अमेरिका में 2024 के बर्ड फ्लू प्रकोप के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि एच5एन1 वायरस गायों के थनों को अधिक संक्रमित करता है।
शोध में खुलासा हुआ कि विशेष एन-लिंक्ड सियालिक एसिड रिसेप्टर थनों में अधिक होने से वायरस तेजी से फैलता है।
गायों में बर्ड फ्लू ने फेफड़ों के बजाय गंभीर मास्टाइटिस पैदा की, जिससे शुरुआत में बीमारी की पहचान मुश्किल रही।
संक्रमित गायों के दूध में बड़ी मात्रा में वायरस मिला, जिससे फार्म कर्मियों और पालतू जानवरों पर खतरा बढ़ा।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज भविष्य में नई प्रजातियों में बर्ड फ्लू के प्रभाव का अनुमान लगाने में मदद करेगी।
साल 2024 की शुरुआत में अमेरिका के डेयरी फार्मों में बर्ड फ्लू (एच5एन1) वायरस का एक असामान्य प्रकोप सामने आया था। इस दौरान बड़ी संख्या में डेयरी गायें बीमार हो गई। शुरुआत में पशु चिकित्सक यह समझ नहीं पाए कि बीमारी का कारण क्या है, क्योंकि वायरस का व्यवहार अन्य जानवरों की तुलना में बिल्कुल अलग था।
आमतौर पर बर्ड फ्लू फेफड़ों और श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है, लेकिन गायों में यह वायरस मुख्य रूप से थनों (उदर) को संक्रमित कर रहा था। इससे गायों में गंभीर मास्टाइटिस नामक बीमारी फैल गई, जो दूध ग्रंथियों में सूजन और ऊतकों को नुकसान पहुंचाती है।
वैज्ञानिकों ने खोजा बीमारी का कारण
अब अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के वैज्ञानिकों ने इस रहस्य का समाधान खोज लिया है। उनका अध्ययन हाल ही में साइंस एडवांसेज पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, वायरस गायों के शरीर में मौजूद एक विशेष प्रकार के रिसेप्टर से जुड़ता है। रिसेप्टर कोशिकाओं की सतह पर मौजूद ऐसे अणु होते हैं, जिनकी मदद से वायरस शरीर में प्रवेश करता है।
वैज्ञानिकों ने पाया कि एच5एन1 वायरस केवल एक खास प्रकार के रिसेप्टर, जिसे एन-लिंक्ड सियालिक एसिड रिसेप्टर कहा जाता है, से प्रभावी रूप से जुड़ पाता है।
थनों में मिले अधिक रिसेप्टर
अध्ययन में पता चला कि ये विशेष रिसेप्टर गायों के थनों की ऊतकों में बड़ी मात्रा में मौजूद हैं। इसके विपरीत, गायों के श्वसन तंत्र और फेफड़ों में इनकी संख्या बहुत कम है।
यही कारण है कि वायरस फेफड़ों की बजाय सीधे दूध ग्रंथियों में तेजी से बढ़ने लगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि थन वायरस के लिए एक आदर्श वातावरण बन गए, जहां वह आसानी से अपनी संख्या बढ़ा सकता था।
इस खोज से यह स्पष्ट हो गया कि संक्रमित गायों में गंभीर मास्टाइटिस क्यों विकसित हुई, जबकि उनमें श्वसन संबंधी लक्षण बहुत कम दिखाई दिए।
शुरुआत में नहीं हो पाया था सही पता
शोधकर्ताओं के अनुसार, जब बीमारी पहली बार सामने आई थी, तब पशु चिकित्सकों को लगा कि यह कोई सामान्य बैक्टीरियल संक्रमण है। डेयरी पशुओं में मास्टाइटिस एक आम बीमारी मानी जाती है, इसलिए सभी का ध्यान पहले बैक्टीरिया की ओर गया।
बाद में जांच के दौरान पता चला कि असली कारण बर्ड फ्लू वायरस है। यह जानकारी मिलने तक वायरस कई फार्मों और पशुओं तक फैल चुका था। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी ने यह कल्पना भी नहीं की थी कि एच5एन1 वायरस गायों को इस प्रकार संक्रमित कर सकता है।
दूध के माध्यम से फैला वायरस
वैज्ञानिकों ने बताया कि संक्रमित गायों के दूध में बड़ी मात्रा में वायरस पाया गया। इससे फार्म कर्मचारियों और अन्य जानवरों के संक्रमित होने का खतरा बढ़ गया।
कुछ जगहों पर कच्चा दूध पालतू बिल्लियों को भी पिलाया गया, जिसके बाद उनमें संक्रमण के मामले सामने आए। पहले के अध्ययनों में संक्रमित बिल्लियों में गंभीर बीमारी और मौत तक दर्ज की गई थी। हालांकि विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि दूध का पाश्चुरीकरण वायरस को नष्ट कर देता है। इसलिए पाश्चुरीकृत दूध और उससे बने उत्पादों को सुरक्षित माना जाता है।
भविष्य की तैयारी में मिलेगी मदद
शोधकर्ताओं का मानना है कि यह अध्ययन केवल गायों में हुए प्रकोप को समझाने तक सीमित नहीं है। इसकी मदद से भविष्य में यह अनुमान लगाया जा सकेगा कि एच5एन1 वायरस किसी नई प्रजाति में पहुंचने पर शरीर के किस हिस्से को प्रभावित कर सकता है।
यदि वैज्ञानिक पहले से विभिन्न जानवरों के ऊतकों में मौजूद रिसेप्टरों का अध्ययन कर लें, तो वे संभावित संक्रमण के पैटर्न का अनुमान लगा सकते हैं। इससे नई महामारियों या बड़े प्रकोपों के लिए पहले से तैयारी करना आसान होगा।
महत्वपूर्ण साबित होगी खोज
विशेषज्ञों के अनुसार, यह अध्ययन वायरस और उसके मेजबान के बीच संबंधों को समझने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है। इससे यह पता चलता है कि केवल रिसेप्टर की मौजूदगी ही महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि उसकी संरचना और शरीर में उसका स्थान भी संक्रमण की प्रकृति तय करता है।
वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस नई जानकारी के आधार पर भविष्य में बर्ड फ्लू जैसे खतरनाक वायरसों की निगरानी और रोकथाम अधिक प्रभावी ढंग से की जा सकेगी। इससे पशुओं के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण मदद मिलेगी।