12 साल के अध्ययन में पाया गया कि पेट की अधिक चर्बी और कमजोर मांसपेशियों का मेल मृत्यु का जोखिम 83 प्रतिशत बढ़ाता है।
शोध में 50 वर्ष से अधिक उम्र के 5,440 लोगों के स्वास्थ्य के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया।
सार्कोपेनिक मोटापा मांसपेशियों की कमी और शरीर में बढ़ती चर्बी की संयुक्त स्थिति है, जो बुजुर्गों के लिए खतरनाक बनती है।
कमर की माप और सरल गणना से मांसपेशियों का अनुमान लगाकर इस बीमारी की शुरुआती पहचान संभव हो सकती है।
समय पर पहचान होने पर सही आहार, व्यायाम और स्वास्थ्य निगरानी से जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाई जा सकती है।
हाल ही में किए गए एक लंबे अध्ययन में यह पाया गया है कि अगर किसी व्यक्ति के शरीर में पेट की अधिक चर्बी और कमजोर मांसपेशियां दोनों एक साथ मौजूद हों, तो उसकी मृत्यु का खतरा काफी बढ़ जाता है। इस स्थिति को सार्कोपेनिक मोटापा कहा जाता है।
एजिंग क्लिनिकल एंड एक्सपेरिमेंटल रिसर्च पत्रिका में प्रकाशित यह शोध लगभग 12 वर्षों तक चला और इसमें 50 वर्ष या उससे अधिक उम्र के 5,440 लोगों को शामिल किया गया। यह अध्ययन ब्राजील की फेडरल यूनिवर्सिटी ऑफ साओ कार्लोस और यूके की यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया। शोध के नतीजे बताते हैं कि इस समस्या की पहचान महंगे स्कैन के बिना भी आसान तरीकों से की जा सकती है।
सार्कोपेनिक मोटापा क्या है?
सार्कोपेनिक मोटापा एक ऐसी स्वास्थ्य स्थिति है जिसमें शरीर में धीरे-धीरे मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं और शरीर में पेट के आसपास चर्बी बढ़ने लगती है।
आमतौर पर उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियों की ताकत कम होती जाती है। लेकिन अगर इसी समय शरीर में चर्बी भी बढ़ जाए तो यह स्थिति और अधिक खतरनाक हो सकती है।
इस समस्या के कारण लोगों को कई दिक्कतें हो सकती हैं, जैसे -
कमजोरी और थकान
चलने-फिरने में परेशानी
गिरने का खतरा बढ़ना
रोजमर्रा के काम करने में कठिनाई
लंबे समय में यह समस्या व्यक्ति की जीवन गुणवत्ता और स्वतंत्रता दोनों को प्रभावित कर सकती है।
पेट की चर्बी और मांसपेशियों की कमी का खतरनाक असर
अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों में पेट की ज्यादा चर्बी और कम मांसपेशियां दोनों मौजूद थीं, उनमें मृत्यु का जोखिम 83 प्रतिशत अधिक था।
शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि जिन लोगों में कम मांसपेशियां थीं लेकिन पेट की चर्बी नहीं थी, उनमें मृत्यु का खतरा 40 प्रतिशत कम पाया गया। जिन लोगों के पेट में चर्बी थी लेकिन उनकी मांसपेशियां पर्याप्त थीं, उनमें मृत्यु का खतरा नहीं बढ़ा। इससे पता चलता है कि सबसे ज्यादा नुकसान तब होता है जब दोनों समस्याएं एक साथ मौजूद हों।
शरीर में सूजन और मांसपेशियों पर असर
विशेषज्ञों के अनुसार शरीर में अधिक चर्बी होने से सूजन (इन्फ्लेमेशन) बढ़ जाती है। यह सूजन शरीर के कई हिस्सों को प्रभावित करती है, खासकर मांसपेशियों को। समय के साथ चर्बी मांसपेशियों के अंदर जमा होने लगती है और उनकी जगह लेने लगती है। इससे मांसपेशियों की ताकत और कार्य क्षमता कम हो जाती है।
इसका असर शरीर की कई अहम प्रक्रियाओं पर पड़ता है, जैसे - मेटाबॉलिज्म, प्रतिरक्षा प्रणाली, हार्मोन संतुलन, शारीरिक ताकत आदि।
महंगे स्कैन के बिना भी हो सकती है पहचान
आमतौर पर सार्कोपेनिक मोटापे की पहचान के लिए महंगे परीक्षण किए जाते हैं, जैसे -
मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग
कंप्यूटेड टोमोग्राफी
बायोइलेक्ट्रिकल इम्पीडेंस एनालिसिस
ये परीक्षण शरीर की चर्बी और मांसपेशियों की मात्रा को सटीक रूप से माप सकते हैं, लेकिन ये काफी महंगे होते हैं और हर अस्पताल में उपलब्ध नहीं होते। शोधकर्ताओं ने पाया कि सरल क्लिनिकल मापों की मदद से भी इस समस्या की शुरुआती पहचान की जा सकती है।
आसान तरीकों से खतरों की पहचान करना
अध्ययन में दो मुख्य मापों का उपयोग किया गया -
1. कमर का घेरा : पुरुषों में 102 सेंटीमीटर से अधिक, महिलाओं में 88 सेंटीमीटर से अधिक
2. मांसपेशियों का सूचकांक: पुरुषों में 9.36 किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर से कम, महिलाओं में 6.73 किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर से कम
इन मापों की मदद से डॉक्टर यह अनुमान लगा सकते हैं कि किसी व्यक्ति में सार्कोपेनिक मोटापे का खतरा है या नहीं।
समय पर पहचान क्यों जरूरी है
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बीमारी के लिए अभी तक दुनिया भर में एक समान मानक परिभाषा नहीं है। यही कारण है कि कई मामलों में यह समस्या समय पर पहचान में नहीं आती। अगर इस स्थिति की पहचान जल्दी हो जाए तो व्यक्ति को सही समय पर उपचार और सलाह दी जा सकती है, जैसे - संतुलित और पौष्टिक आहार, नियमित व्यायाम तथा मांसपेशियों को मजबूत करने वाली गतिविधियां। इन उपायों से मांसपेशियों की ताकत बनाए रखने में मदद मिल सकती है और जीवन की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है।
यह अध्ययन बताता है कि केवल मोटापा ही समस्या नहीं है। असली खतरा तब बढ़ता है जब पेट की चर्बी बढ़ने के साथ-साथ मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं। अच्छी बात यह है कि इस स्थिति की पहचान अब सरल और सस्ते तरीकों से भी की जा सकती है। इसलिए खासकर 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए नियमित स्वास्थ्य जांच, सही आहार और शारीरिक गतिविधि बहुत महत्वपूर्ण हैं। समय पर सावधानी और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।