प्रोस्टेट कैंसर पुरुषों में होने वाला एक गंभीर और तेजी से बढ़ता हुआ कैंसर है। यह कैंसर अक्सर धीरे-धीरे बढ़ता है, लेकिन कई बार यह शरीर के अन्य हिस्सों तक फैलकर जानलेवा भी हो जाता है। खासकर तब, जब यह मेटास्टेटिक स्टेज यानी कैंसर शरीर में फैल जाता है। ऐसे मरीजों का इलाज चुनना डॉक्टरों के लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है, क्योंकि हर मरीज पर एक जैसी दवा या कीमोथेरेपी समान असर नहीं करती।
हाल ही में यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (यूसीएल) के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक बड़े अध्ययन ने यह दिखाया है कि अब मॉलिक्यूलर प्रोफाइलिंग यानी जीन की जांच करके यह पहचाना जा सकता है कि किस मरीज को कीमोथेरेपी से सबसे अधिक फायदा होगा और किसे इससे बचाया जा सकता है।
🧬 क्या कहता है अध्ययन?
यह शोध अंतरराष्ट्रीय मेडिकल पत्रिका सेल में प्रकाशित हुआ है। इसमें वैज्ञानिकों ने पाया कि प्रोस्टेट जीनोमिक क्लासिफायर टेस्ट नामक एक जीन परीक्षण, जो अमेरिका में पहले से ही उपयोग में है, मरीजों की जीन अभिव्यक्ति को देखकर बता सकता है कि कौन-सा मरीज कीमोथेरेपी से फायदेमंद होगा।
अध्ययन में 1,523 मरीजों को शामिल किया गया था, जो सभी स्टैम्पेड तृतीय चरण नैदानिक परीक्षण का हिस्सा थे। इन मरीजों को पहले से ही एंड्रोजन डिप्राइवेशन थेरेपी (एडीटी) दी जा रही थी। यह इलाज पुरुष हार्मोन टेस्टोस्टेरोन को रोकता है, क्योंकि यह हार्मोन प्रोस्टेट कैंसर को बढ़ने में मदद करता है।
इसके बाद शोधकर्ताओं ने मरीजों में यह देखा कि अगर एडीटी के साथ-साथ कीमोथेरेपी (डोसेटैक्सेल दवा) दी जाए तो किसे कितना लाभ होता है।
🧬 अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष
अध्ययन में 832 मरीज, जिनका कैंसर शरीर में फैल चुका था (मेटास्टेटिक प्रोस्टेट कैंसर), उनके टेस्ट किए गए। जिन मरीजों के डिफेर प्रोस्टेट टेस्ट स्कोर अधिक थे, उनमें कीमोथेरेपी (डोसेटैक्सेल) से मौत का खतरा 36 फीसदी तक कम हो गया। जबकि जिन मरीजों के डिफेर स्कोर कम थे, उन्हें कीमोथेरेपी से लगभग कोई फायदा नहीं मिला (सिर्फ चार फीसदी से भी कम)।
इसका मतलब यह हुआ कि अब डॉक्टर आसानी से पहचान सकते हैं कि किस मरीज को कीमोथेरेपी देनी चाहिए और किसे इससे बचाना चाहिए। इससे उन मरीजों को कीमोथेरेपी के अनचाहे दुष्प्रभावों से भी बचाया जा सकेगा, जिन्हें इसका फायदा नहीं मिलने वाला।
🧬 प्रोस्टेट कैंसर की चुनौती
अध्ययन के मुताबिक, ब्रिटेन में हर साल लगभग 55,100 पुरुषों को प्रोस्टेट कैंसर होता है और करीब 12,000 मौतें इसी बीमारी से होती हैं। यह पुरुषों में कैंसर से होने वाली मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। सबसे अधिक मौतें उन्हीं मरीजों में होती हैं जिन्हें शुरू में ही अग्रिम या मेटास्टेटिक कैंसर के रूप में पहचाना गया।
हालांकि डोसेटैक्सेल जैसी कीमोथेरेपी दवाएं जीवन बढ़ा सकती हैं, लेकिन इनके साइड इफेक्ट जैसे कमजोरी, बाल झड़ना, थकान और संक्रमण का खतरा जीवन की गुणवत्ता को बहुत कम कर देते हैं। ऐसे में यह नई खोज डॉक्टरों और मरीजों दोनों के लिए बहुत राहत भरी साबित हो सकती है।
🧬 नई खोजें और भविष्य की दिशा
इस अध्ययन में एक और बड़ी खोज हुई। शोधकर्ताओं ने पाया कि अगर किसी मरीज में पीटीईइन जीन निष्क्रिय है, तो उसका कैंसर हॉर्मोन थेरेपी से कम असरदार साबित होता है, लेकिन कीमोथेरेपी से ज्यादा फायदा मिलता है। इसका अर्थ है कि भविष्य में मरीजों के इलाज को उनके मॉलिक्यूलर प्रोफाइल के आधार पर और भी अधिक सटीक बनाया जा सकता है।
🧬 क्या है विशेषज्ञों की राय?
शोध के हवाले से यूसीएल में कैंसर इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि यह अध्ययन प्रोस्टेट कैंसर को अलग-अलग मॉलिक्यूलर समूहों में बांटने वाला अहम है। इससे भविष्य में हर मरीज को उसके ट्यूमर की विशेषताओं के हिसाब से व्यक्तिगत इलाज मिलेगा।
हर साल करीब 10,000 पुरुष एडवांस्ड प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित पाए जाते हैं। यह शोध उन्हें मदद करेगा यह जानने में कि किसे कीमोथेरेपी से फायदा होगा और किसे नहीं। इससे कई मरीज लंबे समय तक जी पाएँगे और अन्य अनावश्यक इलाज से बच सकेंगे।
इस शोध ने यह साफ कर दिया है कि अब प्रोस्टेट कैंसर के इलाज में ‘एक ही तरह का इलाज सबके लिए’ वाली सोच को बदलना होगा। जीन टेस्ट जैसे डिफेर प्रोस्टेट से डॉक्टर पहले से तय कर पाएंगे कि किस मरीज को कीमोथेरेपी की जरूरत है और किसे नहीं।
इससे एक ओर जहां कई मरीजों की जीवन प्रत्याशा बढ़ेगी, वहीं दूसरी ओर अनावश्यक दुष्प्रभावों से भी बचाव होगा। यह खोज न केवल प्रोस्टेट कैंसर के इलाज में बल्कि भविष्य में अन्य कैंसरों के इलाज में भी एक बड़ी क्रांति साबित हो सकती है।