दुनिया भर में बच्चों में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस बढ़ा, एसिनेटोबैक्टर और क्लेबसिएला जैसे बैक्टीरिया बन रहे गंभीर स्वास्थ्य चुनौती।
2035 तक कार्बापेनेम दवाओं के खिलाफ बढ़ सकता है प्रतिरोध, विशेषज्ञों ने बेहतर निगरानी और इलाज की जरूरत बताई।
बच्चों पर एएमआर निगरानी की कमी उजागर, शोधकर्ताओं ने सुरक्षित एंटीबायोटिक इस्तेमाल और नई रणनीतियों पर जोर दिया।
कम आय वाले देशों में गलत एंटीबायोटिक उपयोग और कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था से संक्रमण नियंत्रण मुश्किल हो रहा है।
किडनी रोग से जूझ रहे 13 वर्षीय हैरी की कहानी ने बच्चों में एंटीबायोटिक प्रतिरोध के खतरे को दिखाया।
दुनिया भर में एंटीबायोटिक दवाओं के असर कम होने की समस्या यानी एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) तेजी से बढ़ रही है। एक नई रिसर्च में सामने आया है कि दो तरह के ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं। इनमें पहला है एसिनेटोबैक्टर बाउमानी और दूसरा है क्लेबसिएला।
रिसर्च के अनुसार, एसिनेटोबैक्टर बाउमानी में सबसे ज्यादा एंटीबायोटिक प्रतिरोध देखा गया है। यह बैक्टीरिया अक्सर अस्पतालों में होने वाले खून के संक्रमण और निमोनिया जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बनता है। वहीं, क्लेबसिएला बैक्टीरिया यूरिन इंफेक्शन और लिवर एब्सेस जैसी बीमारियां पैदा कर सकता है। इस बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक के खिलाफ प्रतिरोध सबसे तेजी से बढ़ रहा है, खासकर दक्षिण-पूर्व एशिया, पूर्वी यूरोप और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में।
2035 तक बढ़ सकता है खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में आखिरी विकल्प के रूप में इस्तेमाल होने वाली कार्बापेनेम जैसी एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ भी प्रतिरोध बढ़ सकता है। अनुमान है कि साल 2035 तक एसिनेटोबैक्टर बाउमानी में यह प्रतिरोध लगभग 82 प्रतिशत और क्लेबसिएला में करीब 35 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।
इसका मतलब है कि कई गंभीर संक्रमणों के इलाज के लिए डॉक्टरों के पास सीमित विकल्प बच सकते हैं। बच्चों के मामले में यह समस्या और भी गंभीर है, क्योंकि उनके इलाज के लिए सुरक्षित और प्रभावी दवाओं की जरूरत अधिक होती है। यह शोध जामा पीडियाट्रिक्स नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
बच्चों में एएमआर पर ध्यान कम
रिसर्च से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि अब तक वैश्विक स्तर पर एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस की निगरानी में बच्चों को पर्याप्त जगह नहीं मिली है। शोध पत्र में मेलबर्न विश्वविद्यालय के शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि बच्चों में पहली और दूसरी श्रेणी की एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ बढ़ता प्रतिरोध अब डॉक्टरों के सामने एक वास्तविक चुनौती है।
उन्होंने कहा कि बच्चों में एंटीबायोटिक प्रतिरोध को समझना जरूरी है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि यह समस्या कहां बढ़ रही है और समय रहते इसे नियंत्रित करने के कदम उठाए जा सकें। इसके लिए "बच्चों में एएमआर" जैसी पहल शुरू की गई है, जिसका उद्देश्य बच्चों में बढ़ते एंटीबायोटिक प्रतिरोध को सामने लाना है।
गरीब देशों में ज्यादा मुश्किलें
विशेषज्ञों के अनुसार, कम आय वाले देशों में यह समस्या और अधिक गंभीर है। वहां बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल, साफ-सफाई की कमी और सही जांच की सुविधा न होना बड़ी वजहें हैं।
इन देशों में बेहतर जांच तकनीक और जरूरी एंटीबायोटिक दवाओं की उपलब्धता बढ़ाने की जरूरत है। वहीं, अमीर देशों में भी एंटीबायोटिक के गलत और ज्यादा इस्तेमाल को रोकना जरूरी है। खेती, पशु चिकित्सा, अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में सावधानी बरतने की जरूरत है।
बच्चों के लिए बेहतर दवाओं की जरूरत
विशेषज्ञों ने बच्चों के लिए आसानी से इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक दवाओं, सही खुराक की जानकारी और नई रिसर्च के लिए अधिक निवेश की मांग की है। उनका कहना है कि संक्रमण को रोकने के लिए साफ-सफाई और बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था भी बेहद जरूरी है।
लोगों से अपील की गई है कि वे डॉक्टर से सलाह के बिना एंटीबायोटिक न लें और हर बीमारी में इन दवाओं की जरूरत को समझें। कई बार एंटीबायोटिक का अनावश्यक इस्तेमाल भविष्य में गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है।
13 साल के हैरी की कहानी
हैरी नाम का 13 साल का बच्चा इस समस्या का उदाहरण है। हैरी जन्म से ही किडनी की बीमारी से जूझ रहा है। उसे कई वर्षों तक संक्रमण से बचाने और इलाज के लिए एंटीबायोटिक दवाएं लेनी पड़ीं।
छह महीने की उम्र में हैरी को डायलिसिस शुरू करना पड़ा था और चार साल की उम्र में उसके पिता ने उसे किडनी दान की। किडनी ट्रांसप्लांट के बाद वह इम्यूनोसप्रेसेंट दवाएं लेता है, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
हैरी की मां ईलीन ने बताया कि इलाज के दौरान पता चला कि उसके संक्रमण फैलाने वाले बैक्टीरिया कई सामान्य एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधी हो चुके थे। उन्होंने कहा कि बच्चों में एएमआर जैसी पहल लोगों को यह समझाने में मदद कर सकती है कि एंटीबायोटिक हर स्थिति में सबसे अच्छा विकल्प नहीं होती।
इस रिसर्च में रॉयल चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल, ब्राउन यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न के शोधकर्ताओं ने भी योगदान दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को सुरक्षित रखने और भविष्य में एंटीबायोटिक दवाओं को प्रभावी बनाए रखने के लिए अभी से कदम उठाने जरूरी हैं।