पालघर में मानसून की बारिश ने भूजल की गुणवत्ता सुधारी, जिससे पीने योग्य पानी की उपलब्धता बढ़ी और लोगों को राहत मिली।
गर्मी के मौसम में खारा हुआ भूजल बारिश के बाद साफ हुआ, क्योंकि ताजा वर्षा जल जमीन के अंदर पहुंचा।
वैज्ञानिकों ने आइसोटोप तकनीक से पता लगाया कि मानसून भूजल को दोबारा भरने और सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अध्ययन में उद्योगों से होने वाले प्रदूषण और समुद्री खारे पानी के कारण भूजल संकट की चेतावनी भी मिली।
शोधकर्ताओं ने वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देने की सलाह दी, ताकि भविष्य में साफ पानी सुरक्षित रखा जा सके।
भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश गर्मी से ठंडक पहुंचाने और फसलों के लिए बेहद जरूरी है। महाराष्ट्र के पालघर जिले में मानसून की बारिश केवल गर्मी से राहत देने और फसलों के लिए पानी उपलब्ध कराने का काम नहीं करती, बल्कि यह जमीन के अंदर मौजूद पानी को भी नया जीवन देती है। एक नए अध्ययन में पाया गया है कि मानसून की बारिश भूजल की गुणवत्ता को काफी हद तक सुधार देती है। वहीं, बारिश से पहले गर्मी के मौसम में यही पानी नमकीन और कई हानिकारक तत्वों से प्रभावित हो जाता है।
यह अध्ययन भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र और होमी भाभा राष्ट्रीय संस्थान के वैज्ञानिकों ने किया है। शोधकर्ताओं ने पाया कि मानसून आने से पहले पालघर के इलाके के लगभग 80 प्रतिशत भूजल की गुणवत्ता खराब या पीने के लिए अनुपयुक्त थी। लेकिन बारिश के बाद बड़ी मात्रा में ताजा पानी जमीन के अंदर पहुंचा और कई इलाकों में भूजल की गुणवत्ता बेहतर हो गई। यह अध्ययन साइंटिफिक रिपोर्ट्स नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
बारिश से जमीन के अंदर पहुंचता है नया पानी
पालघर जैसे तटीय इलाकों में लोग पीने और खेती के लिए कुओं और भूजल पर काफी निर्भर रहते हैं। गर्मी के महीनों में जब बारिश नहीं होती, तब जमीन के अंदर जमा पानी में नमक और खनिजों की मात्रा बढ़ने लगती है। तेज गर्मी के कारण पानी का वाष्पीकरण होता है, जिससे उसमें मौजूद लवण अधिक मात्रा में रह जाते हैं।
इसके अलावा समुद्र के पास होने के कारण अरब सागर का खारा पानी भी कई जगहों पर भूजल में मिल जाता है। इससे पानी में सोडियम और क्लोराइड जैसे तत्व बढ़ जाते हैं। ऐसा पानी न केवल स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है, बल्कि खेती की जमीन को भी खराब कर सकता है।
मानसून के दौरान जब भारी बारिश होती है, तो बारिश का साफ पानी जमीन में रिसकर पुराने खारे पानी को पतला करता है। इससे भूजल में मौजूद नमक और अन्य रसायनों की मात्रा कम हो जाती है और पानी की गुणवत्ता सुधरने लगती है।
वैज्ञानिकों ने पानी की पहचान के लिए अपनाई नई तकनीक
शोधकर्ताओं ने भूजल की स्थिति को समझने के लिए कई वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल किया। उन्होंने पानी में मौजूद हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के विशेष रूपों यानी आइसोटोप का अध्ययन किया। हर पानी के स्रोत की अपनी अलग पहचान होती है, जिसे इन आइसोटोप के माध्यम से समझा जा सकता है।
अध्ययन में पाया गया कि मानसून से पहले भूजल में ऐसे संकेत मिले, जो बताते हैं कि पानी काफी पुराना और वाष्पीकरण से प्रभावित था। कई जगहों पर समुद्री पानी के मिश्रण के संकेत भी मिले। लेकिन बारिश के बाद पानी में नए वर्षा जल की मात्रा बढ़ गई। इससे साफ हुआ कि मानसून भूजल को फिर से भरने और उसकी गुणवत्ता सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उद्योगों से प्रदूषण का खतरा भी सामने आया
वैज्ञानिकों ने भूजल की उम्र और उसमें नए पानी के प्रवेश को समझने के लिए ट्रिटियम नामक रेडियोधर्मी तत्व का भी अध्ययन किया। ट्रिटियम की मात्रा से पता चलता है कि पानी कितना पुराना है और उसमें हाल की बारिश का कितना योगदान है।
पालघर में कई जगहों पर ट्रिटियम की अधिक मात्रा मिली, जिससे पता चला कि वहां भूजल में नया पानी तेजी से पहुंच रहा है। लेकिन कुछ औद्योगिक क्षेत्रों के पास ट्रिटियम की असामान्य मात्रा भी मिली। वैज्ञानिकों ने इसे कुछ स्थानीय उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट से जोड़ा है।
इससे पता चलता है कि पालघर में भूजल के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर समुद्र के कारण बढ़ता खारापन है, तो दूसरी ओर मानव गतिविधियों से होने वाला प्रदूषण भी पानी की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है।
बेहतर जल प्रबंधन के लिए मददगार अध्ययन
वैज्ञानिकों ने पानी की गुणवत्ता समझने के लिए रासायनिक जांच, आइसोटोप अध्ययन और कंप्यूटर आधारित नक्शों का इस्तेमाल किया। इससे यह पता लगाने में मदद मिली कि कौन से क्षेत्र पानी की समस्या से ज्यादा प्रभावित हैं।
इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने 350 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र से 92 पानी के नमूने लिए। हालांकि यह अध्ययन काफी उपयोगी है, लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि भविष्य में ज्यादा नमूनों और लंबे समय तक निगरानी की जरूरत होगी। इससे छोटे क्षेत्रों में छिपे प्रदूषण का भी पता लगाया जा सकेगा।
बारिश के पानी को बचाना जरूरी
अध्ययन से यह साफ हुआ है कि मानसून तटीय क्षेत्रों के लिए प्राकृतिक जल शुद्धिकरण प्रणाली की तरह काम करता है। लेकिन बदलते मौसम और समुद्र के बढ़ते स्तर के कारण भविष्य में खारे पानी का खतरा बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बारिश के पानी को जमा करने और जमीन के अंदर पहुंचाने की व्यवस्था को बढ़ावा देना जरूरी है। वर्षा जल संचयन से भूजल भंडार को मजबूत किया जा सकता है और लंबे समय तक साफ पानी उपलब्ध कराया जा सकता है।
पालघर का यह अध्ययन देश के अन्य तटीय इलाकों के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश देता है। यह बताता है कि प्रकृति किस तरह पानी के संतुलन को बनाए रखने में मदद करती है, लेकिन मानव लापरवाही और जलवायु परिवर्तन इस संतुलन को खतरे में डाल सकते हैं।