करोड़ों लोगों की प्यास बुझाने और खेतों को सींचने वाले जलाशय तेजी से अपनी क्षमता खो रहे हैं, जिससे जल, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा खतरा मंडराने लगा है। इस बारे में किए एक नए अध्ययन ने चेतावनी दी है कि जलाशयों में तेजी से बढ़ती गाद दुनिया की जल सुरक्षा के लिए एक मूक लेकिन गंभीर संकट बनती जा रही है।
वैज्ञानिकों ने अंदेशा जताया है कि हर दशक 7.3 फीसदी घटती भंडारण क्षमता के कारण 2060 तक दुनिया के आधे से अधिक जलाशय अपनी उपयोगिता का बड़ा हिस्सा खो सकते हैं।
इसका असर केवल पानी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सिंचाई, खाद्य उत्पादन, जलविद्युत और बाढ़ नियंत्रण जैसी महत्वपूर्ण सेवाएं भी प्रभावित होंगी।
अध्ययन के अनुसार, दुनिया की एक-चौथाई कृषि भूमि और 200 करोड़ से अधिक लोगों की जल सुरक्षा इस खतरे की जद में है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जलाशयों में जमा हो रही गाद के प्रबंधन के लिए तत्काल और वैज्ञानिक कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट आने वाले दशकों में जल, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा के लिए वैश्विक चुनौती बन सकता है।
दुनिया भर के जलाशयों को लेकर एक बेहद डराने वाली रिपोर्ट सामने आई है। मशहूर साइंस जर्नल 'नेचर सस्टेनेबिलिटी' में छपे एक वैश्विक अध्ययन के मुताबिक, दुनिया भर के जलाशय हर दशक औसतन 7.3 फीसदी की रफ्तार से अपनी जल भंडारण क्षमता खो रहे हैं।
इस संकट का सबसे बुरा असर छोटे जलाशयों पर पड़ रहा है, जो दुनिया के करोड़ों लोगों के लिए पेयजल, सिंचाई जैसी अन्य जरूरतों के लिए जल उपलब्ध कराते हैं। यह अध्ययन चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज से जुड़े नानजिंग इंस्टीट्यूट ऑफ जियोग्राफी एंड लिम्नोलॉजी (एनआईजीएलएएस) के प्रोफेसर चुनकियाओ सॉन्ग के नेतृत्व में किया गया है।
अपने इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने रिमोट सेंसिंग, भू-स्थानिक आंकड़ों और इंजीनियरिंग रिकॉर्ड्स की मदद से ग्लोबल रिजर्वायर इन्वेंटरी (जीआरईआई) तैयार की है। इसके तहत दुनिया भर में 5.5 लाख से अधिक जलाशयों की पहचान की गई।
अध्ययन से पता चला कि इनमें से 95 फीसदी से अधिक जलाशय एक वर्ग किलोमीटर से भी छोटे हैं, जबकि पिछले अधिकांश वैश्विक आकलनों में इन छोटे जलाशयों को करीब-करीब नजरअंदाज किया गया था।
नानजिंग इंस्टीट्यूट ऑफ जियोग्राफी एंड लिम्नोलॉजी और अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता लियू काई के मुताबिक, यह पहला ऐसा वैश्विक अध्ययन है जिसमें छोटे जलाशयों को भी शामिल करते हुए तलछट (गाद) जमा होने की समस्या का आकलन किया गया है।
क्यों घट रही है जलाशयों की क्षमता?
यह जलाशय हमारे जीवन की धड़कन हैं। यही बाढ़ के कहर को रोकते हैं, खेतों तक सिंचाई का पानी पहुंचाते हैं, करोड़ों लोगों की प्यास बुझाते हैं और बिजली उत्पादन का आधार बनते हैं।
लेकिन आज इन जीवनदायिनी संरचनाओं पर एक बड़ा संकट मंडरा रहा है। नदियों के साथ बहकर आने वाली मिट्टी और गाद धीरे-धीरे बांधों के पीछे जमा हो रही है, जिससे इनके पानी संग्रह करने की उनकी क्षमता लगातार घटती जा रही है।
इसका सीधा असर बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और जलविद्युत उत्पादन जैसी महत्वपूर्ण सेवाओं पर पड़ता है। इतना ही नहीं, जब तलछट नीचे की ओर बहना कम हो जाती है तो नदियों की प्राकृतिक संरचना भी बदलने लगती है। इससे डेल्टा क्षेत्रों का धंसना, तटीय कटाव और पारिस्थितिक तंत्र के क्षरण जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
हर पांच में से एक जलाशय तेजी से खो रहा क्षमता
वैज्ञानिकों ने दुनिया के 6,000 से अधिक जलाशयों से जुटाए गए आंकड़ों और मशीन लर्निंग आधारित मॉडल की मदद से पाया कि हर पांच में से करीब एक जलाशय तेजी से अपनी भंडारण क्षमता खो रहा है। छोटे जलाशय इस खतरे के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील पाए गए हैं।
विशेष रूप से अमेरिका के दक्षिण-पश्चिमी हिस्सों, मध्य पूर्व और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया जैसे शुष्क क्षेत्रों में स्थिति ज्यादा गंभीर है।
वैज्ञानिकों ने दुनिया के 16 ऐसे 'हॉटस्पॉट' क्षेत्रों की पहचान भी की है, जहां जलाशयों में गाद जमा होने की समस्या सबसे गंभीर रूप ले चुकी है। इनमें से अधिकांश क्षेत्र बड़े सिंचित कृषि क्षेत्रों और उन शुष्क इलाकों में स्थित हैं, जो पहले ही पानी की कमी से जूझ रहे हैं।
ऐसे में जलाशयों की घटती क्षमता न केवल खेती-किसानी पर असर डालेगी, बल्कि करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा को भी गंभीर खतरे में डाल सकती है।
200 करोड़ से अधिक लोगों की जल सुरक्षा पर खतरा
अध्ययन के मुताबिक, दुनिया की करीब एक-चौथाई कृषि भूमि गाद जमा होने के बढ़ते जोखिम के दायरे में है। इसका असर 200 करोड़ से अधिक लोगों पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो जल और खाद्य सुरक्षा दोनों गंभीर संकट में पड़ सकती हैं।
अध्ययन ने यह भी चेताया है कि मौजूदा रुझान जारी रहे तो 2060 तक दुनिया के आधे से अधिक जलाशय अपनी क्षमता का बड़ा हिस्सा खो सकते हैं।
ऐसे में शोधकर्ताओं का कहना है कि जलाशयों में बढ़ती गाद को केवल तकनीकी समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह भविष्य की जल, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक गंभीर वैश्विक चुनौती बनती जा रही है। उनके अनुसार, मानव कल्याण और सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जलाशयों का वैज्ञानिक प्रबंधन बेहद जरूरी होगा।