इबोला के 14वें प्रकोप के खत्म होने की घोषणा के बाद भगवान को शुक्रिया अदा करता डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो का एक नागरिक; फोटो: विश्व स्वास्थ्य संगठन 
स्वास्थ्य

इबोला और मारबर्ग जैसी घातक बीमारियों से लड़ने के लिए डब्ल्यूएचओ ने जारी की नई गाइडलाइन

कांगो में इबोला के नए प्रकोप के बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पहली बार सभी प्रकार के इबोला और मारबर्ग वायरस से जुड़ी बीमारियों के इलाज के लिए व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए हैं

Lalit Maurya

  • दुनिया में इबोला और मारबर्ग जैसे फिलोवायरस संक्रमण आज भी सबसे घातक महामारियों में गिने जाते हैं, जिनमें मृत्यु दर 25 से 90 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।

  • ऐसे समय में, जब कांगो में बुंडीबुग्यो वायरस से इबोला का नया प्रकोप तेजी से फैल रहा है और कई खतरनाक वायरसों के लिए अब भी कोई स्वीकृत वैक्सीन या प्रभावी इलाज उपलब्ध नहीं है, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने पहली बार सभी प्रकार के इबोला और मारबर्ग संक्रमणों के उपचार के लिए व्यापक वैश्विक दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

  • 16 वैज्ञानिक सिफारिशों पर आधारित ये गाइडलाइन बताती हैं कि बीमारी की शुरुआती पहचान, मरीज को जल्द अस्पताल पहुंचाना, निर्जलीकरण और शॉक का समय रहते उपचार, संक्रमण की लगातार निगरानी तथा स्वस्थ होने के बाद भी मरीजों की व्यवस्थित देखभाल लाखों जानें बचा सकती है।

  • डब्ल्यूएचओ का मानना है कि महामारी से लड़ाई केवल नई दवाओं या वैक्सीन से नहीं, बल्कि समय पर और वैज्ञानिक आधार पर उपलब्ध कराई गई बेहतर चिकित्सा सेवाओं से भी जीती जा सकती है।

  • विशेषज्ञों के अनुसार, यह दस्तावेज दुनिया भर के स्वास्थ्यकर्मियों और सरकारों के लिए भविष्य की घातक महामारियों से निपटने का एक महत्वपूर्ण 'क्लिनिकल ब्लूप्रिंट' साबित हो सकता है।

कांगो में तेजी से पैर पसार रहे इबोला के बुंडीबुग्यो वायरस के कहर के बीच, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने दुनिया को महामारियों से बचाने के लिए एक बेहद ऐतिहासिक कदम उठाया है।

दुनिया के सबसे खतरनाक और जानलेवा वायरसों में शामिल इबोला और मारबर्ग से होने वाली बीमारियों के इलाज को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पहली बार व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

इनका उद्देश्य मरीजों को समय रहते बेहतर उपचार उपलब्ध कराकर अधिक से अधिक लोगों की जान बचाना है। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि यदि संक्रमण की शुरुआत में ही मरीजों को सही समय पर सटीक उपचार और सहायता मिले, तो जान बचने की संभावना काफी बढ़ जाती है।

नई गाइडलाइन में 16 वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित सिफारिशें शामिल हैं, जिनका उद्देश्य डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को मरीजों की बेहतर देखभाल और उपचार में मदद करना है।

90 फीसदी तक हो सकता है मौत का आंकड़ा: वैक्सीन नहीं, तो शुरुआती इलाज ही एकमात्र ढाल

चिकित्सा क्षेत्र के इतिहास में इबोला और मारबर्ग को दहशत का दूसरा नाम माना जाता है। इतिहास गवाह है कि जब भी इन वायरसों का प्रकोप चरम पर होता है, तो इस दौरान मृत्यु दर 25 से 90 फीसदी तक पहुंच जाती है।

1967 में मारबर्ग वायरस की पहली पहचान के बाद से अकेले अफ्रीकी ने 72 बार मौत का यह तांडव झेला है। ये ऐसी महामारियां हैं जो सिर्फ इंसान के जिस्म को नहीं तोड़तीं, बल्कि पूरे के पूरे समाज को मानसिक और आर्थिक रूप से कमजोर बना देती हैं।

चूंकि मारबर्ग, बुंडीबुग्यो और सूडान जैसे बेहद आक्रामक वायरसों की कोई स्वीकृत वैक्सीन या मुकम्मल इलाज आज भी दुनिया के पास नहीं है। ऐसे में समय पर दिया गया सहायक उपचार ही मरीजों की जान बचाने का सबसे प्रभावी तरीका है।

डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉक्टर टैड्रॉस ऐडहेनॉम घेबरेयेसस का कहना है कि ये दिशा-निर्देश इस बात का उदाहरण हैं कि विज्ञान के आधार पर स्वास्थ्य आपदाओं के दौरान लोगों की बेहतर सुरक्षा और देखभाल कैसे की जा सकती है।

उनके अनुसार, कांगो में फैला मौजूदा प्रकोप इस बात की याद दिलाता है कि मरीजों के लिए समय पर, बेहतर मानवीय चिकित्सा देखभाल कितनी जरूरी है। उन्होंने सभी देशों से अपील की कि वे इन दिशा-निर्देशों को अपनी महामारी से जुड़ी तैयारी और आपदा प्रतिक्रिया योजनाओं में शामिल करें, ताकि हर मरीज को बेहतर इलाज और सुविधाएं मिल सके।

फ्रंटलाइन डॉक्टरों के लिए 'ब्लूप्रिंट'

डब्ल्यूएचओ ने बताया कि यह गाइडलाइन दुनिया भर के विशेषज्ञों की सलाह और नवीनतम वैज्ञानिक शोध के आधार पर तैयार की गई है। इसमें हाल के इबोला और मारबर्ग प्रकोपों से मिले अनुभवों को व्यावहारिक उपचार संबंधी सुझावों में बदला गया है।

इनका उद्देश्य स्वास्थ्यकर्मियों को मरीजों की स्थिति तेजी से बिगड़ने के संकेत पहचानने, निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन) और शॉक का प्रभावी इलाज करने, मरीजों की लगातार निगरानी करने तथा ठीक हो चुके लोगों की बाद की देखभाल सुनिश्चित करने में मदद करना है। साथ ही अस्पतालों और सरकारों को आवश्यक दवाओं, चिकित्सा उपकरणों, प्रयोगशाला सुविधाओं और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की बेहतर तैयारी करने में भी सहायता मिलेगी।

क्या हैं नई गाइडलाइन की प्रमुख सिफारिशें?

डब्ल्यूएचओ ने इबोला और मारबर्ग जैसी बीमारियों के इलाज के लिए इन दिशानिर्देशों में कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। इनमें मरीजों की नियमित जांच के लिए प्राथमिकता वाले प्रयोगशाला परीक्षण, ताकि रक्त में शर्करा की कमी और अन्य मेटाबॉलिस्म संबंधी गड़बड़ियों जैसी समस्याओं का समय रहते पता चल सके।

निर्जलीकरण की स्थिति में तुरंत और सही तरीके से ओआरएस और नसों के जरिए आईवी फ्लूइड उपलब्ध कराना शामिल है।

संक्रमण के कारण होने वाले शॉक और गिरते रक्तचाप का समय रहते उपचार करना, ताकि अंगों के काम करना बंद करने जैसी गंभीर स्थिति से बचा जा सके। यदि मरीज में बैक्टीरिया से होने वाला कोई अन्य संक्रमण या सेप्सिस भी मौजूद हो, तो तुरंत उपयुक्त एंटीबायोटिक उपचार शुरू करना।

इस नई गाइडलाइन की सबसे बड़ी विशेषता इसका 'आफ्टर-केयर' यानी रिकवरी के बाद की देखभाल है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि इबोला और मारबर्ग जैसी बीमारियों से ठीक होने के बाद भी यह वायरस इंसान के शरीर के कुछ हिस्सों में महीनों तक छिपा रह सकता है।

इस 'वायरल परसिस्टेंस' के कारण न केवल मरीज को दोबारा खतरा हो सकता है, बल्कि समाज में संक्रमण की नई चेन भी बन सकती है। इसलिए, अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी ठीक हो चुके मरीजों की एक व्यवस्थित और कड़े ढांचे के तहत निगरानी की जाएगी, ताकि इस वायरस को जड़ से मिटाया जा सके।

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, बुंडीबुग्यो वायरस सहित सभी प्रकार के फिलो वायरस से जुड़े संक्रमणों में बीमारी की शुरुआती पहचान, मरीज को जल्द अस्पताल पहुंचाना और बेहतर सहायक उपचार ही सबसे प्रभावी रणनीति है।

संगठन का कहना है कि यही उपचार न केवल गंभीर जटिलताओं को कम करता है, बल्कि भविष्य में विकसित होने वाली एंटीवायरल दवाओं और अन्य उपचारों के प्रभावी इस्तेमाल की भी मजबूत नींव तैयार करता है।