अध्ययन में यह भी पाया गया कि धूम्रपान न करने वाली युवा महिलाओं में फेफड़ों के कैंसर के मामले पुरुषों की तुलना में ज्यादा देखे गए हैं। फोटो साभार: आईस्टॉक
स्वास्थ्य

कम उम्र के धूम्रपान न करने वालों में बढ़ रहा है फेफड़ों का कैंसर, क्या हैं कारण?

युवा धूम्रपान न करने वालों में बढ़ता फेफड़ों का कैंसर और स्वस्थ आहार व कीटनाशक संपर्क को लेकर किए गए नए वैज्ञानिक अध्ययन के क्या कहते हैं निष्कर्ष

Dayanidhi

  • शोध में पाया गया कि 50 वर्ष से कम उम्र के धूम्रपान न करने वालों में फेफड़ों का कैंसर बढ़ रहा है।

  • अध्ययन में देखा गया कि कैंसर मरीजों ने सामान्य लोगों की तुलना में अधिक फल, सब्जियां और साबुत अनाज खाए थे।

  • वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया कि बिना जैविक भोजन में मौजूद कीटनाशक इस स्वास्थ्य के लिए खतरे से जुड़े हो सकते हैं।

  • शोध में यह भी पाया गया कि युवा महिलाओं में फेफड़ों के कैंसर के मामले पुरुषों की तुलना में अधिक हैं।

  • अध्ययन अभी शुरुआती दौर में है, जिसमें सीधे कीटनाशक स्तर नहीं मापे गए, आगे विस्तृत शोध की आवश्यकता जताई गई है।

हाल ही में अमेरिका के शोधकर्ताओं ने फेफड़ों के कैंसर से जुड़ा एक ऐसा पैटर्न देखा है, जिसने वैज्ञानिकों को भी हैरान कर दिया है। यह अध्ययन दिखाता है कि 50 साल से कम उम्र के ऐसे लोग जो धूम्रपान नहीं करते, उनमें फेफड़ों के कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। यह बात इसलिए और भी चौंकाने वाली है क्योंकि आमतौर पर फेफड़ों का कैंसर धूम्रपान से जुड़ा माना जाता है।

यह शोध अमेरिका के यूएससी नॉरिस कॉम्प्रिहेंसिव कैंसर सेंटर और केक मेडिसिन ऑफ यूएससी के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है। इसे अमेरिकन एसोसिएशन फॉर कैंसर रिसर्च की वार्षिक बैठक में प्रस्तुत किया गया।

स्वस्थ आहार और अप्रत्याशित परिणाम

आमतौर पर माना जाता है कि फल, सब्जियां और साबुत अनाज खाना सेहत के लिए बहुत अच्छा होता है। यह आहार शरीर को बीमारियों से बचाने में मदद करती है और इसे स्वस्थ जीवन का आधार माना जाता है।

लेकिन इस नए अध्ययन में एक अजीब बात सामने आई। जिन युवाओं को फेफड़ों का कैंसर हुआ, उन्होंने सामान्य लोगों की तुलना में ज्यादा स्वस्थ आहार या हेल्दी डाइट ली थी। यानी उन्होंने अधिक फल, सब्जियां और साबुत अनाज खाया था।

शोधकर्ताओं के अनुसार, यह निष्कर्ष यह नहीं कहता कि स्वस्थ आहार कैंसर का कारण है, बल्कि यह संकेत देता है कि शायद कोई और बाहरी कारण इसमें भूमिका निभा रहा हो।

संभावित कारण: कीटनाशकों का असर

शोधकर्ताओं ने एक संभावित कारण की ओर इशारा किया जो हैं कीटनाशकों का असर। उनका कहना है कि बाजार में मिलने वाले फल जो जैविक नहीं हैं, सब्जियां और अनाज में कीटनाशकों के अवशेष ज्यादा हो सकते हैं

अगर लोग लंबे समय तक ऐसे खाद्य पदार्थ खाते हैं जिनमें कीटनाशक मौजूद हों, तो यह उनके स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है। हालांकि, अभी यह सिर्फ एक अनुमान है और इसे साबित करने के लिए और शोध की जरूरत है।

युवा महिलाओं में अधिक मामले

अध्ययन में यह भी पाया गया कि धूम्रपान न करने वाली युवा महिलाओं में फेफड़ों के कैंसर के मामले पुरुषों की तुलना में ज्यादा देखे गए हैं। इन महिलाओं ने औसतन ज्यादा फल, सब्जियां और साबुत अनाज का सेवन किया था। लेकिन वैज्ञानिक यह स्पष्ट कर रहे हैं कि इसका मतलब यह नहीं है कि उनका आहार ही बीमारी का कारण है।

फेफड़ों के कैंसर का बदलता पैटर्न

पहले फेफड़ों का कैंसर ज्यादातर बुजुर्गों में पाया जाता था और इसका मुख्य कारण धूम्रपान था। औसत उम्र लगभग 70 साल के आसपास होती थी।

लेकिन अब स्थिति बदल रही है। धूम्रपान के मामलों में कमी आने के बावजूद युवा धूम्रपान न करने वालों में फेफड़ों का कैंसर बढ़ रहा है। यह एक नई और चिंताजनक प्रवृत्ति है।

अध्ययन की सीमाएं

इस शोध में लगभग 187 मरीजों का अध्ययन किया गया था। सभी मरीज 50 साल से कम उम्र के थे और उनमें से ज्यादातर ने कभी धूम्रपान नहीं किया था।

हालांकि यह अध्ययन अहम संकेत देता है, लेकिन इसमें कुछ सीमाएं भी हैं। इसमें सीधे तौर पर कीटनाशकों के स्तर को मापा नहीं गया था। यह जानकारी अनुमान और पहले से उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित थी। इसलिए वैज्ञानिक इसे अंतिम निष्कर्ष नहीं मानते, बल्कि एक शुरुआती संकेत मानते हैं जिसे आगे और जांच की जरूरत है।

आगे की दिशा

शोधकर्ताओं का कहना है कि अगला कदम यह पता लगाना होगा कि क्या वास्तव में शरीर में कीटनाशकों के स्तर और फेफड़ों के कैंसर के बीच कोई संबंध है।इसके लिए मरीजों के खून और मूत्र की जांच की जाएगी। इससे यह भी समझने में मदद मिलेगी कि कौन से कीटनाशक ज्यादा हानिकारक हो सकते हैं।

यह अध्ययन एक बड़ा सवाल उठाता है, लेकिन अभी यह साबित नहीं करता कि स्वस्थ आहार फेफड़ों के कैंसर का कारण है। बल्कि यह दिखाता है कि पर्यावरण और भोजन से जुड़े कुछ छिपे हुए कारण हो सकते हैं, जिन्हें अभी पूरी तरह समझा नहीं गया है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि आगे और शोध की जरूरत है ताकि फेफड़ों के कैंसर के बढ़ते मामलों को बेहतर तरीके से समझा और रोका जा सके।