दिल्ली में डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों से बचाव के लिए दवा का छिड़काव करता स्वास्थ्य कर्मी; फोटो: रूहानी कौर/सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट 
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

भारत में डेंगू के मच्छरों में कीटनाशकों के प्रति बढ़ रहा प्रतिरोध, दिल्ली विश्वविद्यालय की रिसर्च ने बढ़ाई चिंताएं

दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि डेंगू फैलाने वाले एडीज एजिप्टी मच्छर आम कीटनाशकों के खिलाफ धीरे-धीरे प्रतिरोध विकसित कर रहे हैं, जिससे भविष्य में डेंगू नियंत्रण की चुनौती बढ़ सकती है।

Lalit Maurya

  • भारतीय शोधकर्ताओं द्वारा जारी नई रिसर्च में सामने आया है कि डेंगू फैलाने वाले एडीज एजिप्टी मच्छर दुनिया भर में व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक अल्फा-साइपरमेथ्रिन के प्रति धीरे-धीरे प्रतिरोध विकसित करने लगे हैं।

  • हालांकि यह प्रतिरोध अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में यही कीटनाशक मच्छरों पर कम असरदार हो सकता है, जिससे डेंगू नियंत्रण की रणनीतियों को बड़ा झटका लगेगा।

  • अध्ययन में यह भी स्पष्ट हुआ कि मच्छरों के शरीर में बीटा-एस्टरेज सहित कुछ विशेष एंजाइम तेजी से सक्रिय होकर कीटनाशक को निष्क्रिय करने लगते हैं, जिससे वे जीवित बच निकलते हैं।

  • दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं का मानना है कि यही वह निर्णायक समय है जब प्रतिरोध की इस प्रक्रिया को समझकर इसे फैलने से रोका जा सकता है। विशेषज्ञों ने कीटनाशकों का बारी-बारी से उपयोग, मच्छरों के प्रजनन स्थलों का उन्मूलन, जैविक नियंत्रण उपायों और नियमित निगरानी को भविष्य की सबसे प्रभावी रणनीति बताया है।

  • यह अध्ययन याद दिलाता है कि डेंगू से लड़ाई केवल दवाओं से नहीं, बल्कि मच्छरों के बदलते जैविक व्यवहार को समझकर ही जीती जा सकती है।

हर साल डेंगू सहित मच्छरों से फैलने वाली बीमारियां दुनिया भर में करोड़ों लोगों को अपनी चपेट में लेती हैं। लेकिन इन बीमारियों से बचाव का बड़ा हथियार माने जाने वाले कीटनाशक अब धीरे-धीरे अपनी धार खो सकते हैं।

इस बारे में भारत में हुए एक नए अध्ययन ने संकेत दिए हैं कि डेंगू फैलाने वाले एडीज एजिप्टी मच्छर आमतौर पर दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक ‘अल्फा-साइपरमेथ्रिन’ के खिलाफ धीरे-धीरे प्रतिरोध प्रतिरोध (रेजिस्टेंस) विकसित करना शुरू कर चुके हैं। आसान शब्दों में कहें तो डेंगू फैलाने वाले ये मच्छर अब धीरे-धीरे कीटनाशकों से लड़ना सीख रहे हैं, जोकि बेहद चिंताजनक है।

हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि यह प्रतिरोध अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन इसे समय रहते संभालना बेहद जरूरी है। यदि इस चेतावनी को नजरअंदाज किया गया तो भविष्य में यह कीटनाशक मच्छरों पर बेअसर हो सकता है, जिससे डेंगू नियंत्रण की कोशिशों को बड़ा झटका लग सकता है।

यह अध्ययन दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ताओं रोहित लखवानी, काजल नरवाल, संस्कृति ओझा, श्रेया झा, रूपा रानी सामल और सरिता कुमार द्वारा किया गया है, जिसके नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल फ्रंटियर्स इन ट्रॉपिकल डिजीज में प्रकाशित हुए हैं।

क्या है नई चुनौती?

दिल्ली विश्वविद्यालय और अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर रोहित लखवानी के मुताबिक, परीक्षण के दौरान अल्फा-साइपरमेथ्रिन की मानक मात्रा के संपर्क में आने पर 97.9 फीसदी मच्छर मर गए, लेकिन करीब दो फीसदी मच्छरों का बच जाना इस बात का संकेत है कि उनमें इस कीटनाशक के खिलाफ प्रतिरोध विकसित होने की शुरुआत हो चुकी है।

ऐसे में शोधकर्ताओं का कहना है कि यही वह समय है, जब इस प्रतिरोध को समझकर प्रभावी रणनीति बनाई जा सकती है, ताकि भविष्य में यह समस्या गंभीर रूप न ले।

आखिर कैसे बच निकलते हैं मच्छर? 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कैसे मच्छर इस कीटनाशक के प्रभाव से बच निकलते हैं? वैज्ञानिकों ने पाया कि जब कीटनाशक मच्छर के शरीर में प्रवेश करता है, तो उसकी कोशिकाओं में एक तरह का "रक्षा अलार्म" सक्रिय हो जाता है। इसके बाद मच्छर तेजी से ऐसे विशेष प्रोटीन और एंजाइम बनाने लगता है, जो जहरीले रसायनों को तोड़कर उन्हें कम नुकसानदायक बना देते हैं।

इसके बाद ये रसायन शरीर से आसानी से बाहर निकल जाते हैं, जिससे मच्छर जीवित बच जाता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक यही प्राकृतिक रक्षा प्रणाली धीरे-धीरे मच्छरों को कीटनाशकों के प्रति अधिक सहनशील बनाती है।

बीटा-एस्टरेज बना सबसे बड़ा हथियार

अध्ययन में पांच प्रमुख डिटॉक्सिफिकेशन एंजाइमों की जांच की गई। इनमें बीटा-एस्टरेज (β-esterase) सबसे अधिक सक्रिय पाया गया। कीटनाशक के संपर्क में आने के बाद इस एंजाइम की सक्रियता 21 गुणा से अधिक बढ़ गई और यह अल्फा-साइपरमेथ्रिन के अणुओं से सबसे मजबूती से जुड़ा।

शोधकर्ताओं के अनुसार, यही एंजाइम इस कीटनाशक के खिलाफ मच्छरों की सबसे प्रभावी जैविक ढाल बन रहा है। इसके अलावा सीवाईपी450 और जीएसटी जैसे अन्य एंजाइम भी विषैले रसायनों को निष्क्रिय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते पाए गए।

प्रोफेसर सरिता कुमार का कहना है, "जब कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोध अभी शुरुआती चरण में है, ऐसे समय में यह समझना बेहद महत्वपूर्ण है कि आखिर कौन-से जैविक तंत्र मच्छरों को इन कीटनाशकों से बचने में मदद कर रहे हैं।"

क्यों बढ़ रही है यह समस्या?

विशेषज्ञों का कहना है कि दशकों से मच्छरों पर नियंत्रण के लिए लगातार एक जैसे रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। समय के साथ यही दबाव मच्छरों में जैव-रासायनिक और आनुवंशिक बदलाव पैदा करता है, जिससे कुछ मच्छर जीवित बच जाते हैं और धीरे-धीरे प्रतिरोधी आबादी विकसित होने लगती है।

यही वजह है कि कई देशों में पहले से ही कुछ कीटनाशकों की प्रभावशीलता कम होती जा रही है।

वैज्ञानिकों ने क्या सुझाया?

शोधकर्ताओं के अनुसार, यदि अभी से प्रतिरोध प्रबंधन की रणनीतियां अपनाई जाएं तो मौजूदा कीटनाशकों की उपयोगिता लंबे समय तक बनाए रखी जा सकती है।

इसके लिए अलग-अलग कीटनाशकों का बारी-बारी से उपयोग (इंसेक्टिसाइड रोटेशन), मच्छरों के प्रजनन स्थलों को खत्म करना, जैविक नियंत्रण तकनीकों का इस्तेमाल और उनकी प्रतिरोध क्षमता की नियमित निगरानी बेहद जरूरी होगी।

वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन प्रयोगशाला में पाले गए एडीज एजिप्टी मच्छरों पर किया गया है। अलग-अलग क्षेत्रों और प्राकृतिक परिस्थितियों में रहने वाले मच्छरों में प्रतिरोध का स्तर इससे भिन्न हो सकता है। इसके बावजूद अध्ययन ने लगातार यह साबित किया कि बीटा-एस्टरेज ही अल्फा-साइपरमेथ्रिन के खिलाफ मच्छरों की सबसे प्रमुख रक्षा प्रणाली है।

डॉक्टर कुमार के मुताबिक इस अध्ययन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह केवल यह नहीं बताता कि प्रतिरोध विकसित हो रहा है, बल्कि यह भी समझाता है कि मच्छरों के शरीर में यह प्रक्रिया आणविक स्तर पर कैसे शुरू होती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, अभी प्रतिरोध उतना विकसित नहीं हुआ है और यही वह अवसर है जब स्वास्थ्य एजेंसियां समय रहते प्रभावी कदम उठाकर भविष्य में डेंगू नियंत्रण को मजबूत बना सकती हैं।

सच कहें तो यह अध्ययन याद दिलाता है कि डेंगू से जंग केवल अस्पतालों और दवाओं से नहीं जीती जा सकती। मच्छरों के बदलते जैविक व्यवहार को समझना और उसी के अनुरूप नियंत्रण रणनीतियां विकसित करना अब समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गया है।