सॉफ्टवेयर 68 हजार से अधिक ऐतिहासिक भूकंपों और प्रमुख भूगर्भीय फॉल्ट लाइनों के आंकड़ों का इस्तेमाल करता है। फोटो साभार: आईस्टॉक
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

भूकंप के खतरे से 6,500 से ज्यादा बड़े बांधों की जांच करेगा आईआईटी मद्रास का सॉफ्टवेयर

आईआईटी मद्रास का नया सॉफ्टवेयर देश के 6,500 से अधिक बड़े बांधों में भूकंप का खतरा पहचानकर सुरक्षा जांच को अधिक सटीक और प्रभावी बनाएगा।

Dayanidhi

  • आईआईटी मद्रास ने 6,500 से अधिक बड़े बांधों के भूकंप जोखिम का आकलन करने वाला नया सॉफ्टवेयर विकसित किया है।

  • सॉफ्टवेयर 68 हजार से अधिक ऐतिहासिक भूकंपों और प्रमुख भूगर्भीय फॉल्ट लाइनों के आंकड़ों का इस्तेमाल करता है।

  • नई तकनीक बांध की संरचना और प्राकृतिक कंपन अवधि को ध्यान में रखकर भूकंप के संभावित प्रभाव का आकलन करती है।

  • 70 महत्वपूर्ण बांधों के परीक्षण में कुछ कम जोखिम वाले बांध अधिक जोखिम वाली श्रेणी में शामिल हुए।

  • सॉफ्टवेयर शुरुआती जांच में मदद करेगा, लेकिन ज्यादा खतरे वाले बांधों की विस्तृत विशेषज्ञ जांच अभी भी जरूरी होगी।

भारत में बांधों की सुरक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास के शोधकर्ताओं ने ऐसा कंप्यूटर सॉफ्टवेयर तैयार किया है, जो देश के बड़े बांधों पर भूकंप के खतरे का अधिक सटीक आकलन करने में मदद कर सकता है। भारत में 6,500 से ज्यादा बड़े बांध हैं। इनमें से कई बांध काफी पुराने हो चुके हैं और इनके निर्माण के समय आज जैसी भूकंप संबंधी तकनीक उपलब्ध नहीं थी।

यह सॉफ्टवेयर भूकंप के पुराने आंकड़ों, बांध की स्थिति और उसकी बनावट को ध्यान में रखकर यह पता लगाने में मदद करता है कि किसी बांध पर भूकंप का कितना असर हो सकता है। यह शोध 'जर्नल ऑफ अर्थ सिस्टम साइंस' में प्रकाशित किया गया है।

68 हजार से ज्यादा भूकंपों का इस्तेमाल

शोधकर्ताओं ने इस तकनीक को विकसित करने के लिए 2600 ईसा पूर्व से साल 2019 तक आए भूकंपों के आंकड़ों का इस्तेमाल किया है। इसमें 68 हजार से ज्यादा भूकंपों की जानकारी शामिल है। इसके साथ ही देश में मौजूद प्रमुख भूगर्भीय दरारों और फॉल्ट लाइनों की जानकारी को भी जोड़ा गया है।

सॉफ्टवेयर का नाम पीएसएचए_इंडिया_आईआईटीएम रखा गया है। इसका इस्तेमाल करने के लिए इंजीनियर किसी बांध की जगह के बारे में जानकारी डाल सकते हैं। इसके बाद सॉफ्टवेयर अलग-अलग स्तर के भूकंप और उनके संभावित असर का आंकलन करता है। यह गणना बहुत लंबे समय, यहां तक कि 10 हजार साल तक की संभावित अवधि को ध्यान में रखकर की जा सकती है।

पुराने तरीके से क्यों अलग है यह तकनीक?

अब तक बांधों के भूकंप संबंधी खतरे का आकलन मुख्य रूप से देश के अलग-अलग भूकंपीय क्षेत्रों के आधार पर किया जाता रहा है। इसमें एक बड़े इलाके को एक ही भूकंप क्षेत्र मानकर वहां के लिए एक सामान्य खतरा तय किया जाता है।

लेकिन एक ही इलाके में बने दो बांधों की स्थिति एक जैसी नहीं होती। उनकी ऊंचाई, आकार, निर्माण सामग्री और जमीन की स्थिति अलग हो सकती है। ऐसे में भूकंप के दौरान दोनों बांधों पर एक जैसा असर होना जरूरी नहीं है।

आईआईटी मद्रास के शोधकर्ताओं ने इसी अंतर को ध्यान में रखा है। उनका सॉफ्टवेयर केवल जमीन के हिलने की तीव्रता नहीं देखता, बल्कि यह भी देखता है कि किसी खास बांध की अपनी कंपन क्षमता क्या है।

बांध की अपनी कंपन भी महत्वपूर्ण

हर बड़ी संरचना की एक प्राकृतिक कंपन अवधि होती है। इसे आसान भाषा में ऐसे समझा जा सकता है जैसे झूले को उसकी सही गति के साथ धक्का दिया जाए तो वह ज्यादा ऊंचा जाता है। इसी तरह भूकंप की तरंगें अगर किसी बांध की प्राकृतिक कंपन अवधि से मेल खाती हैं, तो बांध पर असर बढ़ सकता है।

इस कारण ऊंचे मिट्टी के बांध और मजबूत कंक्रीट के बांध भूकंप की एक जैसी तरंगों पर समान प्रतिक्रिया नहीं देते। नया सॉफ्टवेयर इसी अंतर को ध्यान में रखकर भूकंपीय खतरे का आकलन करता है।

70 महत्वपूर्ण बांधों पर किया गया परीक्षण

शोधकर्ताओं ने इस नई पद्धति को देश के 70 महत्वपूर्ण बांधों पर आजमाया। इसके आधार पर बांधों को कम, मध्यम और ज्यादा भूकंपीय खतरे वाली श्रेणियों में रखा गया। अध्ययन में यह भी सामने आया कि कुछ बांध, जिन्हें सामान्य भूकंपीय नक्शों के आधार पर कम खतरे वाला माना जा सकता था, उनकी अपनी संरचनात्मक विशेषताओं को ध्यान में रखने पर अधिक खतरे वाली श्रेणी में आ सकते हैं।

अंतिम सुरक्षा जांच का विकल्प नहीं

शोधकर्ताओं ने साफ किया है कि यह सॉफ्टवेयर बांध की सुरक्षा का अंतिम प्रमाण नहीं है। यह मुख्य रूप से शुरुआती जांच और प्राथमिकता तय करने के लिए बनाया गया है।

सॉफ्टवेयर में बांध के टूटने, दरार पड़ने या अत्यधिक भूकंप के दौरान होने वाले जटिल बदलावों का पूरा हिसाब नहीं लगाया जा सकता। इसके अलावा देश के सभी बांधों के नीचे की मिट्टी और चट्टानों की विस्तृत जानकारी भी उपलब्ध नहीं है। इसलिए प्रारंभिक आकलन में एक सामान्य आधार का इस्तेमाल किया जाता है। जिस बांध में ज्यादा खतरा दिखाई देता है, उसकी आगे विशेषज्ञों द्वारा विस्तृत जांच जरूरी होगी।

लाखों लोगों की सुरक्षा में मददगार

भारत में कई बांध पुराने हैं और इनके आसपास समय के साथ बड़ी आबादी बस गई है। ऐसे में किसी बड़े भूकंप के कारण बांध को नुकसान पहुंचने पर नीचे रहने वाले लोगों के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।

आईआईटी मद्रास का यह सॉफ्टवेयर ऐसे बांधों की पहचान करने में मदद कर सकता है, जहां पहले विस्तृत सुरक्षा जांच की जरूरत है। इससे सीमित इंजीनियरिंग संसाधनों और धन का इस्तेमाल प्राथमिकता के आधार पर किया जा सकेगा। बढ़ती भूकंपीय चुनौतियों और पुराने होते बांधों के बीच ऐसी वैज्ञानिक तकनीक देश की बांध सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में उपयोगी साबित हो सकती है।