अल्मा टेलीस्कोप ने पहली बार दूर आकाशगंगाओं में न्यूट्रल गैस का सीधा पता लगाया, तारे बनने की प्रक्रिया समझी गई।
वैज्ञानिकों ने [ओ प्रथम] 145 माइक्रोमीटर लाइन से प्रारंभिक ब्रह्मांड की आकाशगंगाओं में ठंडी गैस की सटीक पहचान की।
[सी द्वितीय] संकेत की अस्पष्टता दूर हुई, अब न्यूट्रल और आयनित गैस को अलग-अलग अध्ययन करना संभव हो गया है।
शुरुआती आकाशगंगाएं अत्यधिक घनी पाई गई, जहां तारे तेजी से बनते थे, लेकिन ऊर्जा स्तर अपेक्षाकृत संतुलित था।
यह खोज ब्रह्मांड के शुरुआती विकास को समझने में नई दिशा देती है, आकाशगंगा निर्माण की प्रक्रिया स्पष्ट हुई है।
वैज्ञानिकों ने ब्रह्मांड के शुरुआती दौर की आकाशगंगाओं के बारे में एक बड़ी खोज की है। इस शोध से यह समझने में मदद मिलती है कि करोड़ों साल पहले तारे कैसे बनते थे और आकाशगंगाएं कैसे विकसित हुई। यह अध्ययन बहुत दूर स्थित आकाशगंगाओं में मौजूद उस “ठंडी गैस” पर आधारित है जिससे तारे बनते हैं।
अब तक वैज्ञानिक दूर की आकाशगंगाओं में तारे और गर्म गैस को तो देख पाते थे, लेकिन उस ठंडी और “न्यूट्रल गैस” को सीधे देखना मुश्किल था, जो वास्तव में नए तारों के बनने का मुख्य ईंधन होती है।
तारे बनने की असली सामग्री पर लंबे समय से था रहस्य
आज के आधुनिक टेलीस्कोप जैसे जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप और हबल स्पेस टेलीस्कोप बहुत दूर की आकाशगंगाओं में तारे और चमकदार गैस को साफ देख सकते हैं। लेकिन वे उस ठंडी गैस को सीधे नहीं पकड़ पाते जिससे तारे बनते हैं।
वैज्ञानिक पहले एक खास संकेत “[सी द्वितीय] एमिशन लाइन” का इस्तेमाल करते थे, लेकिन समस्या यह थी कि यह संकेत केवल ठंडी गैस से नहीं आता, बल्कि गर्म और आयनित गैस से भी आता है। इसलिए इससे सही जानकारी मिलना मुश्किल हो जाता था। यह शोध एस्ट्रोफिजिकल पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
नई तकनीक से मिला साफ संकेत
इस समस्या को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने एक नया तरीका अपनाया। उन्होंने ऑक्सीजन से निकलने वाली एक खास रोशनी, जिसे “[ओ प्रथम ] 145 माइक्रोमीटर एमिशन लाइन” कहा जाता है, का अध्ययन किया। यह संकेत सीधे न्यूट्रल गैस से आता है, इसलिए यह बहुत साफ और भरोसेमंद माना जाता है।
इसके साथ ही उन्होंने “[एन द्वितीय] 205 माइक्रोमीटर एमिशन लाइन” का भी अध्ययन किया, जो केवल आयनित गैस से आती है। दोनों संकेतों की तुलना करके वैज्ञानिक यह समझ पाए कि असली ठंडी गैस कहां मौजूद है और कितनी है।
अल्मा टेलीस्कोप से की गई महत्वपूर्ण खोज
इस शोध को एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम ने किया, जिसका नेतृत्व जापान के वैज्ञानिकों ने किया है। इसमें अटाकामा लार्ज मिलीमीटर/सब-मिलीमीटर ऐरे (अल्मा) टेलीस्कोप का उपयोग किया गया, जो दुनिया के सबसे शक्तिशाली रेडियो टेलीस्कोपों में से एक है।
शोधकर्ताओं ने ब्रह्मांड की उन चार आकाशगंगाओं का अध्ययन किया जो लगभग 70 से 80 करोड़ साल बिग बैंग के बाद की स्थिति में थीं। अल्मा की मदद से वैज्ञानिकों ने पहली बार इन चारों आकाशगंगाओं में [ओ आई] 145 माइक्रोमीटर संकेत को साफ-साफ देखा।
न्यूट्रल गैस की सीधी पहचान संभव हुई
इस खोज का सबसे बड़ा महत्व यह है कि अब वैज्ञानिक सीधे यह पहचान सकते हैं कि किसी आकाशगंगा में कितनी ठंडी और न्यूट्रल गैस मौजूद है। पहले यह केवल अनुमान के आधार पर किया जाता था।
जब [एन द्वितीय] संकेत बहुत कमजोर मिला, तो वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि अधिकतर गैस न्यूट्रल है। इससे यह भी साफ हुआ कि पहले जिस [सी दितीय] संकेत को देखा जाता था, वह मुख्य रूप से इसी न्यूट्रल गैस से आता है।
पुरानी आकाशगंगाएं बहुत घनी थीं
शोध में यह भी पाया गया कि शुरुआती आकाशगंगाओं में गैस का घनत्व बहुत अधिक था। यह घनत्व उन “स्टारबर्स्ट” आकाशगंगाओं जैसा था, जहां बहुत तेजी से तारे बनते हैं।
हालांकि, इन आकाशगंगाओं में ऊर्जा का स्तर अपेक्षाकृत कम था। इसका मतलब है कि ये आकाशगंगाएं बहुत घनी और कॉम्पैक्ट थीं, लेकिन उनमें तारे बनने की प्रक्रिया संतुलित तरीके से चल रही थी।
ब्रह्मांड को समझने की नई दिशा
वैज्ञानिकों के अनुसार, यह खोज ब्रह्मांड के शुरुआती इतिहास को समझने में एक नया रास्ता खोलती है। अब [ओ प्रथम] संकेत को एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में देखा जाएगा, जिससे यह समझा जा सकेगा कि आकाशगंगाएं कैसे बनीं और विकसित हुई।
शोधकर्ताओं ने कहा है कि आगे वे और भी आकाशगंगाओं का अध्ययन करेंगे और जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप और अल्मा जैसी सुविधाओं को मिलाकर ब्रह्मांड के विकास की पूरी कहानी को समझने की कोशिश करेंगे।
यह अध्ययन हमें यह बताता है कि अरबों साल पहले ब्रह्मांड में तारे बनने की प्रक्रिया कैसी थी और हमारी अपनी आकाशगंगा, मिल्की वे, कैसे अस्तित्व में आई।