दुनिया भर में पारंपरिक चिकित्सा का उपयोग करने वाले अरबों लोगों के बावजूद स्वास्थ्य शोध बजट का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा मिलता है। प्रतीकात्मक छवि, साभार: आईस्टॉक
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पारंपरिक चिकित्सा पर शोध बढ़ाएगा डब्ल्यूएचओ, 2034 तक के लिए बनाई वैश्विक योजना

डब्ल्यूएचओ ने पारंपरिक चिकित्सा पर शोध बढ़ाने के लिए 2025 से 2034 की वैश्विक योजना जारी की, 27 देशों ने शोध और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई।

Dayanidhi

  • डब्ल्यूएचओ ने पारंपरिक चिकित्सा पर वैज्ञानिक शोध बढ़ाने और सुरक्षित इलाज सुनिश्चित करने के लिए 2025 से 2034 तक की वैश्विक योजना जारी की।

  • दुनिया भर में पारंपरिक चिकित्सा का उपयोग करने वाले अरबों लोगों के बावजूद स्वास्थ्य शोध बजट का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा मिलता है।

  • नई दिल्ली सम्मेलन में 27 देशों ने पारंपरिक चिकित्सा शोध को बढ़ावा देने के लिए समयबद्ध प्रतिबद्धताएं जताईं और राष्ट्रीय योजनाएं बनाने की घोषणा की।

  • शोध में लकवा, मानसिक स्वास्थ्य, कैंसर, दर्द, हड्डियों की बीमारियों और प्रजनन स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विषयों को प्राथमिकता दी जाएगी।

  • डब्ल्यूएचओ ने पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा, मरीजों के हितों की रक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए वैज्ञानिक प्रमाण जुटाने पर जोर दिया।

दुनिया में करोड़ों नहीं, बल्कि अरबों लोग अपने स्वास्थ्य की देखभाल के लिए पारंपरिक चिकित्सा का सहारा लेते हैं। इसके बावजूद इस क्षेत्र में बहुत कम वैज्ञानिक शोध हुआ है। इसी कमी को दूर करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा पर वैश्विक शोध प्राथमिकताएं और कार्ययोजना 2025 से 2034 जारी की है। इस योजना का उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा की सुरक्षा, प्रभाव और उपयोगिता को समझना तथा स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाना है।

स्वास्थ्य शोध के लिए बहुत कम धन

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, दुनिया भर में स्वास्थ्य शोध पर खर्च होने वाली कुल राशि का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा पारंपरिक चिकित्सा को समझने के लिए दिया जाता है। इस क्षेत्र में काम करने वाले शोधकर्ताओं की संख्या भी बहुत कम है। वैश्विक स्वास्थ्य शोध कार्यबल में इनकी हिस्सेदारी केवल 0.43 प्रतिशत है।

इस कमी के कारण यह समझना कठिन होता है कि पारंपरिक चिकित्सा के कौन से तरीके सुरक्षित और प्रभावी हंश तथा किनका उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। नई योजना के माध्यम से इस क्षेत्र में वैज्ञानिक प्रमाण जुटाने और शोध के लिए अधिक निवेश को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाएगा।

27 देशों ने जताई प्रतिबद्धता

दिसंबर 2025 में नई दिल्ली में आयोजित डब्ल्यूएचओ के दूसरे वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा सम्मेलन में 27 सदस्य देशों ने पारंपरिक चिकित्सा पर शोध को आगे बढ़ाने के लिए समयबद्ध प्रतिबद्धताएं की थीं।

तंजानिया ने साल 2030 तक शोध के लिए 10 अरब तंजानियाई शिलिंग तक का बजट देने की प्रतिबद्धता जताई। वहीं, केप वर्डे, मलावी, माइक्रोनेशिया और सेशेल्स ने राष्ट्रीय पारंपरिक चिकित्सा शोध केंद्र स्थापित करने की बात कही।

भारत कई देशों के साथ मिलकर एक शोध समूह का नेतृत्व कर रहा है। ईरान ने भी नैदानिक परीक्षणों के लिए राष्ट्रीय मंच शुरू करने की प्रतिबद्धता जताई है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, इन देशों की जरूरतों और सुझावों को ध्यान में रखकर नई शोध योजना तैयार की गई है।

किन बीमारियों पर होगा शोध?

नई योजना में कई ऐसी बीमारियों और स्वास्थ्य समस्याओं को प्राथमिकता दी गई है, जिनका असर बड़ी संख्या में लोगों पर पड़ता है। इनमें लकवा, मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं, दर्द, हड्डियों और मांसपेशियों से जुड़ी बीमारियां, कैंसर, चयापचय संबंधी रोग और प्रजनन स्वास्थ्य शामिल हैं।

इसके साथ ही बच्चों, बुजुर्गों और बीमारी से बचाव के उपायों पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। शोध के माध्यम से यह पता लगाने का प्रयास होगा कि पारंपरिक चिकित्सा इन समस्याओं की रोकथाम, उपचार और बीमारी के बाद स्वास्थ्य सुधारने में कहां उपयोगी हो सकती है।

सुरक्षित इलाज और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं

डब्ल्यूएचओ का कहना है कि पारंपरिक चिकित्सा के बारे में वैज्ञानिक प्रमाण जुटाना जरूरी है। इससे सरकारों को यह तय करने में मदद मिलेगी कि किन उपचारों को स्वास्थ्य सेवाओं में शामिल किया जा सकता है और किन तरीकों से मरीजों को नुकसान हो सकता है।

शोध में वास्तविक जीवन से मिलने वाले स्वास्थ्य आंकड़ों, डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नए वैज्ञानिक तरीकों का भी उपयोग किया जाएगा। इससे पारंपरिक चिकित्सा के अलग-अलग पहलुओं को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिल सकती है।

यह योजना सभी लोगों तक अच्छी और सुरक्षित स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लक्ष्य से भी जुड़ी है। बेहतर शोध के आधार पर सरकारें स्वास्थ्य बीमा, इलाज की व्यवस्था, नियमों और स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशिक्षण से जुड़े फैसले ले सकेंगी।

पारंपरिक ज्ञान और समुदायों की सुरक्षा

योजना में आदिवासी समुदायों और पारंपरिक ज्ञान रखने वाले लोगों की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण बताया गया है। डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि शोध के दौरान उनके ज्ञान, संस्कृति और बौद्धिक संपदा की रक्षा की जानी चाहिए।

इसके साथ ही पारंपरिक ज्ञान से होने वाले लाभों का उचित बंटवारा सुनिश्चित करना भी जरूरी है। योजना में महामारी की तैयारी, रोगाणुरोधी दवाओं के प्रति बढ़ते प्रतिरोध, स्वस्थ बुढ़ापे और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों पर शोध की संभावनाओं का भी उल्लेख है।

बड़े स्तर पर तैयार की गई योजना

इस वैश्विक योजना को तैयार करने के लिए 40 शोध वित्तपोषण योजनाओं के तहत 39,927 शोध अनुदानों का विश्लेषण किया गया। इसके अलावा 67 देशों के 116 शोध संस्थानों की जानकारी जुटाई गई और 75 देशों के 199 विशेषज्ञों से विचार-विमर्श किया गया।

डब्ल्यूएचओ की यह योजना वर्ष 2034 तक पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में शोध को दिशा देने का काम करेगी। इसका मुख्य उद्देश्य ऐसे वैज्ञानिक प्रमाण जुटाना है, जिनसे मरीजों की सुरक्षा बढ़े, प्रभावी उपचार को बढ़ावा मिले और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाया जा सके।