ग्लोबल साउथ से समुद्र में पहुंचने वाले नदी-जनित माइक्रोप्लास्टिक का करीब 96 प्रतिशत हिस्सा आता है, अध्ययन का अहम खुलासा। फोटो साभार: आईस्टॉक
प्रदूषण

नदियों से हर साल समुद्र में पहुंचता है 2.63 लाख टन माइक्रोप्लास्टिक, 96% के लिए ग्लोबल साउथ जिम्मेवार

नदियों के जरिए 2022 में करीब 2.63 लाख टन माइक्रोप्लास्टिक समुद्र में पहुंचा, जिसमें 96% हिस्सा ग्लोबल साउथ से आया, एशिया सबसे बड़ा स्रोत बना।

Dayanidhi

  • 2022 में नदियों के रास्ते करीब 2.63 लाख मीट्रिक टन माइक्रोप्लास्टिक समुद्र तक पहुंचा, बढ़ते प्रदूषण का गंभीर संकेत।

  • ग्लोबल साउथ से समुद्र में पहुंचने वाले नदी-जनित माइक्रोप्लास्टिक का करीब 96 प्रतिशत हिस्सा आता है, अध्ययन का अहम खुलासा।

  • दक्षिण-पूर्वी और पूर्वी एशिया मिलकर दुनिया के नदी-जनित माइक्रोप्लास्टिक का आधे से ज्यादा हिस्सा समुद्र तक पहुंचाते हैं।

  • तेज बारिश जमीन और नदी-तल में जमा माइक्रोप्लास्टिक को बहाकर समुद्र तक पहुंचा सकती है, खतरा बढ़ सकता है।

  • नए मॉडल ने 1,386 वास्तविक मापों के आधार पर नदियों से समुद्र तक माइक्रोप्लास्टिक पहुंचने का स्पष्ट अनुमान दिया।

माइक्रोप्लास्टिक आज दुनिया के सामने एक बड़ी पर्यावरणीय चुनौती बन चुका है। प्लास्टिक के ये बेहद छोटे टुकड़े इतने छोटे होते हैं कि इन्हें कई बार सामान्य आंखों से देखना भी मुश्किल होता है। इनका आकार करीब 1 से 5,000 माइक्रोमीटर तक हो सकता है। ये बड़े प्लास्टिक के टूटने से बनते हैं। इसके अलावा पेंट, कॉस्मेटिक्स और दूसरी चीजों से भी माइक्रोप्लास्टिक पर्यावरण में पहुंचता है।

अब एक नए अध्ययन ने इस समस्या को लेकर चिंता और बढ़ा दी है। साइंस नामक पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, दुनिया की नदियां हर साल बड़ी मात्रा में माइक्रोप्लास्टिक समुद्र तक पहुंचा रही हैं। वैज्ञानिकों के नए अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2022 में नदियों के जरिए करीब 2 लाख 63 हजार मीट्रिक टन माइक्रोप्लास्टिक समुद्र में पहुंचा।

नदियां बन रही हैं प्लास्टिक का रास्ता

जमीन पर मौजूद माइक्रोप्लास्टिक बारिश और पानी के बहाव के साथ नदियों में पहुंचता है। इसके बाद नदियां इसे समुद्र तक ले जाती हैं। समुद्र में पहुंचने के बाद यह प्लास्टिक समुद्री जीवों के लिए खतरा बन सकता है। मछलियां, कछुए और दूसरे समुद्री जीव इसे भोजन समझकर निगल सकते हैं।

इससे समुद्री जीवों के स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है और पूरी खाद्य श्रृंखला प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि वैज्ञानिक नदियों को समुद्र में माइक्रोप्लास्टिक पहुंचने का एक महत्वपूर्ण रास्ता मान रहे हैं।

पुराने आंकड़ों में था बड़ा अंतर

इससे पहले नदियों से समुद्र में पहुंचने वाले माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा को लेकर वैज्ञानिकों के अनुमान में बहुत बड़ा अंतर था। अलग-अलग अध्ययनों में यह मात्रा हर साल 6,100 टन से लेकर 23.1 लाख टन तक बताई गई थी।

इतने बड़े अंतर की कई वजहें थीं। अलग-अलग वैज्ञानिक अलग तरह से नमूने लेते थे। इस्तेमाल किए गए जाल और उपकरण भी अलग होते थे। इसके अलावा पुराने कंप्यूटर मॉडल बारिश और नदी के बहाव में अचानक होने वाले बदलावों को सही तरीके से नहीं पकड़ पाते थे।

नए मॉडल से मिली ज्यादा स्पष्ट तस्वीर

पेकिंग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने इस समस्या को समझने के लिए एक नया कंप्यूटर मॉडल तैयार किया। इस मॉडल में दुनिया की नदियों से मिले 1,386 वास्तविक माइक्रोप्लास्टिक मापों का इस्तेमाल किया गया।

वैज्ञानिकों ने अलग-अलग तरीकों से लिए गए आंकड़ों को एक समान बनाने के लिए गणितीय तरीका अपनाया। इसके साथ ही उन्होंने रोजाना होने वाली बारिश, नदी के पानी का बहाव, जमीन के इस्तेमाल और दूसरे पर्यावरणीय आंकड़ों को भी मॉडल में शामिल किया। इससे वैज्ञानिक यह बेहतर तरीके से समझ सके कि अलग-अलग नदियों से कितनी मात्रा में माइक्रोप्लास्टिक समुद्र तक पहुंच सकता है।

एशिया पर सबसे ज्यादा दबाव

अध्ययन के अनुसार, नदियों से समुद्र में पहुंचने वाले माइक्रोप्लास्टिक का करीब 96 प्रतिशत हिस्सा ग्लोबल साउथ के देशों से आता है। दक्षिण-पूर्वी और पूर्वी एशिया का इसमें बड़ा योगदान है। इन क्षेत्रों से दुनिया के कुल नदी-जनित माइक्रोप्लास्टिक का आधे से ज्यादा हिस्सा समुद्र तक पहुंचता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, यांग्त्जी नदी दुनिया की उन नदियों में सबसे आगे है, जो सबसे अधिक माइक्रोप्लास्टिक समुद्र में पहुंचाती है।

तेज बारिश बढ़ा सकती है खतरा

अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण बातों में से एक बारिश का प्रभाव है। तेज बारिश होने पर जमीन पर जमा माइक्रोप्लास्टिक तेजी से बहकर नदियों में पहुंच सकता है। तेज पानी नदी के किनारे और नदी की तलहटी में जमा पुराने प्लास्टिक को भी फिर से बहाव में ला सकता है।

वैज्ञानिकों ने इस अचानक बढ़ोतरी को “पल्स एनरिचमेंट” कहा है। इसका मतलब है कि सामान्य दिनों की तुलना में भारी बारिश के समय नदी में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा अचानक बहुत बढ़ सकती है।

प्लास्टिक कचरे पर रोक जरूरी

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर प्लास्टिक का उत्पादन और गलत तरीके से होने वाला कचरा प्रबंधन कम नहीं किया गया, तो भविष्य में समस्या और गंभीर हो सकती है। खासकर भारी बारिश और चरम मौसम की घटनाएं इस समस्या को बढ़ा सकती हैं।

इसलिए प्लास्टिक का कम इस्तेमाल, बेहतर कचरा प्रबंधन और नदियों में कचरा जाने से रोकना बेहद जरूरी है। माइक्रोप्लास्टिक भले ही आकार में छोटा हो, लेकिन इसका पर्यावरण पर असर बहुत बड़ा हो सकता है। समुद्रों को बचाने के लिए अब नदियों और जमीन पर ही प्लास्टिक प्रदूषण को रोकना होगा।