उत्तर प्रदेश के महोबा में एक स्टोन क्रशिंग यूनिट से उठती धूल; प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) 
प्रदूषण

क्या सिलिका धूल बन रही मौत का कारण: एनजीटी ने दिए झाबुआ में फैक्ट्री की जांच के आदेश?

श्रमिकों और ग्रामीणों के स्वास्थ्य पर मंडरा रहे सिलिकोसिस के खतरे के बीच एनजीटी ने पर्यावरण सम्बन्धी नियमों की जांच और कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • यह खबर सिर्फ एक फैक्ट्री से निकलती धूल की शिकायत नहीं, बल्कि उन श्रमिकों और ग्रामीणों की सेहत का सवाल है जो लंबे समय से सिलिका युक्त महीन धूल के संपर्क में रहने को मजबूर हैं।

  • मध्य प्रदेश के झाबुआ स्थित मेघनगर औद्योगिक क्षेत्र की एक क्वार्ट्ज ग्राइंडिंग फैक्ट्री से कथित सिलिका धूल के लगातार फैलने की शिकायत पर एनजीटी ने सख्त रुख अपनाया है।

  • ट्रिब्यूनल ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, जिला प्रशासन और खनन विभाग को संयुक्त निरीक्षण कर पर्यावरणीय नियमों के पालन की जांच करने और उल्लंघन मिलने पर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।

  • शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि पहले भी निरीक्षण के बाद फैक्ट्री बंद की गई थी, लेकिन कुछ समय बाद उसने दोबारा काम शुरू कर दिया और धूल का उत्सर्जन बढ़ गया।

  • चिंता इसलिए भी गंभीर है क्योंकि सिलिका की महीन धूल लंबे समय तक सांस के साथ शरीर में जाने पर सिलिकोसिस जैसी गंभीर और लाइलाज बीमारी का कारण बन सकती है।

  • आईसीएमआर के अनुसार, देश में करीब 30 लाख श्रमिकों पर सिलिकोसिस का गंभीर खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में एनजीटी का ताजा आदेश ऐसे लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।

मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के मेघनगर औद्योगिक क्षेत्र में एक फैक्ट्री से कथित तौर पर लगातार फैल रही सिलिका युक्त धूल को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है।

ट्रिब्यूनल ने इस मामले में मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, झाबुआ कलेक्टर ऑफिस और खनन विभाग को संयुक्त रूप से फैक्ट्री का निरीक्षण करने और पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन की स्थिति में जरूरी कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। यह आदेश 9 सितंबर 2026 को दिए गए हैं।

एनजीटी ने कहा कि यदि निरीक्षण में पर्यावरण संबंधी नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो इसके सुधार के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं। साथ ही नियमों का पालन नहीं होने की स्थिति में मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को तीन महीने के भीतर ट्रिब्यूनल के सामने अपनी रिपोर्ट पेश करनी होगी।

शिकायतों के बाद भी नहीं थमी धूल

यह मामला राष्ट्रीय आदिवासी क्रांति सेना की ओर से 29 जून 2026 को दायर पत्र याचिका के जरिए एनजीटी के सामने पहुंचा। शिकायत में बताया गया कि मेघनगर औद्योगिक क्षेत्र में 'समृद्धा माइंस एंड मिनरल्स' नाम से क्वार्ट्ज यानी सिलिका की ग्राइंडिंग फैक्ट्री चल रही है।

आरोप है कि फैक्ट्री से बड़ी मात्रा में सिलिका धूल आसपास के वातावरण में फैल रही है। शिकायत में इस धूल के लगातार संपर्क को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है।

गौरतलब है कि सिलिका धूल लंबे समय तक सांस के जरिए शरीर में जाने पर सिलिकोसिस जैसी गंभीर और लाइलाज व्यावसायिक बीमारी का कारण बन सकती है। शिकायतकर्ताओं के अनुसार, इलाके में कई श्रमिक इस बीमारी की चपेट में आ चुके हैं और कुछ लोगों की मौत भी हुई है।

सिलिकोसिस के खतरे ने बढ़ाई चिंता

ग्रामीणों ने इस समस्या को लेकर कई बार शिकायतें कीं। मामला स्थानीय अखबारों में भी सामने आया। इसके बाद मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने फैक्ट्री का निरीक्षण किया और कथित पर्यावरणीय उल्लंघन पाए जाने पर उद्योग को बंद करने का आदेश दिया था।

लेकिन शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि कुछ समय बाद फैक्ट्री ने दोबारा काम शुरू कर दिया। इतना ही नहीं, अब पहले से भी अधिक मात्रा में सिलिका धूल फैलने की बात कही गई है।

शिकायत के साथ ऐसी तस्वीरें भी पेश की गई हैं, जिनमें फैक्ट्री से धूल के लगातार उत्सर्जन का दावा किया गया है। अब एनजीटी के निर्देश के बाद संबंधित विभागों की जांच यह तय करेगी कि फैक्ट्री पर्यावरणीय मानकों का पालन कर रही है या नहीं।

बता दें कि देश में सिलिकोसिस पीड़ितों का सही आंकड़ा क्या है इसका सटीक तौर पर तो अंदाजा नहीं है, लेकिन आईसीएमआर ने अपनी एक रिपोर्ट में जानकारी दी है कि देश में तीस लाख श्रमिकों पर सिलिकोसिस का जोखिम बहुत ज्यादा है।

इनमें 17 लाख श्रमिक खनन कार्यों में लगे हैं, जबकि छह लाख मौजदूर चीनी मिट्टी, कांच और अभ्रक जैसे गैर धातु उद्योग से जुड़े हैं।

इस मामले की गंभीरता केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है। सिलिका की महीन धूल के बीच काम करने वाले श्रमिकों और आसपास रहने वाले लोगों के लिए यह सीधे उनके फेफड़ों और जीवन का सवाल है। एनजीटी का ताजा आदेश ऐसे लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।