जापानी वैज्ञानिकों का बड़ा खुलासा, भूस्खलन का खतरा जानने में ढलान की तीव्रता क्षेत्रफल से ज्यादा महत्वपूर्ण साबित हुई।
एयरबोर्न एलडार तकनीक से अध्ययन, मिट्टी की मोटाई और ढलान के आधार पर अब भूस्खलन का अनुमान होगा आसान।
भारी बारिश से बढ़ते खतरे के बीच नई खोज, पहाड़ी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन को मिलेगी बेहतर दिशा।
शोध में सामने आया, भूस्खलन की गहराई तय करने में जमीन की ढलान निभाती है सबसे अहम भूमिका।
यूनिवर्सिटी ऑफ त्सुकुबा का अध्ययन, जलवायु परिवर्तन के दौर में भूस्खलन जोखिम आकलन के लिए नई उम्मीद।
देश और दुनिया के कई पहाड़ी इलाकों में भारी बारिश और भूकंप के कारण भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं। अचानक मिट्टी और चट्टानों के खिसकने से लोगों की जान और संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचता है। ऐसे में यह पता लगाना जरूरी हो गया है कि कौन से क्षेत्र भूस्खलन के लिहाज से अधिक संवेदनशील हैं।
बुधवार, 26 अगस्त, 2026 की सुबह, नेपाल-तिब्बत सीमावर्ती इलाके में अचानक भयानक बाढ़ और भूस्खलन हुआ। यह आपदा हिमालय की ऊंची चोटियों से शुरू हुई, जहां से बर्फ, चट्टान, कीचड़ और पानी का एक विनाशकारी सैलाब नीचे की ओर बढ़ा और गांवों तथा सीमा पर स्थित व्यापारिक केंद्र से टकराया। इस घटना ने भारी जान-मान का नुसकान किया। नेपाल में लोगों को बचाने का काम अभी भी किया जा रहा है।
अब जापान के वैज्ञानिकों ने एक नए अध्ययन में बताया है कि भूस्खलन के खतरे को समझने में जमीन की ढलान सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, किसी ढलान का कोण और वहां मौजूद मिट्टी की मोटाई से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वहां भूस्खलन का खतरा कितना है।
जापान की यूनिवर्सिटी ऑफ त्सुकुबा के शोधकर्ताओं ने भूस्खलन को समझने के लिए आधुनिक लेजर तकनीक का इस्तेमाल किया। वैज्ञानिकों ने हवाई सर्वेक्षण से मिले उच्च गुणवत्ता वाले आंकड़ों का अध्ययन किया। अध्ययन 'साइंटिफिक रिपोर्ट्स' पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
एयरबोर्न एलआईडार नाम की इस तकनीक से जमीन की सतह की बहुत सटीक जानकारी मिलती है। शोधकर्ताओं ने भारी बारिश के बाद प्रभावित हुए क्षेत्रों के भूस्खलन से पहले और बाद के नक्शों की तुलना की। इसके जरिए उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि भूस्खलन का क्षेत्रफल, उसकी गहराई और ढलान की स्थिति के बीच क्या संबंध है।
बड़े क्षेत्रफल से नहीं, ढलान से तय होती है गहराई
अध्ययन में वैज्ञानिकों को पता चला कि भूस्खलन का आकार यानी उसका क्षेत्रफल उसकी गहराई का सही अनुमान नहीं देता। पहले माना जाता था कि बड़ा भूस्खलन अधिक गहरा भी होगा, लेकिन नए शोध में यह संबंध कमजोर पाया गया। खासकर उन भूस्खलनों में जो जमीन की ऊपरी पतली मिट्टी की परतों में होते हैं, क्षेत्रफल और गहराई के बीच सीधा संबंध नहीं दिखाई दिया। इसके बजाय ढलान की तीव्रता का प्रभाव कहीं अधिक मजबूत पाया गया।
वैज्ञानिकों के अनुसार, जिस स्थान पर ढलान अधिक खड़ी होती है, वहां मिट्टी की परत के खिसकने की आशंका और उसकी गहराई एक निश्चित पैटर्न के अनुसार बदलती है।
पुराने सिद्धांत को मिला नया प्रमाण
भूस्खलन को समझने के लिए वैज्ञानिक लंबे समय से ‘इनफाइनाइट स्लोप स्टेबिलिटी’ सिद्धांत का इस्तेमाल करते आए हैं। इस सिद्धांत के अनुसार, ढलान का कोण और मिट्टी की मोटाई किसी पहाड़ी क्षेत्र की स्थिरता को प्रभावित करते हैं।
नए अध्ययन में बड़ी संख्या में वास्तविक भूस्खलन घटनाओं के आंकड़ों के आधार पर इस सिद्धांत की पुष्टि हुई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अब वास्तविक परिस्थितियों में भी यह साफ हो गया है कि ढलान और मिट्टी की परत भूस्खलन के मुख्य कारणों में शामिल हैं।
खतरे वाले क्षेत्रों की पहचान होगी आसान
इस खोज से भविष्य में भूस्खलन की चेतावनी प्रणाली को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ढलान की तीव्रता और मिट्टी की मोटाई जैसी सरल जानकारियों के आधार पर जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है। इससे पहाड़ी इलाकों के लिए बेहतर खतरा मानचित्र तैयार किए जा सकेंगे। साथ ही, प्रशासन को आपदा से पहले तैयारी करने और लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने में सहायता मिलेगी।
जलवायु परिवर्तन के दौर में महत्वपूर्ण खोज
जलवायु परिवर्तन के कारण कई क्षेत्रों में तेज बारिश और अचानक मौसम बदलाव की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे भूस्खलन का खतरा भी बढ़ सकता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ त्सुकुबा का यह अध्ययन प्राकृतिक आपदाओं को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह बताता है कि भूस्खलन का खतरा केवल उसके आकार से नहीं, बल्कि जमीन की बनावट और ढलान की स्थिति से भी जुड़ा होता है। भविष्य में इस जानकारी का इस्तेमाल सुरक्षित निर्माण, बेहतर आपदा प्रबंधन और लोगों की सुरक्षा के लिए किया जा सकता है।