एनएमसीजी की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि अधूरे सीवेज नेटवर्क के कारण भारत के कई शहरों का गंदा पानी सीधे नदियों में जा रहा है।
झारखंड के धनबाद में कत्री और वासुदेव नदियों तथा जोरिया नाले में प्रदूषण रोकने के लिए इंटरसेप्शन और डाइवर्जन तकनीक को अस्थाई समाधान के रूप में अपनाने की सिफारिश की गई है, जब तक पूरा सीवेज नेटवर्क तैयार न हो।
रिपोर्ट ने पुष्टि की है कि इंटरसेप्शन और डाइवर्जन एक स्वीकार्य अस्थाई समाधान है, जो सीवेज और उपचार सिस्टम को तैयार करने तक के लिए अंतरिम व्यवस्था के रूप में अपनाया जाता है
सीएसई की मार्च 2025 में डाउन टू अर्थ में प्रकाशित रिपोर्ट का हवाला देते हुए एनएमसीजी ने रिपोर्ट में कहा है कि कुछ प्रमुख जर्नल और अध्ययन, जैसे सीएसई रिपोर्ट, यह दिखाते हैं कि नालों को रोकना, पानी का अस्थाई रूप से मोड़ना और ठोस एवं तैरने वाले कचरे को पकड़ना, शहरी सीवरेज विकास के दौरान नदियों में प्रदूषण को काफी हद तक कम कर देता है।
बरसाती नाले सिर्फ बारिश का पानी ले जाने के लिए होते हैं, सीवेज के लिए नहीं, लेकिन देश में आधे-अधूरे सीवेज नेटवर्क ने हालात ऐसे बना दिए हैं कि शहरों का गंदा पानी सीधे नदियों में जा रहा है। कई क्षेत्रों में सीवर लाइनें ही नहीं हैं।
हालांकि बिना उपचार के सीधे नदियों, नालों में जा रहे गंदे पानी को रोकना बेहद जरूरी है। ऐसे में इंटरसेप्शन और डायवर्जन (आईएंडडी) जैसी तकनीक फिलहाल जरूरी अंतरिम समाधान है।
यह बातें राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) ने 22 नवंबर 2025 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में दाखिल अपनी रिपोर्ट में कही है। गौरतलब है राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन की यह रिपोर्ट झारखंड के धनबाद में कत्री और वासुदेव नदियों तथा जोरिया नाले में बढ़ते प्रदूषण से जुड़ी है।
नदी को नाला बताकर 808 करोड़ की ‘टैपिंग’ योजना
एनजीटी ने 4 नवंबर को पाया कि धनबाद के शहरी क्षेत्र में कत्री और वासुदेव नदियों तथा जोरिया नाले को सरकारी रिकॉर्ड में नाले (ड्रेन) के रूप में दिखाया गया है। ट्रिब्यूनल को यह भी बताया गया है कि इन नदियों को नाला मानकर करीब 808 करोड़ रुपए की लागत से 'टेपिंग (पानी मोड़ने)' परियोजना शुरू करने की योजना है।
इसी पर स्पष्टता के लिए एनएमसीजी को निर्देश दिया गया था कि वह स्थिति स्पष्ट करते हुए बताए कि क्या बरसाती नाले को टैप कर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की ओर मोड़ा जा सकता है।
इसके अलावा, एनएमसीजी को यह भी स्पष्ट करना था कि क्या बिना उपचार किए सीवेज को बरसाती नाले में छोड़ा जा सकता है, जबकि यह एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों तथा 1974 के जल प्रदूषण नियंत्रण कानून के खिलाफ होगा।
ऐसे में एनएमसीजी ने कहा है कि नदी के प्रभावी प्रबंधन के लिए लंबी अवधि की योजना के साथ-साथ अस्थाई छोटी योजनाएं भी बनाई जाए, जो तकनीकी और आर्थिक रूप से सही हो। राष्ट्रीय दिशानिर्देश, फ्रेमवर्क और शोध भी मानते हैं कि इंटरसेप्शन और डाइवर्जन तकनीक नदियों की सुरक्षा और शहरी गंदे पानी के प्रबंधन के लिए एक जरूरी और अस्थाई उपाय है।
क्या है समाधान
रिपोर्ट ने पुष्टि की है कि इंटरसेप्शन और डाइवर्जन एक स्वीकार्य अस्थाई समाधान है, जो सीवेज और उपचार सिस्टम को तैयार करने तक के लिए अंतरिम व्यवस्था के रूप में अपनाया जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक जब नदियों में साल के करीब नौ से दस महीने प्रवाह कम रहता है, तब इंटरसेप्शन और डाइवर्जन तकनीक सुनिश्चित करती है कि बिना साफ किए गंदा पानी सीधे नदी में न जाए और नदी को राहत मिले।
moदेखा जाए तो इंटरसेप्शन और डाइवर्जन तकनीक दूषित पानी के इस प्रवाह को मोड़ देती हैं, जिससे प्रदूषण काफी घट जाता है।
एनएमसीजी ने स्पष्ट किया कि एसटीपी इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि वे तय मात्रा में प्रदूषण और जल प्रवाह को संभाल सकें, जिसे कुल प्रदूषण भार कहा जाता है। इससे उन्हें पानी की थोड़ी बढ़ी मात्रा और कमजोर सीवेज को भी संभालने की क्षमता मिलती है, क्योंकि वास्तविक प्रदूषण भार अभी भी डिजाइन किए गए स्तर से कम रहता है।
सीएसई रिपोर्ट का भी दिया हवाला
नामामी गंगे कार्यक्रम ने 1985 के गंगा एक्शन प्लान की जगह ली। इस दौरान कई राष्ट्रीय संस्थाएं (आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय (एमओएचयूए), सीपीसीबी, नीति आयोग, विश्व बैंक) और तकनीकी संगठन (जैसे सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) और आईडब्ल्यूए) भी मानते हैं कि नालों को टैप करके उनका पानी अस्थाई तौर पर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट तक मोड़ना आवश्यक है, ताकि अव्यवस्थित सफाई और सीवेज समस्या को नियंत्रित किया जा सके।
सीएसई की मार्च 2025 में डाउन टू अर्थ में प्रकाशित रिपोर्ट का हवाला देते हुए एनएमसीजी ने रिपोर्ट में कहा है कि कुछ प्रमुख जर्नल और अध्ययन, जैसे सीएसई रिपोर्ट, यह दिखाते हैं कि नालों को रोकना, पानी का अस्थाई रूप से मोड़ना और ठोस एवं तैरने वाले कचरे को पकड़ना, शहरी सीवरेज विकास के दौरान नदियों में प्रदूषण को काफी हद तक कम कर देता है।
इससे यह साबित होता है कि इंटरसेप्शन और डाइवर्जन तकनीक गंगा बेसिन के कई शहरों जैसे घनी आबादी और सीमित जगह वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है।
एनएमसीजी ने अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि भारत के शहरी क्षेत्रों में सीवेज नेटवर्क अधूरा है, कई हिस्से आज भी सीवर से नहीं जुड़ पाए हैं, और इसलिए बिना उपचार के गंदा पानी सीधे नदियों में जा रहा है।
रिपोर्ट में एनएमसीजी ने जोर देकर कहा है कि गंगा बेसिन के शहरी क्षेत्रों में सीवेज की अपर्याप्त व्यवस्था और कई शहरों से बिना उपचार के सीवेज सीधे नदियों में बहने को देखते हुए, यह जरूरी और तत्काल है कि खुले नालों से सीवेज को पकड़कर ट्रीटमेंट प्लांट तक ले जाने के लिए आईएंडडी जैसी अस्थाई योजना को तुरंत लागू किया जाए।
एनएमसीजी का कहना है कि वे बरसाती नालों को स्थाई रूप से एसटीपी से जोड़ने के समर्थक नहीं हैं, लेकिन जब तक राज्य सरकारें और नगर निकाय पूरा सीवेज नेटवर्क नहीं बिछा लेते, तब तक इंटरसेप्शन और डाइवर्जन को अस्थाई लेकिन अनिवार्य रूप से अपनाना ही होगा।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि शहरों में पूरे सीवेज नेटवर्क को विकसित करने में अक्सर पांच साल से ज्यादा का समय लगता है।
इस बीच इंटरसेप्शन और डाइवर्जन प्रदूषण नियंत्रण का सबसे तेज और व्यावहारिक तरीका है। इस तकनीक को अस्थाई उपाय के रूप में अपनाने का मतलब यह नहीं कि बंद नेटवर्क को विकसित करने का काम रुक गया है। यह काम जारी है और सरकार भी इसे अमृत और स्वच्छ भारत मिशन जैसी योजनाओं के तहत आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के जरिए राज्यों को सहायता दे रही है।
झारखंड अर्बन इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड के मुताबिक वासुदेव और कत्री नदियां हैं और जोरिया नाला है। पहली दो नदियों में ऊपरी इलाकों से आने वाले गंदे पानी के कारण उनके प्रदूषित प्रवाह को रोकना (इंटरसेप्शन) जरूरी है।
एनएमसीजी रिपोर्ट के मुताबिक, दो चरणों वाला पूरा सीवेज प्लान यह सुनिश्चित करता है कि प्रदूषित पानी को तुरंत रोका जाए और लंबे समय में एक समर्पित सीवेज नेटवर्क के माध्यम से नदियों में सीवेज के बहाव को पूरी तरह बंद किया जाए।