इबोला के पुष्ट मामले 4,053 पहुंचे, जबकि बीमारी से करीब 1,800 लोगों की मौत हो चुकी है।
डीआरसी के पांच प्रांतों में इबोला संक्रमण फैल चुका है, जिससे स्वास्थ्य अधिकारियों की चिंता बढ़ी है।
बीमारी की देर से पहचान और कमजोर निगरानी व्यवस्था ने संक्रमण रोकने की कोशिशों को मुश्किल बनाया है।
राजधानी किंशासा में संक्रमण पहुंचने से रोकने के लिए नाव से आने वाले यात्रियों की जांच बढ़ाई गई है।
डब्ल्यूएचओ ने इबोला रोकने के लिए एरवेबो वैक्सीन के परीक्षण और इस्तेमाल को प्राथमिकता देने की सिफारिश की है।
अफ्रीकी देश डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (डीआरसी) में इबोला का प्रकोप लगातार गंभीर होता जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में इबोला के पुष्ट मामलों की संख्या पहली बार चार हजार के पार पहुंच गई है। कुल संक्रमित लोगों की संख्या 4,053 हो गई है, जबकि करीब 1,800 लोगों की मौत हो चुकी है।
इस प्रकोप को दुनिया में इबोला का दूसरा सबसे बड़ा प्रकोप माना जा रहा है। स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार, बीमारी जिस तेजी से फैल रही है, उसने संक्रमण को रोकने की कोशिशों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। विशेषज्ञों ने इसे अब तक के सबसे तेजी से फैलने वाले इबोला प्रकोपों में से एक बताया है।
पांच प्रांतों में पहुंचा संक्रमण
इबोला के मामले डीआरसी के पांच प्रांतों में सामने आए हैं। इनमें इतुरी, नॉर्थ किवु, साउथ किवु, हाउट-उएले और त्शोपो शामिल हैं। इन इलाकों में स्वास्थ्यकर्मी संक्रमित लोगों की पहचान करने और उनके संपर्क में आए लोगों की निगरानी करने में जुटे हैं।
साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रकोप की शुरुआत जनवरी में इतुरी प्रांत से हुई थी। यह भी माना गया है कि बीमारी के फैलने की शुरुआत इससे पहले हो सकती है। शोधकर्ताओं ने जनवरी से 15 मई के बीच 500 से अधिक संदिग्ध मामलों की पहचान की थी। इससे पता चलता है कि बीमारी काफी समय तक लोगों के बीच फैलती रही, लेकिन समय पर इसकी पहचान नहीं हो सकी।
बीमारी रोकने में कई मुश्किलें
इबोला के बढ़ते मामलों के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। बीमारी की देर से पहचान, कमजोर निगरानी व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता दबाव और कई इलाकों में जारी सैन्य संघर्ष ने स्थिति को और मुश्किल बना दिया है।
संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्यकर्मियों के लिए संक्रमित लोगों तक पहुंचना आसान नहीं है। कई स्वास्थ्य केंद्रों पर सुविधाओं की कमी है। इसके अलावा, कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं मिलने की शिकायतें भी सामने आई हैं। ऐसे हालात में स्वास्थ्यकर्मी अपनी जान जोखिम में डालकर मरीजों का इलाज और लोगों की जांच कर रहे हैं।
राजधानी तक पहुंचने का खतरा
इबोला के लगातार फैलने के बीच स्वास्थ्य अधिकारियों ने राजधानी किंशासा को संक्रमण से बचाने के लिए जांच बढ़ा दी है। नाव से राजधानी पहुंचने वाले यात्रियों की भी जांच की जा रही है।
यह कदम उस घटना के बाद और महत्वपूर्ण हो गया, जब एक यात्री की इबोला जैसे लक्षणों के बाद मौत हो गई। अधिकारियों को डर है कि अगर वायरस राजधानी तक पहुंच गया तो बीमारी को नियंत्रित करना और भी मुश्किल हो सकता है।
किंशासा देश का सबसे बड़ा शहर है और यहां बड़ी संख्या में लोग रहते हैं। इसलिए राजधानी में संक्रमण पहुंचने की स्थिति में इसका असर बहुत बड़े स्तर पर हो सकता है।
वैक्सीन से उम्मीद
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इबोला से निपटने के लिए वैक्सीन के इस्तेमाल और उसके परीक्षण पर जोर दिया है। संगठन ने एरवेबो वैक्सीन को प्राथमिकता देने की सिफारिश की है। यह इबोला के खिलाफ लाइसेंस प्राप्त प्रमुख वैक्सीन है।
डब्ल्यूएचओ के अनुसार, शुरुआती पशु परीक्षणों से संकेत मिले हैं कि यह वैक्सीन वायरस के दूसरे प्रकार से भी कुछ हद तक सुरक्षा दे सकती है। हालांकि इंसानों में इसकी प्रभावशीलता को लेकर अभी और वैज्ञानिक प्रमाण की जरूरत है।
डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि संक्रमित लोगों के संपर्क में आए लोगों को वैक्सीन देने से सुरक्षा को लेकर कोई बड़ी चिंता सामने नहीं आई है। संगठन का मानना है कि वायरस के इस विशेष प्रकार के खिलाफ प्रभावी वैक्सीन तैयार करना लंबे समय के लिए सबसे बेहतर उपाय होगा।
स्वास्थ्यकर्मियों के सामने बड़ी चुनौती
इबोला के खिलाफ लड़ाई में स्वास्थ्यकर्मी सबसे आगे हैं। वे संक्रमित लोगों की पहचान, इलाज और निगरानी का काम कर रहे हैं। लेकिन कई स्वास्थ्यकर्मी बिना वेतन और कठिन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं।
डब्ल्यूएचओ ने चेतावनी दी है कि बीमारी जिस गति से फैल रही है, वह मौजूदा रोकथाम और उपचार व्यवस्था की क्षमता से आगे निकल रही है। ऐसे में बीमारी को रोकने के लिए तेज जांच, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, पर्याप्त सुरक्षा उपकरण और प्रभावी टीकाकरण बेहद जरूरी है।
डीआरसी में इबोला का बढ़ता प्रकोप केवल देश के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन गया है। स्वास्थ्य अधिकारियों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती संक्रमण को नए इलाकों और राजधानी तक पहुंचने से रोकना है।