शोधकर्ताओं के मुताबिक, यमुना, गंगा और पुनपुन नदियों के बदले रास्ते जमीन के भीतर सक्रिय भूगर्भीय हलचल के संकेत देते हैं। प्रतीकात्मक छवि, फोटो साभार: आईस्टॉक
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गंगा के मैदान दिखते हैं सपाट, लेकिन जमीन के नीचे छिपा है भूकंप का खतरा

वैज्ञानिकों ने गंगा बेसिन के भूकंप जोखिम का सही आकलन करने के लिए दबे हुए फॉल्ट को नए भूकंपीय नक्शों में शामिल करने पर जोर दिया है

Dayanidhi

  • गंगा के मैदान के नीचे सदियों पुराने भू-दोष छिपे हैं, जो भविष्य में बड़े भूकंप का कारण बन सकते हैं।

  • शोधकर्ताओं के मुताबिक, यमुना, गंगा और पुनपुन नदियों के बदले रास्ते जमीन के भीतर सक्रिय भूगर्भीय हलचल के संकेत देते हैं।

  • मुरादाबाद, ग्रेट बाउंड्री और पूर्वी पटना फॉल्ट के आसपास अतीत में 7 तीव्रता से बड़े भूकंप आने के प्रमाण मिले हैं।

  • पानी से भरी नरम मिट्टी भूकंप के झटकों को बढ़ा सकती है और जमीन की मजबूती घटाकर नुकसान का खतरा बढ़ा सकती है।

  • वैज्ञानिकों ने गंगा बेसिन के भूकंप जोखिम का सही आकलन करने के लिए दबे हुए फॉल्ट को नए भूकंपीय नक्शों में शामिल करने पर जोर दिया है।

गंगा के मैदान में कहीं भी खड़े होकर देखिए, दूर-दूर तक फैली समतल जमीन नजर आती है। न ऊंचे पहाड़, न गहरी घाटियां और न ही धरती पर कोई बड़ी दरार। लेकिन इस शांत और सपाट दिखने वाली धरती के नीचे एक ऐसा खतरा छिपा है, जो बड़े भूकंप की वजह बन सकता है। जमीन के भीतर सदियों पुराने भू-दोष यानी फॉल्ट दबे हुए हैं। इन पर मोटी तलछट की परतें चढ़ चुकी हैं, इसलिए ऊपर से इनके निशान दिखाई नहीं देते।

आईआईटी रुड़की, श्रीदेव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय और डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने जियोसाइंस फ्रंटियर्स में प्रकाशित एक अध्ययन में इस खतरे की ओर ध्यान दिलाया है। शोध के मुताबिक, गंगा के मैदान में भूकंप के खतरे को समझने के लिए केवल हिमालय की मुख्य भूगर्भीय दरार पर ध्यान देना काफी नहीं है। जमीन के नीचे छिपे पुराने फॉल्ट भी बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

हिमालय से भी पुराने हैं ये भू-दोष

धरती की ऊपरी परत कई विशाल प्लेटों में बंटी हुई है। भारत की प्लेट लगातार यूरेशियाई प्लेट से टकरा रही है। इसी टक्कर के कारण हिमालय का निर्माण हुआ और आज भी इस क्षेत्र में भूगर्भीय हलचल जारी है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, गंगा के मैदान के नीचे मौजूद कई फॉल्ट हिमालय बनने से भी पहले के हैं। इनमें से कुछ दक्षिण में भारतीय प्रायद्वीप की ओर से शुरू होकर उत्तर में गंगा बेसिन पार करते हुए हिमालय तक पहुंचते हैं। लंबे समय से मिट्टी, रेत और दूसरी तलछट के नीचे दबे होने के बावजूद ये भू-दोष आज भी भूकंप के खतरे को प्रभावित कर सकते हैं।

नदियों का बदला रास्ता दे रहा है गवाही

इन छिपे हुए फॉल्ट का पता लगाना आसान नहीं है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने नदियों के रास्तों, जमीन के नीचे की तस्वीरों, तलछट में आए बदलावों और पुराने भूकंपों के रिकॉर्ड का अध्ययन किया।

नदियां इस कहानी की अहम गवाह हैं। किसी फॉल्ट पर धरती खिसकती है, तो उसके ऊपर बहने वाली नदी का रास्ता भी बदल सकता है। अध्ययन के अनुसार, महेंद्रगढ़-देहरादून फॉल्ट के आसपास यमुना का रास्ता करीब छह किलोमीटर खिसका हुआ पाया गया।

मुरादाबाद फॉल्ट के पास गंगा के रास्ते में लगभग 5.8 किलोमीटर का बदलाव दर्ज किया गया। वहीं, पूर्वी पटना फॉल्ट के साथ पुनपुन नदी का रास्ता करीब 12.7 किलोमीटर तक खिसका हुआ पाया गया। ये बदलाव बताते हैं कि धरती के भीतर होने वाली हलचल का असर सतह पर लंबे समय तक दिखाई दे सकता है।

रेत के निशान बताते हैं पुराने भूकंपों की ताकत

भूकंप के समय सिर्फ जमीन ही नहीं हिलती, बल्कि जमीन के भीतर मौजूद पानी और रेत भी उथल-पुथल मचाते हैं। जब तेज झटके पानी से भरी रेतीली मिट्टी को हिलाते हैं, तो रेत और पानी ऊपर की ओर निकल सकते हैं। इससे रेत के छोटे टीले, दरारें और मुड़ी हुई तलछट जैसी आकृतियां बनती हैं। इन्हें वैज्ञानिक भाषा में 'सीस्माइट' कहा जाता है।

शोधकर्ताओं ने इन निशानों के आधार पर पुराने भूकंपों की ताकत का अनुमान लगाया। मुरादाबाद फॉल्ट के आसपास 6.5 से 7.2 या उससे अधिक तीव्रता के, ग्रेट बाउंड्री फॉल्ट के पास 6.8 से 7.8 या उससे अधिक तीव्रता के और पूर्वी पटना फॉल्ट के आसपास 6.5 से 7.5 या उससे अधिक तीव्रता के भूकंप आने के संकेत मिले हैं।

पुराने रिकॉर्ड भी दे रहे हैं चेतावनी

आधुनिक भूकंप रिकॉर्ड भी इस खतरे की ओर इशारा करते हैं। महेंद्रगढ़-देहरादून फॉल्ट के आसपास 1975 से 2020 के बीच 3.4 से 5.1 तीव्रता के 25 से अधिक भूकंप दर्ज किए गए। इनमें ज्यादातर भूकंप जमीन के दस किलोमीटर से कम नीचे आए थे।

मुरादाबाद फॉल्ट के पास 1956 में 6.0 तीव्रता और 1966 में 5.6 तीव्रता के भूकंप दर्ज किए गए। वहीं, पश्चिमी पटना, पूर्वी पटना और मुंगेर-सहरसा रिज फॉल्ट के आसपास 50 से अधिक भूकंप दर्ज किए जा चुके हैं।

खतरे का आकलन नए सिरे से जरूरी

अध्ययन में मुरादाबाद, ग्रेट बाउंड्री, पूर्वी पटना और पश्चिमी पटना फॉल्ट अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय नजर आए। दूसरी ओर, लखनऊ, पोखरा और मुंगेर-सहरसा रिज फॉल्ट कम सक्रिय दिखाई दिए। हालांकि पोखरा फॉल्ट एक पहेली बना हुआ है। यहां दर्ज भूकंप कम हैं, लेकिन इसके उत्तरी विस्तार के पास हिमालय के कई बड़े भूकंप आ चुके हैं।

गंगा के मैदान की नरम, पानी से भरी मिट्टी भूकंप के झटकों को बढ़ा सकती है और तरलीकरण के कारण जमीन की मजबूती भी घट सकती है। इसलिए खतरे को समझना और भी जरूरी है।

शोधकर्ताओं का संदेश साफ है: गंगा के मैदान में भूकंप का खतरा सिर्फ हिमालय तक सीमित नहीं है। जमीन के नीचे दबे पुराने फॉल्ट और मिट्टी की प्रकृति को भी भविष्य के भूकंप जोखिम और भूकंपीय जोनिंग के नक्शों में शामिल करना होगा। सपाट जमीन को सुरक्षित मान लेना ठीक नहीं, क्योंकि धरती के नीचे की हलचल हमेशा सतह पर दिखाई नहीं देती।