मध्य प्रदेश के शहडोल स्थित अल्ट्राटेक सीमेंट की बिच्छापुरी कोयला खदान को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कड़ा रुख अपनाया है।
ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया है कि औद्योगिक गतिविधियों की कीमत स्थानीय समुदायों की प्यास और नदियों के प्रदूषण के रूप में नहीं चुकाई जा सकती। अदालत ने कंपनी को आसपास के गांवों में भूजल रिचार्ज संरचनाएं बनाने और सेंदुरी-बैगाटोला, कल्याणपुर व बिचारपुर में नियमित जल आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
यह आदेश संयुक्त समिति की जांच रिपोर्ट के आधार पर आया है, जिसमें पाया गया कि खदान बंद होने के बावजूद हर दिन करीब 1,250 किलोलीटर पानी ट्रीटमेंट के बाद लोटना नाले में छोड़ा जा रहा है। यह पानी मुरना नदी से होकर अंततः सोन नदी में मिल रहा है, जिससे जल प्रदूषण का खतरा बढ़ रहा है।
समिति ने यह भी रेखांकित किया कि पर्यावरणीय स्वीकृति की शर्तों के अनुसार इस पानी का उपयोग गांवों में भूजल पुनर्भरण के लिए होना चाहिए था, लेकिन यह व्यवस्था अभी केवल एक गांव तक सीमित है।
एनजीटी के आदेश ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि उद्योगों के लिए तय पर्यावरणीय शर्तें जमीन पर कितनी गंभीरता से लागू होती हैं। यह फैसला केवल नदियों के प्रदूषण पर रोक लगाने का नहीं, बल्कि उन गांवों के जल अधिकारों को सुनिश्चित करने का भी है, जो वर्षों से खनन के असर और पानी की कमी का बोझ झेल रहे हैं।
मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में स्थित अल्ट्राटेक सीमेंट की बिच्छापुरी कोयला खदान को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की सेंट्रल बेंच ने 11 मई 2026 को एक अहम आदेश जारी किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि औद्योगिक विकास की कीमत ग्रामीणों की प्यास और पर्यावरण की तबाही नहीं हो सकती।
ट्रिब्यूनल ने खदान प्रबंधन और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि आसपास के गांवों में भूजल के पुनर्भरण (ग्राउंडवाटर रिचार्ज) की ठोस व्यवस्था बनाई जाए और जिन गांवों में पानी की आपूर्ति नहीं हो रही है, वहां नियमित जल आपूर्ति सुनिश्चित की जाए।
एनजीटी ने निर्देश दिया है कि सेंदुरी-बैगाटोला, कल्याणपुर और बिचारपुर गांवों में बिना रुकावट पानी पहुंचाया जाए।
संयुक्त समिति की सिफारिशें बनी आधार
गौरतलब है कि यह आदेश संयुक्त समिति की सिफारिशों के आधार पर दिया गया, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लागू करने के निर्देश जारी किए हैं।
सुनवाई के दौरान अल्ट्राटेक सीमेंट की ओर से पेश वकील ने कहा कि कंपनी समिति की सिफारिशों का पालन करने को तैयार है, लेकिन भूजल पुनर्भरण संरचनाओं के निर्माण और शुद्ध किए गए अतिरिक्त जल को गांवों के लिए उपलब्ध कराने के लिए जिला प्रशासन के सहयोग की आवश्यकता होगी। कंपनी ने यह भी अनुरोध किया कि इसके लिए जिला कलेक्टर को उपयुक्त भूमि उपलब्ध कराने के निर्देश दिए जाए।
अदालत ने कंपनी के इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया है और शहडोल के जिला कलेक्टर को निर्देश दिया है कि परियोजना प्रस्तावक के साथ मिलकर चर्चा कर आवश्यक जगह उपलब्ध कराएं, ताकि सिफारिशों को लागू किया जा सके।
सोन और मुरना नदियों के प्रदूषण से जुड़ा है मामला
यह मामला बिच्छापुरी कोयला खदान में खनन और उससे निकलने वाले एफ्लुएंट के कारण सोन और मुरना नदियों में हो रहे गंभीर प्रदूषण से जुड़ा है। खदान से निकलने वाले गंदे पानी और उसकी अव्यवस्थित निकासी ने इन नदियों की सेहत पर गहरा असर डाला है।
स्थिति का जायजा लेने के लिए एक संयुक्त समिति ने खदान का दौरा किया। इस दौरान समिति ने वहां के वाटर ट्रीटमेंट प्लांट, आसपास की नालियों, सोन और मुरना नदियों के साथ-साथ पास के गांवों का भी निरीक्षण किया। खनन क्षेत्र के भीतर बिचारपुर, सेंदुरी और कल्याणपुर गांव आते हैं, जहां लोग इस पर्यावरणीय दबाव का सामना कर रहे हैं। इस पूरे इलाके में बगथा, लोटना और मुरना जैसे तीन प्रमुख नाले बहते हैं।
समिति ने पाया है कि फिलहाल खदानें बंद हैं। इसके बावजूद खदान का करीब 1,250 किलो लीटर ट्रीटेड पानी हर दिन लोटाना नाले में छोड़ा जा रहा है, जो मुरना और फिर आगे चलकर सोन नदी में मिल जाता है।
समिति ने यह भी जानकारी दी है कि संचालन के लिए मिली सहमति की शर्तों के अनुसार खदान प्रबंधन के लिए यह अनिवार्य था कि पानी को नालों में छोड़ने के बजाय आसपास के गांवों में भूजल रिचार्ज की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। किंतु विडंबना यह है कि यह कार्य अब तक केवल सेंदुरी गांव के 'लाखा तालाब' तक ही सीमित है।
एनजीटी का यह कड़ा रुख इस बात का प्रमाण है कि अब उद्योगों को केवल मुनाफा नहीं, बल्कि पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। नदियों को बचाने और गांवों को प्यास से मुक्त करने की इस पहल पर अब पूरे जिले की नजरें टिकी हैं।