उत्तराखंड की प्रसिद्ध नैनीताल झील; फोटो: आईस्टॉक 
प्रदूषण

नैनीताल झील प्रदूषण: एनजीटी ने अधूरी रिपोर्ट पर जताई नाराजगी, प्रशासन से मांगा पूरा एक्शन प्लान

एनजीटी की सख्ती ने स्पष्ट कर दिया है कि अब आधे-अधूरे जवाब नहीं, बल्कि ठोस और समयबद्ध कार्रवाई ही नैनीताल झील को बचा सकती है

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • नैनीताल झील में बढ़ते प्रदूषण पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाते हुए प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

  • 29 अप्रैल 2026 को न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी की पीठ ने कुमाऊं मंडल के आयुक्त द्वारा दाखिल हलफनामे को अधूरा बताते हुए नाराजगी जताई और स्पष्ट किया कि झील को बचाने के लिए ठोस और विस्तृत कार्ययोजना जरूरी है।

  • अदालत ने राज्य सरकार, जिला प्रशासन और मंडलायुक्त को दो महीने के भीतर पूरी जानकारी के साथ नया जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

  • मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण ने नैनीताल झील को ‘आर्द्रभूमि’ मानने से इनकार किया है, जिससे इसके संरक्षण के कानूनी ढांचे पर सवाल उठते हैं। वहीं, अदालत ने वन विभाग के शीर्ष अधिकारी से भी जवाब तलब कर जवाबदेही तय करने के संकेत दिए हैं।

  • याचिका में आरोप है कि शहर के नालों के जरिए भारी मात्रा में सीवेज, कचरा और प्लास्टिक सीधे झील में गिर रहा है। ऐसे में यह मामला केवल योजनाओं का नहीं, बल्कि उनकी प्रभावी और समयबद्ध क्रियान्वयन की कसौटी बन गया है।

नैनीताल झील में बढ़ते प्रदूषण को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाया है। 29 अप्रैल 2026 को न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी की पीठ ने नैनीताल में कुमाऊं डिवीजन के डिविजनल कमिश्नर द्वारा दाखिल हलफनामे पर नाराजगी जताई।

अदालत ने कहा कि रिपोर्ट में झील को प्रदूषण से बचाने के लिए शुरू या लागू किए जाने वाले कार्यों की पूरी और स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार, नैनीताल के जिला मजिस्ट्रेट और कुमाऊं के डिवीजनल कमिश्नर की ओर से पेश वकीलों ने मामले में अतिरिक्त जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा है। इस पर अदालत ने उन्हें दो महीने के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

मामले में यह भी सामने आया कि 3 जून 2025 को राज्य आद्रभूमि प्राधिकरण ने अपने जवाब में कहा था कि नैनीताल झील को ‘आद्रभूमि’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, क्योंकि आद्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017 उन क्षेत्रों पर लागू नहीं होते जो भारतीय वन अधिनियम, 1927 और वन संरक्षण एवं संवर्धन अधिनियम, 1980 के तहत आते हैं।

ऐसे में मामले के तथ्यों और हालात को देखते हुए अदालत ने उत्तराखंड के प्रधान मुख्य वन संरक्षक और वन बल प्रमुख (पीसीसीएफ-एचओएफएफ) से भी विस्तृत जवाब तलब किया है।

याचिका का खुलासा: नाले से झील में गिर रहा सीवेज

गौरतलब है कि नैनीताल झील में प्रदूषण को लेकर यह मामला 23 नवंबर 2024 को एनजीटी में दायर किया गया था। इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि भोटिया मार्केट से नयना देवी मंदिर की ओर जाने वाले नाले के जरिए भारी मात्रा में सीवेज झील में गिर रहा है।

इसके साथ कचरा, गंदा पानी और प्लास्टिक सीधे नैनीताल झील में पहुंचकर इसे गंभीर रूप से प्रदूषित कर रहे हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले 16 अप्रैल 2025 को कुमाऊं के कमिश्नर द्वारा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में दायर रिपोर्ट में कहा गया था कि नैनीताल शहर की सीवर व्यवस्था को मजबूत करने के लिए 109 करोड़ रुपए की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) बनाई गई है।

रिपोर्ट के मुताबिक फिलहाल नैनीताल अर्बन सीवरेज योजना के तहत 600 मीटर सीवर लाइन को तुरंत बदलने की आवश्यकता है, क्योंकि कई क्षेत्रों में 150 मिलीमीटर और 200 मिलीमीटर व्यास की सीवर पाइपें बेहद पुरानी और जर्जर हो चुकी हैं। इसके अतिरिक्त, नैनीताल शहर के विभिन्न हिस्सों में 37 पुराने और क्षतिग्रस्त सीवर मैनहोल चैंबर्स का निर्माण, 83 मैनहोल्स की मरम्मत और कई जगहों पर ढके हुए मैनहोल चैंबर्स को सड़क की सतह तक उठाने का कार्य प्रस्तावित है।

साथ ही, 150 से 300 मिमी व्यास की 5.80 किलोमीटर लम्बी नई सीवर लाइन बिछाने और 380 मैनहोल चैंबर्स की सिल्ट सफाई भी तत्काल की जानी है।

अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि दो महीने बाद प्रशासन सिर्फ कागजी जवाब देता है या जमीन पर ठोस कार्रवाई भी दिखती है, क्योंकि नैनीताल झील के लिए समय तेजी से निकलता जा रहा है।