छोटे मीठे पानी के तालाबों में पीएफएएस और भारी धातुओं की मात्रा पर्यावरणीय मानकों की सीमा से अधिक पाई गई है।
समुद्री तटों से हटाया गया कचरा अगले साल फिर लौट आता है, जिससे प्रदूषण चक्रवृद्धि दर से बढ़ता रहता है।
2030 तक प्लास्टिक प्रदूषण समाप्त करने का वैश्विक लक्ष्य तय है, पर कई देशों में ठोस क्रियान्वयन अब भी सीमित है।
सफाई अभियानों के लिए आवंटित धन कई स्थानों पर घटा है, जबकि प्रदूषण की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है।
दुनिया भर में प्लास्टिक प्रदूषण एक गंभीर समस्या बन चुका है। समुद्र तट पर पड़ा कचरा ही इसका पूरा सच नहीं है। प्लास्टिक टूटकर छोटे-छोटे टुकड़ों में बदल जाता है, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है। ये पानी, मिट्टी और हवा में फैल जाते हैं। जानवर, पक्षी और इंसान सभी इससे प्रभावित होते हैं।
हर साल लगभग 1.9 करोड़ टन प्लास्टिक नदियों, झीलों और समुद्रों में पहुंच जाता है। यह मात्रा हर साल बढ़ रही है। सफाई अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन जितना कचरा हटाया जाता है, उससे अधिक फिर से जमा हो जाता है। यह समस्या “चक्रवृद्धि ब्याज” की तरह बढ़ती रहती है। यह अध्ययन हेलियोन नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचा क्या है?
साल 2022 में कई देशों ने मिलकर कुनमिंग-मॉन्ट्रियल ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क को अपनाया। इसका उद्देश्य प्रकृति और जैव विविधता की रक्षा करना है। इस ढांचे के लक्ष्य सात में कहा गया है कि 2030 तक प्लास्टिक प्रदूषण को खत्म किया जाना चाहिए।
यह लक्ष्य बहुत स्पष्ट है। फिर भी, सवाल यह है कि जब लक्ष्य तय है, तो ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे?
समस्या केवल कचरे की नहीं है
प्लास्टिक केवल दिखने वाला कचरा नहीं है। समुद्री प्लास्टिक कचरे से पीएफएएस और भारी धातुएं निकलती हैं। ये रसायन पानी में मिल जाते हैं। छोटे तालाब और झीलें बंद प्रणाली होती हैं। वहां प्रदूषक बाहर नहीं जा पाते और समय के साथ उनकी मात्रा बढ़ती जाती है।
पक्षी और जानवर इस पानी को पीते हैं। इंसान भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होते हैं, जब वे ऐसे जानवरों का मांस खाते हैं जो प्रदूषित क्षेत्र में चरते हैं। पीएफएएस को “फॉरएवर केमिकल” कहा जाता है, क्योंकि ये लंबे समय तक वातावरण में बने रहते हैं और स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होते हैं।
नॉर्वे का उदाहरण
पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रसिद्ध देश नॉर्वे भी इस चुनौती का सामना कर रहा है। वहां सरकार ने प्लास्टिक रणनीति और कुछ योजनाएं बनाई हैं। इन योजनाओं में उत्पादकों की जिम्मेदारी, कचरा प्रबंधन में सुधार और मछली पकड़ने के जाल की निगरानी जैसे उपाय शामिल हैं।
सरकार ने समुद्री प्लास्टिक कचरे की सफाई के लिए धन भी दिया है। लेकिन पिछले वर्षों की तुलना में अब कम धन दिया जा रहा है। स्वयंसेवक और संगठन लगातार सफाई करते हैं, फिर भी हर साल नया कचरा समुद्र से बहकर तट पर आ जाता है।
इसका मतलब है कि सफाई जरूरी है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है।
लक्ष्य और हकीकत के बीच अंतर
वैश्विक समझौते महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय करते हैं। लेकिन वे सीधे कानून नहीं होते। हर देश को अपने स्तर पर कानून बनाना पड़ता है। यही प्रक्रिया धीमी होती है।
प्लास्टिक उद्योग कई देशों की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा है। प्लास्टिक सस्ता, हल्का और टिकाऊ होता है। इसका उपयोग पैकेजिंग, दवाइयों, निर्माण और कई अन्य क्षेत्रों में होता है। अगर उत्पादन कम किया जाए, तो उद्योगों और नौकरियों पर असर पड़ सकता है। इसी कारण सरकारें कठोर कदम उठाने में हिचकिचाती हैं।
सफाई बनाम रोकथाम
आज अधिकतर प्रयास सफाई पर आधारित हैं। समुद्र तटों से कचरा हटाया जाता है। लेकिन असली समस्या प्लास्टिक का उत्पादन और उसका अत्यधिक उपयोग है। जब तक उत्पादन कम नहीं होगा, तब तक प्रदूषण जारी रहेगा।
रोकथाम के लिए जरूरी है -
नए प्लास्टिक का उत्पादन घटाना
पुनर्चक्रण को बढ़ावा देना
कंपनियों को अधिक जिम्मेदार बनाना
लंबे समय की योजना बनाना
केवल सफाई करना ऐसे है जैसे बहते पानी में नाव से पानी निकालना, लेकिन छेद को बंद न करना।
राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी
पर्यावरण संरक्षण के लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए। लेकिन चुनावी राजनीति अक्सर छोटी अवधि की सोच पर आधारित होती है। प्लास्टिक उत्पादन कम करने के फायदे लंबे समय में दिखेंगे, जबकि आर्थिक लागत तुरंत दिखेगी। इसलिए कई सरकारें बड़े बदलाव से बचती हैं।
इसके अलावा, प्लास्टिक प्रदूषण एक अंतरराष्ट्रीय समस्या है। समुद्री धाराएं एक देश का कचरा दूसरे देश के तट पर ले जाती हैं। इससे जिम्मेदारी तय करना कठिन हो जाता है।
आगे का रास्ता
यदि 2030 तक प्लास्टिक प्रदूषण को सच में खत्म करना है, तो केवल घोषणाएं काफी नहीं हैं। जरूरी है -
प्लास्टिक उत्पादन पर सख्त नियंत्रण
लंबे समय और पर्याप्त वित्त पोषण
राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत और केंद्रीकृत प्रणाली
रसायनों और कचरे के नियमों को जोड़ना
छात्र और युवा इस मुद्दे को लेकर बहुत चिंतित हैं। वे समाधान चाहते हैं। वे केवल वादे नहीं, बल्कि कार्रवाई देखना चाहते हैं।
प्लास्टिक प्रदूषण हमारे समय की सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक है। लक्ष्य तय करना पहला कदम है, लेकिन असली काम उसके बाद शुरू होता है।
अगर हम अभी कार्रवाई नहीं करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। प्रकृति की रक्षा के लिए हमें शब्दों से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने होंगे। महत्वाकांक्षा अच्छी है, लेकिन असली बदलाव केवल कार्रवाई से आएगा।