एआई आधारित रोबोट, लेजर और स्मार्ट स्प्रेयर खेतों में खरपतवार हटाने का तरीका बदलकर खेती को अधिक आधुनिक बना सकते हैं।
नई तकनीक से रासायनिक दवाओं का इस्तेमाल घटेगा, फसलों को नुकसान कम होगा और कृषि मजदूरों की सुरक्षा बेहतर हो सकती है।
रोबोटिक खरपतवार नियंत्रण मशीनों की कीमत 75 हजार डॉलर से अधिक, जबकि कुछ लेजर प्रणालियों की लागत दस लाख डॉलर से ऊपर है।
अलग-अलग क्षेत्रों में खरपतवारों की प्रजातियां बदलने से एआई मशीनों को पहचानने में परेशानी हो सकती है, जिससे स्थानीय प्रशिक्षण जरूरी होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, तकनीक के साथ फसल चक्र, उचित जुताई और दूसरे उपाय अपनाना जरूरी है, ताकि खरपतवार नियंत्रण प्रभावी और टिकाऊ बने।
खेती-किसानी की दुनिया तेजी से बदल रही है। अब खेतों में खरपतवार यानी फसलों के साथ उगने वाली अनचाही घास को हटाने के लिए किसानों को केवल मजदूरों और रासायनिक दवाओं पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), रोबोट, लेजर और आधुनिक मशीनें इस काम को आसान बना सकती हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि खरपतवार नियंत्रण की यह नई तकनीक खेती में तीसरी बड़ी क्रांति साबित हो सकती है। हालांकि इसकी ऊंची कीमत और कुछ दूसरी चुनौतियां किसानों के लिए परेशानी भी खड़ी कर सकती हैं।
अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिसिसिपी और कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन में इन नई तकनीकों के फायदे और नुकसान बताए हैं। यह अध्ययन ‘इंजीनियरिंग’ नामक वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
तीन तकनीकें बदल सकती हैं खेती का तरीका
शोधकर्ताओं ने खरपतवार नियंत्रण की तीन प्रमुख तकनीकों पर ध्यान दिया है। इनमें एआई की मदद से चलने वाले लेजर, रोबोटिक निराई मशीनें और सटीक छिड़काव करने वाले स्प्रेयर शामिल हैं। इन मशीनों की खासियत यह है कि ये कैमरों और कंप्यूटर की मदद से फसल और खरपतवार के बीच अंतर पहचान सकती हैं।
जैसे ही मशीन को खरपतवार दिखाई देता है, वह उसे लेजर से नष्ट कर सकती है, जड़ों समेत मिट्टी से निकाल सकती है या उस पर जरूरत के अनुसार दवा का छिड़काव कर सकती है।
इससे खेत में हर जगह रासायनिक दवा छिड़कने की जरूरत कम हो सकती है। फसल को नुकसान पहुंचने का खतरा भी घट सकता है। यूनिवर्सिटी ऑफ मिसिसिपी के शोधकर्ता स्टीफन ड्यूक के अनुसार, पिछले 100 वर्षों में खरपतवार प्रबंधन में दो बड़े बदलाव आए हैं। पहला सिंथेटिक खरपतवारनाशक दवाओं का इस्तेमाल और दूसरा ऐसी फसलों का विकास, जो कुछ खरपतवारनाशकों को सहन कर सकती हैं। अब एआई आधारित सटीक तकनीक तीसरी बड़ी क्रांति बन सकती है।
जैविक खेती करने वालों को मिल सकती है राहत
जैविक खेती करने वाले किसानों के लिए यह तकनीक खास तौर पर फायदेमंद साबित हो सकती है। ऐसे किसान सिंथेटिक खरपतवारनाशकों का इस्तेमाल नहीं करते। इसलिए उन्हें खेतों से अनचाही घास हटाने के लिए अक्सर मजदूरों पर निर्भर रहना पड़ता है।
लेकिन आज खेती में मजदूर मिलना मुश्किल होता जा रहा है और उनकी मजदूरी भी बढ़ रही है। ऐसे में रोबोटिक मशीनें किसानों का समय और मेहनत बचा सकती हैं।
कॉर्नेल यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता लिन सोसनोस्की के मुताबिक, फल और सब्जियों की कई फसलें खरपतवारनाशक दवाओं के प्रति संवेदनशील होती हैं। दवाओं से इन फसलों को नुकसान पहुंच सकता है। सटीक तकनीक से दवा को केवल खरपतवार तक पहुंचाकर फसल को बचाने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा, खेतों में रसायनों का इस्तेमाल कम होने से कृषि मजदूरों का दवाओं से संपर्क घट सकता है। पर्यावरण और फसलों पर रासायनिक अवशेषों का बोझ भी कम होने की संभावना है।
लाखों रुपये की मशीन, हर किसान के बस की बात नहीं
इन तकनीकों के फायदे जितने आकर्षक हैं, उनकी कीमत उतनी ही बड़ी चुनौती है। कुछ रोबोटिक और यांत्रिक खरपतवार नियंत्रण मशीनों की कीमत करीब 75 हजार डॉलर या उससे अधिक हो सकती है। वहीं, लेजर से खरपतवार नष्ट करने वाली कुछ मशीनों की कीमत 10 लाख डॉलर से भी ज्यादा पहुंच सकती है।
भारतीय मुद्रा में यह रकम करोड़ों रुपये तक बैठ सकती है। ऐसे में छोटे और सीमांत किसानों के लिए इन मशीनों को खरीदना आसान नहीं होगा।
बड़े खेतों और महंगी फसलों की खेती करने वाले किसानों के लिए इनका खर्च उठाना संभव हो सकता है, लेकिन हर किसान के लिए ऐसा करना मुश्किल है। भविष्य में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ने से कुछ मशीनें सस्ती हो सकती हैं, फिर भी उनकी उपलब्धता और लागत अहम सवाल बने रहेंगे।
खरपतवार भी अपना तरीका बदल सकते हैं
नई तकनीक के सामने एक और चुनौती है खरपतवारों का बदलता स्वरूप। कुछ खरपतवार फसलों जैसे दिखते हैं। इसे ‘क्रॉप मिमिक्री’ कहा जाता है। यदि ऐसी घास मशीनों की नजर से बच जाती है, तो वह बढ़कर बीज पैदा कर सकती है। धीरे-धीरे ऐसी खरपतवारों की संख्या बढ़ने का खतरा है, जिन्हें पहचानना मशीनों के लिए मुश्किल हो।
इसके अलावा, एक क्षेत्र में प्रशिक्षित एआई मॉडल दूसरे क्षेत्र में सही नतीजे नहीं दे सकता। अमेरिका के पश्चिमी हिस्सों में विकसित तकनीक वहां की जलवायु और खरपतवारों के हिसाब से तैयार हो सकती है, लेकिन दक्षिण-पूर्वी क्षेत्रों में उसे अलग प्रजातियों की पहचान करने में परेशानी हो सकती है।
ज्यादा जुताई करने वाली रोबोटिक मशीनें मिट्टी की सेहत को भी प्रभावित कर सकती हैं। वहीं, सटीक छिड़काव से खरपतवारनाशकों का इस्तेमाल कम होने पर भी दवाओं के प्रति प्रतिरोध की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी।
तकनीक के साथ समझदारी भी जरूरी
वैज्ञानिकों का संदेश साफ है कि आधुनिक मशीनें खरपतवार की समस्या को कम कर सकती हैं, लेकिन उसे पूरी तरह खत्म नहीं कर सकतीं। किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार प्रशिक्षित तकनीक अपनाने के साथ फसल चक्र, उचित जुताई और खरपतवार नियंत्रण के दूसरे तरीकों पर भी ध्यान देना होगा।
आने वाले समय में खेती का भविष्य केवल बड़ी मशीनों पर नहीं, बल्कि ऐसी तकनीक पर निर्भर करेगा जो सस्ती हो, स्थानीय जरूरतों के अनुकूल हो और मिट्टी तथा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना किसानों की मेहनत कम करे।