट होने से तालाब और आर्द्रभूमियां तेजी से खत्म हो रही हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों में रहने वाले छोटे जीव भी खतरे में हैं।
अगर इन जल स्रोतों को सुरक्षित नहीं रखा गया तो कई दुर्लभ प्रजातियां खत्म हो सकती हैं। इसलिए सरकार और समाज दोनों को मिलकर तालाबों, झीलों और आर्द्रभूमियों की रक्षा करनी चाहिए।
बीटल अध्ययन में जेडएसआई की बड़ी भूमिका
भारत में गुबरैलों के अध्ययन के लिए जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया का कोलिओप्टेरा सेक्शन लंबे समय से काम कर रहा है। इसकी स्थापना वर्ष 1927 में कोलकाता में हुई थी। यहां एशिया के सबसे बड़े गुबरैलों के संग्रहों में से एक मौजूद है। इस संग्रह में लाखों नमूने सुरक्षित रखे गए हैं।
यह विभाग कई प्रकार के गुबरैलों पर शोध करता है और नई प्रजातियों की पहचान करता है। पिछले पांच वर्षों में यहां के वैज्ञानिकों ने 25 से अधिक नई प्रजातियों का वर्णन किया है और भारत में 15 नई प्रजातियों की उपस्थिति दर्ज की है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत जैव विविधता के मामले में बहुत समृद्ध देश है। यदि इसी तरह शोध जारी रहे तो आने वाले समय में और भी नई प्रजातियों की खोज हो सकती है।