नासा के एमिट मिशन ने दुनिया के प्रमुख रेगिस्तानी क्षेत्रों की खनिज संरचना का उच्च-रिजॉल्यूशन नक्शा तैयार किया।
नई शोध से धूल में मौजूद आयरन ऑक्साइड की मात्रा संबंधी जलवायु मॉडल की अनिश्चितता छह गुना घटी।
वैज्ञानिकों ने पाया कि सहारा क्षेत्र की धूल अधिक सूर्य ऊर्जा अवशोषित कर वातावरण को गर्म कर सकती।
अध्ययन के अनुसार एशिया के कुछ क्षेत्रों की धूल अधिक परावर्तक है, जिससे ठंडक का प्रभाव बढ़ता।
शोध के बाद वैज्ञानिक अब धूल के परिवहन, कण आकार और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर ध्यान देंगे।
पृथ्वी के वातावरण में मौजूद खनिज धूल (मिनरल डस्ट) लंबे समय से वैज्ञानिकों के लिए एक रहस्य बनी हुई थी। यह धूल मुख्य रूप से सहारा रेगिस्तान, मध्य पूर्व और पूर्वी एशिया जैसे शुष्क क्षेत्रों से उड़कर वातावरण में पहुंचती है। अब वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने इस धूल के बारे में नई और महत्वपूर्ण जानकारी हासिल की है, जिससे जलवायु परिवर्तन को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी।
यह शोध अमेरिका के कॉर्नेल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किया गया है। इसके नतीजे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित हुए हैं।
जलवायु पर धूल का असर
वातावरण में मौजूद धूल पृथ्वी के तापमान को प्रभावित करती है। कुछ परिस्थितियों में यह सूर्य की रोशनी को वापस अंतरिक्ष में भेजकर पृथ्वी को ठंडा करती है। वहीं कुछ स्थितियों में यह सूर्य की ऊर्जा को अपने अंदर सोख लेती है और वातावरण को गर्म बनाती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, धूल का यह प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उसमें कौन-कौन से खनिज मौजूद हैं। विशेष रूप से लोहे से भरपूर खनिज, जिन्हें आयरन ऑक्साइड कहा जाता है, सूर्य की रोशनी को अधिक मात्रा में अवशोषित करते हैं। यही कारण है कि इन खनिजों की सही मात्रा जानना बेहद जरूरी था।
नासा के एमिट मिशन की बड़ी भूमिका
इस शोध में नासा के एमिट मिशन से हासिल किए गए आंकड़ों का उपयोग किया गया। यह उपकरण अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर लगाया गया है। एमिट अत्याधुनिक तकनीक की मदद से पृथ्वी के शुष्क इलाकों की सतह पर मौजूद खनिजों का बहुत बारीकी से अध्ययन करता है।
इस उपकरण की खास बात यह है कि यह लगभग 60 मीटर के उच्च रिजॉल्यूशन पर जमीन की संरचना की जानकारी दे सकता है। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिली कि किन क्षेत्रों की मिट्टी में कौन से खनिज मौजूद हैं और हवा में उड़ने वाली धूल की संरचना कैसी होगी। पहली बार वैज्ञानिकों को दुनिया के अधिकांश प्रमुख रेगिस्तानी क्षेत्रों के खनिजों का लगभग वैश्विक स्तर का नक्शा प्राप्त हुआ है।
अनिश्चितता में भारी कमी
इससे पहले वैज्ञानिकों को यह पता नहीं था कि वातावरण में मौजूद धूल में आयरन ऑक्साइड की मात्रा कितनी है। यही जलवायु मॉडल तैयार करने में सबसे बड़ी चुनौती थी।
नई शोध के अनुसार, आयरन ऑक्साइड से जुड़ी अनिश्चितता में छह गुना से अधिक की कमी आई है। पहले यह अनिश्चितता 0.62 वाट प्रति वर्ग मीटर थी, जो अब घटकर केवल 0.1 वाट प्रति वर्ग मीटर रह गई है। इसका मतलब है कि अब वैज्ञानिक अधिक भरोसे के साथ यह बता सकते हैं कि धूल पृथ्वी को गर्म कर रही है या ठंडा।
सहारा रेगिस्तान से मिले अहम संकेत
शोध में सबसे अधिक सुधार सहारा रेगिस्तान से संबंधित आंकड़ों में देखा गया। सहारा दुनिया में वातावरणीय धूल का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता है।
नई जानकारी की मदद से वैज्ञानिकों ने सहारा क्षेत्र में धूल के प्रभाव से जुड़ी मॉडलिंग की त्रुटियों को लगभग 80 प्रतिशत तक कम कर दिया। इससे उपग्रहों द्वारा प्राप्त वास्तविक आंकड़ों और कंप्यूटर मॉडलों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित हुआ।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि उत्तरी अफ्रीका के कुछ क्षेत्रों की धूल में लोहे वाले खनिज अधिक हैं, जिससे वहां की धूल वातावरण को अपेक्षाकृत अधिक गर्म कर सकती है। दूसरी ओर, एशिया के कुछ क्षेत्रों की धूल अधिक परावर्तक है और ठंडक पैदा करने में मदद करती है।
अब शोध का नया केंद्र
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस अध्ययन ने धूल की संरचना से जुड़ी बड़ी समस्या को काफी हद तक हल कर दिया है। अब शोधकर्ताओं का ध्यान इस बात पर अधिक होगा कि धूल वातावरण में कैसे फैलती है, कितनी दूर तक जाती है और समय के साथ उसमें क्या बदलाव आते हैं। साथ ही, भविष्य में यह भी अध्ययन किया जाएगा कि जलवायु परिवर्तन का धूल के स्रोतों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
भविष्य के लिए महत्वपूर्ण कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि यह शोध केवल धूल और तापमान के संबंध को समझने तक सीमित नहीं है। इससे महासागरों में पोषक तत्वों की आपूर्ति, बर्फ की सतह पर धूल के प्रभाव और बादलों के निर्माण जैसी प्रक्रियाओं को भी बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा।
जलवायु परिवर्तन के दौर में पृथ्वी की ऊर्जा व्यवस्था को सही ढंग से समझना बेहद जरूरी है। ऐसे में यह नई खोज वैज्ञानिकों को अधिक सटीक जलवायु अनुमान लगाने में मदद करेगी और भविष्य की पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए मजबूत आधार प्रदान करेगी।