अवैध खनन का कारोबार; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
खनन

सिंगरौली: शिकायतों के बावजूद नहीं रुका अवैध खनन, महान नदी मामले में एनजीटी ने मांगा जवाब

आरोप है कि कंपनी ने भारी पोकलेन और पीसीएस मशीनों की मदद से नदी में पट्टे की निर्धारित सीमा से बाहर खनन किया है

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा सिंगरौली की महान नदी में कथित अवैध खनन और मथुरा में बिना पर्यावरणीय अनुमति के चल रही प्रदूषणकारी व्यावसायिक इकाइयों पर की गई कार्रवाई दर्शाती है कि पर्यावरणीय उल्लंघनों के मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप लगातार बढ़ रहा है।

  • इसमें से पहला मामला मध्य प्रदेश के सिंगरौली की देवसर तहसील में अवैध खनन से महान नदी को हो रहे नुकसान से जुड़ा है। सहकार ग्लोबल लिमिटेड पर करी गांव स्थित करी, मझौना और जियावन रेत खदानों के माध्यम से महान नदी के व्यापक दोहन का आरोप है।

  • आवेदन में कहा गया है कि नदी तल की बेकाबू खुदाई से महान नदी की जलीय जैव विविधता, प्राकृतिक प्रवाह, तटों की स्थिरता और भूजल पुनर्भरण क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है।

  • दोनों प्रकरणों में शिकायतों और प्रारंभिक साक्ष्यों ने प्रशासनिक निगरानी तथा प्रवर्तन व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो ये मामले न केवल प्राकृतिक संसाधनों और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर गंभीर खतरे की पुष्टि करेंगे, बल्कि पर्यावरणीय शासन और स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही पर भी बड़े सवाल खड़े करेंगे

मध्य प्रदेश के सिंगरौली की महान नदी में कथित अवैध और अनियंत्रित रेत खनन का मामला अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) तक पहुंच गया है। 9 अप्रैल 2026 को सुनवाई करते हुए एनजीटी की केंद्रीय पीठ ने मामले को गंभीर मानते हुए संबंधित पक्षों से जवाब तलब किया है।

इस मामले में जांच के लिए अदालत ने संयुक्त जांच समिति के गठन के भी निर्देश दिए हैं। इस समिति में सिंगरौली के कलेक्टर, वन मंडल सिंगरौली के वन अधिकारी और मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव के प्रतिनिधि शामिल होंगे। समिति से साइट का निरीक्षण कर छह सप्ताह के भीतर तथ्यात्मक और कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा गया।

मामला मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले की देवसर तहसील में अवैध खनन से महान नदी को हो रहे नुकसान से जुड़ा है। सहकार ग्लोबल लिमिटेड पर करी गांव स्थित करी, मझौना और जियावन रेत खदानों के माध्यम से महान नदी के व्यापक दोहन का आरोप है।

आवेदन में कहा गया है कि नदी तल की बेकाबू खुदाई से महान नदी की जलीय जैव विविधता, प्राकृतिक प्रवाह, तटों की स्थिरता और भूजल पुनर्भरण क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है।

वन विभाग ने भी की अवैध खनन की पुष्टि

जीपीएस-टैग्ड तस्वीरों और मीडिया रिपोर्टों के हवाले से आरोप लगाया गया है कि कंपनी ने भारी पोकलेन और पीसीएस मशीनों को नदी की मुख्य धारा में उतारकर पट्टे की निर्धारित सीमा से बाहर खनन किया है। यह कार्रवाई एनजीटी के आदेशों, सस्टेनेबल सैंड माइनिंग गाइडलाइंस 2016 और एनफोर्समेंट एंड मॉनिटरिंग गाइडलाइंस 2020 का सीधा उल्लंघन बताई गई है।

साईट का निरीक्षण करने पर सिंगरौली वन विभाग ने पाया की हो रहा खनन अवैध है। वन विभाग के अनुसार, कंपनी ने वन क्षेत्र के पास खनन के लिए जरूरी फॉरेस्ट एनओसी प्राप्त नहीं की है। आवेदन में यह भी कहा गया है कि बार-बार शिकायतों और सबूतों के बावजूद खनन अधिकारी व जिला प्रशासन ने प्रभावी कार्रवाई नहीं की, जिससे अवैध खनन को संरक्षण मिलता रहा।

देखा जाए तो महान नदी में अवैध खनन का यह मामला केवल पर्यावरणीय उल्लंघन का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है। ऐसे में यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह नदी, पर्यावरण और स्थानीय जल सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकता है।

मथुरा में प्रदूषण फैलाने वालों पर एनजीटी की सख्ती, अवैध होटल-ढाबों की जांच के आदेश

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने मथुरा जिले में कथित तौर पर अवैध रूप से चल रहे होटल, रेस्टोरेंट, ढाबों और अन्य व्यावसायिक इकाइयों के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए मथुरा के जिला मजिस्ट्रेट से जवाब तलब किया है।

इसके साथ ही एनजीटी ने अपने आदेश में मथुरा-वृंदावन नगर निगम, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड समेत अन्य संबंधित एजेंसियों को भी जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। इस मामले में अगली सुनवाई 24 जुलाई 2026 को होगी। आवेदक का आरोप है कि जिले की कई इकाइयों के पास कंसेंट टू एस्टैब्लिश (सीटीई) और कंसेंट टू ऑपरेट (सीटीओ) नहीं है।

यह भी आरोप है कि इन इकाइयों द्वारा बिना ट्रीट किया गंदा पानी खुली जमीन और सार्वजनिक सीवर सिस्टम में छोड़ा जा रहा है, जिससे पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा पैदा हो रहा है।

याचिकाकर्ता के अनुसार इन इकाइयों में प्रदूषण नियंत्रण के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं जैसे ऑयल-ग्रीस ट्रैप और एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) मौजूद नहीं हैं। इससे मिट्टी और भूजल प्रदूषित हो रहा है तथा यमुना नदी के प्रदूषण में भी इजाफा हो रहा है। सुनवाई के दौरान आवेदक के वकील ने 6 नवंबर, 2025 की आरटीआई एप्लीकेशन का जिक्र किया है, जिसमें पिछले तीन सालों में बिना वैध मंजूरी के चल रही इकाइयों के बारे में जानकारी मांगी गई थी।

आवेदक ने बताया कि 17 फरवरी, 2026 को अपने जवाब में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने माना कि बिना जरूरी मंजूरी और अनुमति के चल रहे होटलों, रेस्टोरेंट और ढाबों को नोटिस जारी किए गए थे।

इसके अलावा, जिला भूजल प्रबंधन परिषद, मथुरा के 21 जनवरी 2026 के पत्र के अनुसार केवल 306 प्रतिष्ठानों को ही भूजल उपयोग की एनओसी दी गई है। इससे संकेत मिलता है कि क्षेत्र की अनेक अन्य इकाइयां बिना आवश्यक भूजल अनुमति के चल रही हैं। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि इन अवैध इकाइयों की सूची 28 जनवरी 2026 को उत्तर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सौंप दी गई थी, लेकिन अब तक उसपर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है।

इसके साथ ही, याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने होटल, रेस्टोरेंट, मोटल और बैंक्वेट जैसे प्रतिष्ठानों के लिए प्रदूषण नियंत्रण तथा पर्यावरण मानकों के पालन हेतु दिशा-निर्देश तय किए हैं, लेकिन संबंधित इकाइयों द्वारा इन नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है।

ऐसे में मथुरा जैसे धार्मिक और पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में बिना अनुमति के चल रही इकाइयों पर एनजीटी की सख्ती यह संकेत देती है कि अब प्रदूषण फैलाने वालों पर जवाबदेही तय हो सकती है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला यमुना संरक्षण और शहरी पर्यावरण प्रशासन की गंभीर विफलता को उजागर करेगा।