पूर्वोत्तर भारत में खाने योग्य गुबरैलों की 75 प्रजातियां दर्ज, इनमें 24 प्रजातियां दुनिया में पहली बार पहचानी गईं।
अरुणाचल प्रदेश में गुबरैलों की 34 प्रजातियां मिलीं, नागालैंड में 33 और मणिपुर में 13 प्रजातियां दर्ज की गईं।
साल 2019 से 2021 तक हुए शोध ने पूर्वोत्तर के आदिवासी समुदायों के पारंपरिक खाद्य ज्ञान को उजागर किया।
अंगामी समुदाय में 31 और न्यीशी समुदाय में 27 खाने योग्य गुबरैला प्रजातियों के इस्तेमाल की जानकारी अध्ययन में सामने आई।
सर्वेक्षण में 79 प्रतिशत लोगों ने लकड़ी में रहने वाले गुबरैलों की संख्या घटने की बात कही, प्रमुख कारण वनों की कटाई और अत्यधिक संग्रह हैं।
भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के जंगलों में सिर्फ पेड़-पौधे और वन्यजीव ही नहीं, बल्कि खान-पान की ऐसी अनोखी परंपराएं भी छिपी हैं, जिनके बारे में दुनिया अब तक बहुत कम जानती थी। यहां रहने वाले कई आदिवासी समुदाय पीढ़ियों से गुबरैलों यानी बीटल और उनके लार्वा को भोजन के रूप में इस्तेमाल करते आ रहे हैं। अब वैज्ञानिकों के एक अध्ययन ने इस पारंपरिक ज्ञान की समृद्ध दुनिया को सामने लाया है।
बेंगलुरु स्थित अशोक ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट की अगुवाई में शोधकर्ताओं ने पूर्वोत्तर भारत में खाने योग्य गुबरैलों की 75 प्रजातियों का दस्तावेजीकरण किया है। इनमें से 24 प्रजातियों को दुनिया में पहली बार खाने योग्य प्रजातियों के रूप में दर्ज किया गया है, जबकि पांच अन्य प्रजातियों के खाने में इस्तेमाल का रिकॉर्ड भारत में पहली बार सामने आया है।
यह अध्ययन प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका एनपीजे एंटोमोलोजी में प्रकाशित किया गया है। इसमें क्षेत्र की जैव विविधता के साथ-साथ आदिवासी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को सहेजने की जरूरत पर भी जोर दिया गया है।
अरुणाचल प्रदेश में सबसे ज्यादा प्रजातियां
अध्ययन के मुताबिक, पूर्वोत्तर के राज्यों में अरुणाचल प्रदेश खाने योग्य गुबरैलों की विविधता के मामले में सबसे आगे है। यहां 34 प्रजातियां दर्ज की गईं। नागालैंड में 33 और मणिपुर में 13 प्रजातियों की पहचान की गई।
यह अध्ययन बताता है कि पूर्वोत्तर के जंगलों और वहां रहने वाले समुदायों के पास भोजन से जुड़ा ज्ञान का बड़ा खजाना है। इस ज्ञान को समझना और अगली पीढ़ियों तक पहुंचाना वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण है।
हर समुदाय की अपनी खान-पान की परंपरा
पूर्वोत्तर के अलग-अलग समुदायों में गुबरैलों को खाने का चलन एक जैसा नहीं है। अध्ययन में अंगामी समुदाय के पास सबसे अधिक 31 प्रजातियों के इस्तेमाल की जानकारी दर्ज की गई। न्यीशी समुदाय में 27 प्रजातियों का उल्लेख मिला।
मेइती समुदाय में सात, लाई और अपातानी समुदायों में पांच-पांच, जबकि माओ और पाइटे समुदायों में चार-चार प्रजातियों के इस्तेमाल की जानकारी सामने आई। आदि समुदाय में तीन प्रजातियां दर्ज की गईं। वहीं, लोथा और मोंसांग समुदायों में दो-दो प्रजातियों का उल्लेख मिला।
इन आंकड़ों से पता चलता है कि कीटों को भोजन में शामिल करने की परंपरा स्थानीय संस्कृति, उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों और पीढ़ियों से चले आ रहे अनुभवों से जुड़ी हुई है।
भोजन के साथ औषधीय महत्व भी
इन समुदायों के लिए गुबरैला सिर्फ भोजन का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि कुछ जगहों पर उन्हें पारंपरिक उपचार से भी जोड़ा जाता है। अध्ययन के अनुसार, नागालैंड के अंगामी समुदाय में लॉन्गहॉर्न बीटल के लार्वा का इस्तेमाल निमोनिया के उपचार के लिए किए जाने की जानकारी मिली। मणिपुर के माओ समुदाय में इसी समूह के लार्वा से बना शोरबा खांसी के उपचार के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है।
हालांकि ये पारंपरिक मान्यताएं और उपयोग वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित चिकित्सा उपचार का विकल्प नहीं हैं। फिर भी, इनका दस्तावेजीकरण स्थानीय संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान को समझने में मदद करता है।
भविष्य के भोजन के रूप में कीट
बढ़ती वैश्विक आबादी के बीच वैज्ञानिक ऐसे खाद्य स्रोतों की तलाश कर रहे हैं, जो पौष्टिक होने के साथ पर्यावरण पर कम दबाव डालें। इसी संदर्भ में कीटों को प्रोटीन के एक संभावित स्रोत के रूप में देखा जा रहा है।
अध्ययनों के अनुसार, कई कीटों में प्रोटीन, वसा, आवश्यक फैटी एसिड, विटामिन और खनिज पाए जाते हैं। पारंपरिक पशुपालन से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन, भूमि का क्षरण और जल प्रदूषण जैसी समस्याएं भी जुड़ी हैं। ऐसे में कीटों का टिकाऊ उत्पादन भविष्य में भोजन की जरूरतें पूरी करने के विकल्पों में शामिल हो सकता है।
घटते जंगलों से खतरे में गुबरैला
अध्ययन ने एक गंभीर चिंता भी सामने रखी है। शोधकर्ताओं के सर्वेक्षण में शामिल करीब 79 प्रतिशत लोगों ने बताया कि पिछले दस वर्षों में लकड़ी में रहने वाले गुबरैलों की संख्या घटी है। गिरावट की जानकारी देने वालों में 63 प्रतिशत ने वनों की कटाई और प्राकृतिक आवासों के नुकसान को इसका प्रमुख कारण बताया। कुछ लोगों ने बाजार की मांग के कारण बढ़ते शिकार और अत्यधिक संग्रह को भी जिम्मेदार माना।
गुबरैलों की ये प्रजातियां केवल भोजन का स्रोत नहीं हैं। वे जंगलों के पारिस्थितिकी तंत्र का भी हिस्सा हैं। इसलिए उनके प्राकृतिक आवासों को बचाना जरूरी है। पूर्वोत्तर के जंगलों में छिपी खाने योग्य गुबरैलों की यह विविधता विज्ञान के लिए नई जानकारी है और स्थानीय समुदायों के लिए पुरानी विरासत। जरूरत इस बात की है कि विकास की दौड़ में न जंगल उजड़ें और न ही पीढ़ियों से संजोया गया यह पारंपरिक ज्ञान खो जाए।