हिमाचल प्रदेश भूजल (विनियमन एवं विकास और प्रबंधन नियंत्रण) अधिनियम, 2005 की धारा 2(जी) में प्राकृतिक झरनों को भूजल की परिभाषा में शामिल किया गया है। प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
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क्या भूजल की परिभाषा में आता है प्राकृतिक झरने का पानी? एनजीटी ने उठाया अहम सवाल

हिमाचल प्रदेश के कानून में प्राकृतिक झरने का पानी भूजल माना गया है, लेकिन केंद्र के दिशानिर्देशों में इसे शामिल नहीं किया गया; अब एनजीटी ने इस विरोधाभास को दूर करने और उद्योगों द्वारा इसके उपयोग को नियंत्रित करने की जरूरत पर जोर दिया है।

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • प्राकृतिक झरनों (स्प्रिंग वाटर) के पानी को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने एक अहम सवाल उठाया है, क्या जमीन के भीतर से निकलने वाला यह पानी भूजल की परिभाषा में आता है और क्या उद्योगों द्वारा इसके उपयोग को भी भूजल की तरह नियंत्रित किया जाना चाहिए?

  • 21 अगस्त 2026 के आदेश में एनजीटी ने जल शक्ति मंत्रालय को इस मुद्दे की जांच करने का निर्देश दिया है।

  • मामला कसौली की मोहन मीकिन डिस्टिलरी से जुड़ा है, जहां बोरवेल के साथ-साथ प्राकृतिक झरने के पानी के उपयोग का मुद्दा सामने आया।

  • हिमाचल प्रदेश के भूजल कानून में झरनों को भूजल की परिभाषा में शामिल किया गया है, लेकिन केंद्र की मौजूदा गाइडलाइंस में स्प्रिंग वाटर को भूजल नहीं माना गया है। डिस्टिलरी ने झरने के पंजीकरण की मांग की थी, लेकिन राज्य भूजल प्राधिकरण ने कहा कि इसकी जरूरत नहीं है।

  • एनजीटी ने सवाल उठाया है कि पंजीकरण के बिना रॉयल्टी और पानी की मात्रा मापने जैसे नियमों का पालन कैसे सुनिश्चित होगा। अब यह मामला प्राकृतिक जल स्रोतों के औद्योगिक उपयोग के लिए भविष्य की नीति और नियम तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने प्राकृतिक झरनों (स्प्रिंग वाटर) के पानी को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है। अधिकरण ने कहा है कि जब प्राकृतिक स्रोत से निकलने वाला यह पानी भी भूजल का ही एक रूप है, तो उद्योगों द्वारा अपनी निजी जमीन पर स्थित प्राकृतिक झरनों के पानी के उपयोग को भी नियमों के दायरे में लाने पर विचार किया जाना चाहिए।

21 अगस्त 2026 के आदेश में एनजीटी ने जल शक्ति मंत्रालय को इस मुद्दे की जांच करने का निर्देश दिया है।

अदालत ने मंत्रालय से यह भी विचार करने को कहा कि क्या उद्योगों द्वारा उपयोग किए जाने वाले इन प्राकृतिक स्रोतों के पानी को भूजल की परिभाषा में शामिल किया जाना चाहिए, जैसा कि हिमाचल प्रदेश भूजल (विनियमन एवं विकास और प्रबंधन नियंत्रण) अधिनियम, 2005 में किया गया है।

कसौली डिस्टिलरी के मामले से उठा सवाल

यह मामला कसौली स्थित मोहन मीकिन डिस्टिलरी से जुड़ा है, जहां भूजल के उपयोग और आवश्यक अनुमति का मुद्दा एनजीटी के सामने आया था। आरोप है कि इकाई बिना जरूरी परमिशन के ग्राउंडवाटर का इस्तेमाल कर रही थी।

संयुक्त समिति की रिपोर्ट के अनुसार, डिस्टिलरी परिसर में एक बोरवेल है। इसके अलावा डिस्टिलरी प्राकृतिक झरने के पानी का भी उपयोग करती है, लेकिन इसके उपयोग की कोई नियमित लॉगबुक नहीं रखी गई है।

एनजीटी के समक्ष यह भी बताया गया कि हिमाचल प्रदेश भूजल (विनियमन एवं विकास और प्रबंधन नियंत्रण) अधिनियम, 2005 की धारा 2(जी) में प्राकृतिक झरनों को भूजल की परिभाषा में शामिल किया गया है।

बता दें कि स्प्रिंग वाटर वह पानी होता है जो भूमि के भीतर मौजूद जलभृत या भूजल स्रोत से प्राकृतिक दबाव के कारण जमीन की सतह पर निकलता है। आमतौर पर यह पहाड़ों या ढलानदार क्षेत्रों में झरने के रूप में दिखाई देता है।

कानून में झरना भी भूजल, लेकिन पंजीकरण से छूट?

अधिनियम की धारा 7 भूजल के दोहन और उपयोग के लिए अनुमति से संबंधित है। धारा 12 के तहत नोटिफाइड क्षेत्रों में भूजल निकालने पर निर्धारित दर और नियमों के अनुसार रॉयल्टी देनी होती है। वहीं, धारा 14 के तहत अधिसूचित क्षेत्रों में भूजल का उपयोग करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए पानी की मात्रा मापने वाला उपकरण लगाना अनिवार्य है।

हालांकि, उद्योग की ओर से पेश वकील ने एनजीटी को बताया कि डिस्टिलरी ने 18 जनवरी 2024 को हिमाचल प्रदेश भूजल प्राधिकरण (एचपीजीडब्ल्यूए) के सदस्य सचिव को पत्र भेजकर अपने परिसर में मौजूद प्राकृतिक जल स्रोत यानी प्राकृतिक झरने (स्प्रिंग) के पंजीकरण का अनुरोध किया था।

हालांकि प्राधिकरण ने 21 नवंबर 2024 को जवाब दिया कि इस प्राकृतिक जल स्रोत का पंजीकरण आवश्यक नहीं है। यहीं से नियमों को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हुआ।

एनजीटी ने हिमाचल प्रदेश भूजल प्राधिकरण (एचपीजीडब्ल्यूए) को मामले में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया है।

अदालत यह जानना चाहती है कि यदि डिस्टिलरी के निजी परिसर में स्थित प्राकृतिक झरने (स्प्रिंग) का पंजीकरण ही नहीं होगा, तो हिमाचल प्रदेश भूजल अधिनियम की धारा 12 के तहत रॉयल्टी और धारा 14 के तहत जल-मापी उपकरण लगाने जैसे प्रावधानों का पालन कैसे सुनिश्चित किया जाएगा।

केंद्र और राज्य की परिभाषा में अंतर

मामले में परियोजना प्रस्तावक की ओर से कहा गया है कि प्राकृतिक झरने के पानी के उपयोग पर वह विधिवत रॉयल्टी का भुगतान कर रहा है।

दूसरी ओर, केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (सीजीडब्ल्यूए) के वकील ने एनजीटी के समक्ष कहा कि जल शक्ति मंत्रालय की मौजूदा गाइडलाइंस में प्राकृतिक झरने (स्प्रिंग) के पानी को भूजल की श्रेणी में शामिल नहीं किया गया है।

ऐसे में केंद्र और राज्य के नियमों के बीच का अंतर अब एनजीटी के समक्ष प्रमुख मुद्दा बन गया है।

देखा जाए तो इस मामले में एनजीटी का आदेश प्राकृतिक जल स्रोतों के उपयोग पर भविष्य की नीतियों को प्रभावित कर सकता है। यदि प्राकृतिक झरनों (स्रोतों) के पानी को भी भूजल की तरह नियंत्रित किया जाता है, तो उद्योगों को इसके उपयोग का रिकॉर्ड रखना, पानी की मात्रा मापना, पंजीकरण कराना और तय नियमों के अनुसार रॉयल्टी का भुगतान करना पड़ सकता है।

एनजीटी ने इस मामले में स्पष्ट कर दिया है कि जमीन के नीचे से निकलने वाला प्राकृतिक झरने का पानी भी एक महत्वपूर्ण जल संसाधन है और इसके अनियंत्रित औद्योगिक उपयोग पर स्पष्ट नियम होना जरूरी है।