कोविड-19 टीकाकरण के लिए लगी लाइन; फोटो: आईस्टॉक 
स्वास्थ्य

कोविड टीके से जुड़े गंभीर दुष्प्रभावों पर अलग मुआवजा नीति जरूरी: सुप्रीम कोर्ट

सर्वोच्च न्यायालय ने कोविड टीकों के दुष्प्रभावों को लेकर सख्ती दिखाते हुए केंद्र सरकार को जल्द मुआवजा नीति बनाने और संबंधित आंकड़े सार्वजनिक करने का निर्देश दिया है।

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि कोविड-19 टीकाकरण के बाद होने वाले गंभीर दुष्प्रभावों के मामलों में स्पष्ट मुआवजा व्यवस्था जरूरी है।

  • अदालत ने केंद्र सरकार को “नो-फॉल्ट मुआवजा ढांचा” जल्द तैयार करने और टीकाकरण के बाद होने वाली प्रतिकूल घटनाओं से जुड़े आंकड़े पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक करने का निर्देश दिया है।

  • साथ ही अदालत ने कहा कि केवल निगरानी ही नहीं, बल्कि प्रभावित लोगों को न्याय और राहत देना भी राज्य की जिम्मेदारी है।

कोविड-19 टीकाकरण से जुड़े दुष्प्रभावों के मामलों पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि टीकों से होने वाले संभावित नुकसान या दुष्प्रभावों के मामलों में मुआवजे की स्पष्ट व्यवस्था होना जरूरी है। अदालत ने कहा कि दुनिया के कई देशों ने ऐसी नीतियां अपनाई हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि सरकारें टीकाकरण से जुड़े जोखिमों को स्वीकार करती हैं और प्रभावित लोगों के लिए राहत की व्यवस्था करती हैं।

10 मार्च 2026 को सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि भारत में फिलहाल ऐसी कोई समान और व्यवस्थित नीति नहीं दिखती, जिसके जरिए टीकाकरण के बाद गंभीर दुष्प्रभाव झेलने वाले लोगों को राहत या मुआवजा मिल सके। अदालत के अनुसार, जब टीकाकरण कार्यक्रम खासतौर पर राज्य की देखरेख और अधिकार में चलाया जाता है, तो इस कमी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि, “राज्य के नेतृत्व में चलाए गए टीकाकरण अभियान के दौरान यदि किसी परिवार को गंभीर नुकसान होने का आरोप सामने आता है, तो उनके पास न्याय पाने की कोई समान और स्पष्ट व्यवस्था नहीं है।“

अदालत ने यह भी माना कि कोविड-19 महामारी की शुरुआत से ही सरकार के सभी स्तरों पर इसके प्रभाव को कम करने के प्रयास किए गए।

केवल निगरानी नहीं, मुआवजा भी सरकार की जिम्मेदारी

लेकिन अदालत ने अपने पहले के फैसले 'जैकब पुलियेल बनाम भारत संघ' का हवाला देते हुए कहा कि सरकार की जिम्मेदारी केवल टीकाकरण के बाद होने वाली घटनाओं की निगरानी तक सीमित नहीं हो सकती। यह जिम्मेदारी उन लोगों को उचित और न्यायसंगत मुआवजा देने तक भी जाती है, जिन्हें टीके से नुकसान हुआ है।

अपीलकर्ताओं की इस चिंता को देखते हुए कि टीकाकरण के बाद होने वाली प्रतिकूल घटनाओं की निगरानी प्रभावी नहीं है, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि केंद्र सरकार को इन घटनाओं की निगरानी के लिए मजबूत और प्रभावी तंत्र सुनिश्चित करना चाहिए। साथ ही, इससे जुड़े जरूरी आंकड़े पारदर्शी तरीके से समय पर सार्वजनिक किए जाने चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के माध्यम से जल्द से जल्द ऐसा “नो-फॉल्ट मुआवजा ढांचा” तैयार किया जाए, जो कोविड-19 टीकाकरण के बाद होने वाली गंभीर प्रतिकूल घटनाओं (एईएफआई) के मामलों को संबोधित कर सके।

अदालत ने कहा कि दुनिया के कई देशों में इस तरह की व्यवस्थाएं पहले से मौजूद हैं। उदाहरण के लिए जापान में 1976 से ही टीकों से होने वाले नुकसान के लिए नो-फॉल्ट मुआवजा योजना लागू है। 2020 में कानून में संशोधन कर कोविड-19 टीकों को भी इसमें “अस्थाई टीकाकरण” के रूप में शामिल किया गया, जिससे टीकों से जुड़े कई प्रकार के दुष्प्रभाव इस योजना के दायरे में आते हैं।

मुआवजा नीति का मतलब सरकार की गलती स्वीकार करना नहीं

अदालत ने कहा कि टीकाकरण के बाद होने वाली प्रतिकूल घटनाओं की निगरानी के लिए जो मौजूदा व्यवस्था है, उसे जारी रखा जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चूंकि इन घटनाओं के वैज्ञानिक आकलन के लिए पहले से ही तंत्र मौजूद है, इसलिए अलग से अदालत द्वारा किसी नई विशेषज्ञ समिति बनाने की जरूरत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नई मुआवजा नीति बनाना केंद्र सरकार की किसी गलती या जिम्मेदारी को स्वीकार करना नहीं माना जाएगा। साथ ही, प्रभावित लोग कानून के तहत उपलब्ध अन्य कानूनी उपायों का सहारा लेने के लिए स्वतंत्र रहेंगे।

यह मामला रचना गंगु और अन्य बनाम भारत संघ नामक याचिका से जुड़ा है, जिसे उन युवाओं के माता-पिता ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर किया था जिनकी कोविड-19 टीकाकरण के बाद मौत होने का दावा किया गया। याचिका में इन मौतों की जांच के लिए स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति बनाने, टीके के दुष्प्रभावों की जल्द पहचान और उपचार के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल तैयार करने तथा पीड़ित परिवारों को मुआवजा देने की मांग की गई थी।

दुष्प्रभावों की निगरानी और आंकड़े सार्वजनिक करने पर जोर

इसी तरह की शिकायतों को लेकर कुछ याचिकाएं केरल उच्च न्यायालय में भी दायर की गई थी। इनमें से एक याचिका सईदा के ए बनाम भारत संघ में याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि कोविड-19 टीकाकरण के बाद हुई कथित मौत को टीकाकरण के बाद की प्रतिकूल घटना के रूप में मान्यता दी जाए और मृतक के परिजनों को मुआवजा दिया जाए।

इस मामले में अदालत ने सितंबर 2022 में अंतरिम आदेश देते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को निर्देश दिया था कि टीकाकरण के बाद होने वाली प्रतिकूल घटनाओं की पहचान और मृतकों के परिवारों को मुआवजा देने के लिए तय समयसीमा के भीतर नीति तैयार की जाए।

बाद में केंद्र सरकार ने अनुरोध किया कि मुआवजे की समान मांग वाली जो याचिकाएं केरल उच्च न्यायालय में लंबित हैं, उन्हें सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया जाए, ताकि एक समान कानूनी दृष्टिकोण तय किया जा सके।

सुप्रीम कोर्ट ने अब स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति और टीकाकरण से जुड़े दुष्प्रभावों के मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा क्या होनी चाहिए और सरकार की जिम्मेदारी किस हद तक तय होती है।