काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की मिट्टी ने भारतीय एक सींग वाले गैंडे के अस्तित्व का हजारों साल पुराना रहस्य उजागर किया है।
बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा किए अध्ययन से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन और मानव दबाव के कारण गैंडे का प्राकृतिक आवास सिकुड़ गया।
जीवाश्म प्रमाणों से पता चलता है कि यह प्रजाति कभी पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक रूप से मौजूद थी। लेकिन होलोसीन युग के बाद इनके प्राकृतिक आवास तेजी से सिकुड़ते चले गए। यह इस बात का भी सबूत है कि जलवायु परिवर्तन केवल मौसम को ही नहीं बदल रहा, बल्कि वन्यजीवों का भविष्य भी तय कर रहा है।
अध्ययन स्पष्ट करता है कि कैसे जलवायु और वनस्पति में हो रहे दीर्घकालिक बदलाव वन्यजीवों के अस्तित्व, प्रवास और विलुप्ति को तय करते हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह ऐतिहासिक पारिस्थितिक ज्ञान आज और भविष्य में जलवायु परिवर्तन के दौर में बेहतर संरक्षण रणनीतियां बनाने और वन्यजीव प्रबंधन को मजबूत करने में मदद कर सकता है।
असम के काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान (केएनपी) की दलदली जमीन के नीचे दबी मिट्टी ने एक अनकहा इतिहास सामने रखा है। यह इतिहास बताता है कि कैसे एक सींग वाले भारतीय गैंडे के प्राकृतिक आवास हजारों वर्षों में जलवायु परिवर्तन, वनस्पति बदलाव, विदेशी प्रजातियों के आक्रमण और मानव दबाव के चलते सिमटता चले गए।
गौरतलब है कि इन गतिविधियों ने मिलकर काजीरंगा के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को नए रूप में ढाल दिया है। यह इस बात का भी सबूत है कि जलवायु परिवर्तन केवल मौसम को ही नहीं बदल रहा, बल्कि वन्यजीवों का भविष्य भी तय कर रहा है। काजीरंगा का पारिस्थितिकी तंत्र समय के साथ कैसे बदला, इसकी कहानी अब मिट्टी की परतों में दर्ज है।
ग्रेटर वन-हॉर्न्ड राइनो, यानी भारतीय एक सींग वाला गैंडा, दुनिया में गैंडे की सबसे बड़ी प्रजाति है। यह कभी भारतीय उपमहाद्वीप के पूरे उत्तरी हिस्से में व्यापक रूप से मौजूद थी। लेकिन 20वीं सदी की शुरुआत तक जंगलों में महज 200 गैंडे ही बचे थे।
हालांकि भारत और नेपाल के वन्यजीव अधिकारियों की सख्त सुरक्षा और बेहतर प्रबंधन के कारण यह प्रजाति विलुप्त होने से बच गई। आज पूर्वोत्तर भारत और नेपाल के तराई मैदानों में इनकी संख्या बढ़कर 4000 से अधिक हो गई है।
पारिस्थितिक संकट की ओर बढ़ रही दुनिया
इसमें कोई शक नहीं कि आज दुनिया तेजी से पारिस्थितिक संकट की ओर बढ़ रही है। शहरीकरण, औद्योगीकरण और वनों विनाश के साथ-साथ बाढ़, सूखा, भूकंप और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाएं जैव विविधता को गंभीर नुकसान पहुंचा रही हैं। इससे छोटे ही नहीं बल्कि बड़े शाकाहारी जीवों का भी अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।
पूर्वोत्तर भारत, जो इंडो-बर्मा जैव विविधता हॉटस्पॉट का हिस्सा है, कई संकटग्रस्त प्रजातियों का अंतिम आश्रय बन चुका है। वैज्ञानिकों के अनुसार, दुनिया भर में बड़े शाकाहारी जीवों की करीब 60 फीसदी प्रजातियां आज खतरे में हैं। चिंता की बात है कि दक्षिण-पूर्व एशिया में सबसे ज्यादा प्रजातियां विलुप्ति के खतरे से जूझ रही हैं।
यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान विशाल शाकाहारी जीवों के संरक्षण का प्रमुख केंद्र माना जाता है। खासतौर पर यह भारतीय एक सींग वाले गैंडे का सबसे महत्वपूर्ण और मजबूत गढ़ है।
मिट्टी में छिपा इतिहास
इसे गहराई से समझने के लिए बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की आर्द्रभूमि के नीचे मौजूद मिट्टी में परागकणों और जीवाश्म प्रमाणों का अध्ययन किया है। इसके जरिए उन्होंने काजीरंगा में लंबे समय तक चले पारिस्थितिक बदलावों और शाकाहारी जीवों की गतिविधियों का पहला विस्तृत रिकॉर्ड तैयार किया।
अपने अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने उद्यान के भीतर स्थित सोहोला दलदल से मिट्टी का एक मीटर से अधिक लंबा कोर नमूने के रूप में निकाला। गौरतलब है कि परत-दर-परत जमा यह मिट्टी एक प्राकृतिक अभिलेखागार की तरह काम करती है। इसमें पौधों के सूक्ष्म परागकण और जानवरों के गोबर पर पनपने वाले फफूंद के बीजाणु सुरक्षित रहते हैं, जो अतीत के पर्यावरण और जीव-जंतुओं की मौजूदगी की कहानी कहते हैं।
इस अध्ययन के नतीजे जर्नल ‘कैटेना’ में प्रकाशित हुए हैं। अध्ययन बताता है कि काजीरंगा का वर्तमान परिदृश्य, अतीत से काफी अलग है।
क्यों सिमट गया गैंडे का संसार?
अध्ययन दर्शाता है कि विशाल शाकाहारी जीवों, खासतौर पर भारतीय एक सींग वाले गैंडे की संख्या घटने और उसके काजीरंगा तक सीमित होने के पीछे क्या कारण रहे। जीवाश्म प्रमाणों से पता चलता है कि यह प्रजाति कभी पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक रूप से मौजूद थी। लेकिन होलोसीन युग के बाद इनके प्राकृतिक आवास तेजी से सिकुड़ते चले गए।
उत्तर-पश्चिम भारत में बड़े शाकाहारी जीव, जिनमें भारतीय गैंडा भी शामिल है, जलवायु में बदलाव (विशेषकर लिटिल आइस एज के दौरान) और बढ़ती इंसानी गतिविधियों के कारण क्षेत्रीय रूप से विलुप्त हो गए। इसके विपरीत, पिछले करीब 3300 वर्षों में पूर्वोत्तर भारत की जलवायु अपेक्षाकृत स्थिर रही और यहां मानवीय दबाव भी कम था।
नतीजन यह क्षेत्र गैंडों के लिए सुरक्षित बना रहा। यही वजह रही कि धीरे-धीरे गैंडे पूर्व की ओर पलायन करते गए और अंततः काजीरंगा में उनकी आबादी सिमटकर केंद्रित हो गई।
संरक्षण के लिए अहम सबक
अध्ययन स्पष्ट करता है कि कैसे जलवायु और वनस्पति में हो रहे दीर्घकालिक बदलाव वन्यजीवों के अस्तित्व, प्रवास और विलुप्ति को तय करते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह ऐतिहासिक पारिस्थितिक ज्ञान आज और भविष्य में जलवायु परिवर्तन के दौर में बेहतर संरक्षण रणनीतियां बनाने और वन्यजीव प्रबंधन को मजबूत करने में मदद कर सकता है।
देखा जाए तो काजीरंगा की मिट्टी से निकली यह कहानी केवल अतीत का दस्तावेज नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक चेतावनी भी है कि यदि प्रकृति का संतुलन बिगड़ा, तो सबसे मजबूत जीव भी अपने घरों से बेदखल हो सकते हैं।