समुद्रों में बढ़ता कचरा; फोटो: आईस्टॉक 
प्रदूषण

महासागरों पर संकट: व्हेल और डॉल्फिन के शरीर में तेजी से बढ़ रहा 'फॉरएवर केमिकल्स' का जहर

वैज्ञानिकों ने चेताया है कि व्हेल और डॉल्फिन के शरीर में बढ़ता रासायनिक जहर इस बात का संकेत है कि समुद्र की सेहत तेजी से बिगड़ रही है।

Lalit Maurya

  • दुनिया के सबसे दूर-दराज और विशाल महासागरों में रहने वाली व्हेल और डॉल्फिन भी अब इंसानों द्वारा फैलाए रासायनिक प्रदूषण से सुरक्षित नहीं रहीं।

  • मरीन पॉल्यूशन बुलेटिन में प्रकाशित एक वैश्विक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि इन समुद्री स्तनधारियों के शरीर में 'फॉरएवर केमिकल्स' (पीएफएएस) का स्तर लगातार बढ़ रहा है।

  • वैज्ञानिकों के अनुसार, यह केवल इन जीवों के लिए नहीं, बल्कि पूरे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के बिगड़ते स्वास्थ्य का गंभीर संकेत है। स्टडी में पाया गया कि 2000 के बाद से खासकर प्रशांत महासागर और तटीय क्षेत्रों में रहने वाली प्रजातियों में पीएफएएस का स्तर तेजी से बढ़ा है।

  • ये रसायन खाद्य श्रृंखला के जरिए छोटे समुद्री जीवों से मछलियों और फिर व्हेल व डॉल्फिन तक पहुंचकर उनके शरीर में खतरनाक स्तर तक जमा हो जाते हैं। विशेषज्ञों को आशंका है कि इससे उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली, हार्मोन संतुलन और प्रजनन क्षमता प्रभावित हो सकती है।

  • अध्ययन यह भी बताता है कि पीएफएएस पर सख्त नियंत्रण से प्रदूषण कम किया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने चेताया है कि यदि इन 'फॉरएवर केमिकल्स' पर समय रहते प्रभावी रोक नहीं लगी, तो इसका खतरा केवल समुद्री जीवों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अंततः मानव स्वास्थ्य भी इसकी चपेट में आ सकता है।

धरती के सबसे विशाल और दूर-दराज के महासागरों में रहने वाली व्हेल और डॉल्फिन को अक्सर प्रकृति के सबसे सुरक्षित जीवों में माना जाता है। लेकिन अब यह भ्रम टूटता नजर आ रहा है।

एक नए वैश्विक अध्ययन से पता चला है कि इन समुद्री स्तनधारियों के शरीर में पर-एंड पॉली-फ्लोरो अल्काइल सब्स्टेंसेस (पीएफएएस) यानी 'फॉरएवर केमिकल्स' का स्तर लगातार बढ़ रहा है। यह इस बात का संकेत है कि इंसानों द्वारा फैलाया रासायनिक प्रदूषण अब समुद्र की गहराइयों तक पहुंच चुका है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, 2000 के बाद से दुनिया भर में व्हेल और डॉल्फिन के शरीर में इन जहरीले रसायनों की मात्रा बढ़ी है। सबसे ज्यादा प्रदूषण प्रशांत महासागर में रहने वाली प्रजातियों में पाया गया, जबकि हंपबैक डॉल्फिन के शरीर में इन रसायनों का स्तर सबसे अधिक दर्ज किया गया।

आखिर क्या हैं 'फॉरएवर केमिकल्स' (पीएफएएस)?

ये पीएफएएस 1,400 से अधिक रसायनों का एक समूह है। इन्हें गर्मी, पानी और तेल के असर को रोकने के लिए बनाया गया था। यही वजह है कि इनका इस्तेमाल नॉन-स्टिक बर्तनों, वॉटरप्रूफ जैकेटों और दाग-धब्बे रोकने वाले कालीनों, फूड पैकेजिंग और अग्निशमन फोम जैसी कई रोजमर्रा की चीजों में किया जाता है।

समस्या यह है कि ये रसायन प्राकृतिक रूप से बहुत धीरे-धीरे टूटते हैं। एक बार पर्यावरण में पहुंचने के बाद ये दशकों तक बने रह सकते हैं। इसी कारण इन्हें 'फॉरएवर केमिकल्स' कहा जाता है।

एक अन्य अध्ययन के मुताबिक दुनिया भर में अब तक 12,000 से ज्यादा तरह के फॉरएवर केमिकल्स के मौजूद होने की पुष्टि हो चुकी है। देखा जाए तो यह ऐसे केमिकल्स हैं, जो पर्यावरण और स्वास्थ्य को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकते हैं। यहां तक की बहुत ज्यादा समय तक इनके संपर्क में रहने से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का भी खतरा पैदा हो सकता है।

घरों से समंदर तक जहर का सफर

ये रसायन फैक्ट्रियों से निकलने वाले कचरे, औद्योगिक बहाव, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और अग्निशमन फोम के जरिए नदियों और झीलों में पहुंचते हैं। वहां से ये समुद्र तक फैल जाते हैं।

समुद्र में सबसे पहले छोटे-छोटे जीव इन्हें अपने शरीर में जमा करते हैं। फिर मछलियां उन जीवों को खाती हैं और अंत में व्हेल व डॉल्फिन जैसे बड़े शिकारी इन मछलियों को खा लेते हैं। इस पूरी खाद्य श्रृंखला में हर स्तर पर इन रसायनों की मात्रा बढ़ती जाती है। चूंकि ये जीव समुद्र की खाद्य श्रृंखला में सबसे ऊपर आते हैं, इसलिए इनके शरीर में इस जहर की मात्रा सबसे खतरनाक स्तर पर पहुंच चुकी है।

यही वजह है कि इंसानों से हजारों किलोमीटर दूर गहरे समुद्र में रहने वाली व्हेल भी इस जहरीले प्रदूषण से नहीं बच पा रही हैं।

जीवों पर क्या हो रहा है असर?

इंसानों और प्रयोगशाला में जानवरों पर हुए कई अध्ययनों में पीएफएएस को प्रतिरक्षा तंत्र की कमजोरी, हार्मोन में गड़बड़ी, प्रजनन संबंधी समस्याओं और बच्चों के विकास पर नकारात्मक असर से जोड़ा गया है। हालांकि व्हेल और डॉल्फिन पर इनके प्रभावों को पूरी तरह समझना अभी बाकी है, लेकिन शुरुआती शोधों में डॉल्फिन के प्रतिरक्षा तंत्र में ऐसे बदलाव मिले हैं जो पीएफएएस के संपर्क से जुड़े हो सकते हैं।

वैज्ञानिकों को डर है कि इंसानों और दूसरे जानवरों पर की गई जांच की तरह, यह जहर व्हेल और डॉल्फिन में भी इम्यून सिस्टम को कमजोर कर रहा है। हार्मोन में गड़बड़ी पैदा कर रहा है और उनकी प्रजनन क्षमता को नुकसान पहुंचा रहा है।

वैज्ञानिक इन जीवों को समुद्र की सेहत का 'प्रहरी' मानते हैं। ये दशकों तक जीवित रहते हैं और विशाल समुद्री क्षेत्रों में घूमते हैं। इसलिए इनके शरीर में जमा होने वाले प्रदूषक पूरे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिति का संकेत देते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि व्हेल और डॉल्फिन के शरीर में जहरीले रसायन बढ़ रहे हैं, तो इसका मतलब है कि समुद्र का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में है।

वैज्ञानिकों ने कैसे लगाया पता?

इंसानों की तरह व्हेल या डॉल्फिन का ब्लड टेस्ट करना मुमकिन नहीं है। इसलिए वैज्ञानिकों दुनिया भर में मृत पाई गई व्हेल और डॉल्फिन के लिवर (यकृत) और किडनी के टिश्यू की जांच करते हैं, क्योंकि ये रसायन इन्हीं अंगों में सबसे ज्यादा जमा होते हैं।

इस नए अध्ययन में दुनिया भर के कई दशकों के शोधों से जुटाए गए आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, जिससे पहली बार वैश्विक स्तर पर इन रसायनों की स्थिति की व्यापक तस्वीर सामने आई।

अध्ययन में एक बड़ा खुलासा यह भी हुआ कि जो जीव तटीय इलाकों और शहरों के करीब रहते हैं, उनके शरीर में इस जहर का स्तर गहरे समंदर में रहने वाले जीवों से कहीं ज्यादा है। हालांकि, भारत, इंडोनेशिया और अफ्रीका के समुद्री इलाकों का पूरा डेटा उपलब्ध न होने के कारण अभी वहां का सटीक खतरा सामने आना बाकी है।

अध्ययन में सामने आया है कि तटीय क्षेत्रों में रहने वाली डॉल्फिन और पॉरपॉइज के शरीर में पीएफएएस का स्तर सबसे अधिक था। वहीं, प्रशांत महासागर के समुद्री स्तनधारियों में अन्य महासागरों की तुलना में इन जहरीले रसायनों का प्रदूषण ज्यादा मिला।

यह भी पता चला है कि नर व्हेल और डॉल्फिन के शरीर में मादाओं की तुलना में अधिक पीएफएएस मौजूद था, क्योंकि मादाएं गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान इन रसायनों का एक हिस्सा अपने बच्चों तक पहुंचा देती हैं। इसका अर्थ है कि नवजात शावक जन्म के शुरुआती दिनों से ही इन खतरनाक 'फॉरएवर केमिकल्स' के संपर्क में आ सकते हैं।

क्या संभव है समाधान?

वैज्ञानिकों का कहना है कि सबसे जरूरी कदम है पीएफएएस के इस्तेमाल और इनके पर्यावरण में पहुंचने पर सख्त नियंत्रण। इस दिशा में कुछ सकारात्मक संकेत भी मिले हैं। लगभग दो दशक पहले यूरोपियन यूनियन ने कुछ पीएफएएस रसायनों पर प्रतिबंध लगाया था। अध्ययन में भूमध्यसागर में इन पुराने रसायनों के स्तर में कमी देखी गई, जो नियमों के असर की ओर इशारा करती है।

हालांकि वैश्विक स्तर पर पीएफएएस प्रदूषण अब भी लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में यदि समय रहते इन 'फॉरएवर केमिकल्स' पर प्रभावी नियंत्रण नहीं लगाया गया, तो इसका असर केवल व्हेल और डॉल्फिन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और अंततः मानव स्वास्थ्य पर भी पड़ेगा।

इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल मरीन पॉल्यूशन बुलेटिन में प्रकाशित हुए हैं।