लंबी जिंदगी हर किसी की चाहत है, लेकिन क्या ज्यादा साल जीना अपने आप में बेहतर जिंदगी की गारंटी है?
भारत में बुजुर्गों की स्थिति पर हुए नए अध्ययन के आंकड़े इस सवाल को गंभीर बनाते हैं। 60 वर्ष की उम्र में भारतीय महिलाओं की औसत शेष जीवन प्रत्याशा करीब 19 साल है, लेकिन इनमें से सिर्फ 5.7 साल ही ऐसे हैं जिन्हें ‘अच्छे जीवन’ के साल कहा जा सकता है।
पुरुषों के लिए 17.5 साल की शेष जीवन प्रत्याशा में अच्छे जीवन के साल 8.2 हैं।
लिंग और रहने की जगह को साथ देखें तो असमानता और गहरी दिखाई देती है। 60 साल की उम्र में शहरी पुरुषों को औसतन 10.2 साल अच्छे जीवन के मिलने का अनुमान है, जबकि ग्रामीण महिलाओं के हिस्से में सिर्फ 4.6 साल आते हैं। दोनों की शेष जीवन प्रत्याशा करीब 19 साल है, लेकिन इन वर्षों की गुणवत्ता में पांच साल से ज्यादा का अंतर है।
अध्ययन में ग्रामीण महिलाओं की स्थिति इस लिहाज से विशेष चिंता पैदा करती है। अध्ययन में पाया गया कि जहां 96 फीसदी शहरी पुरुष मानसिक या संज्ञानात्मक स्वास्थ्य की निर्धारित कसौटी पर खरे उतरते हैं, वहीं ग्रामीण महिलाओं में यह हिस्सेदारी महज 69 फीसदी थी।
अध्ययन में यह भी सामने आया है कि पुरुषों और महिलाओं के अच्छे जीवन के साल कम होने के पीछे कारण एक जैसे नहीं हैं।
पुरुषों में शारीरिक और कार्यात्मक क्षमता में कमी सबसे महत्वपूर्ण कारणों में सामने आई। राज्यों के बीच पुरुषों के बेहतर जीवन वर्षों में होने वाले अंतर का करीब 45 फीसदी हिस्सा कार्यात्मक स्वास्थ्य में अंतर से जुड़ा है। वहीं संज्ञानात्मक स्वास्थ्य करीब 31 फीसदी अंतर की पुष्टि करता है।
महिलाओं के मामले में तस्वीर उलट है। उनके जीवन के बेहतर वर्षों में राज्यों के बीच अंतर का करीब 46 फीसदी हिस्सा संज्ञानात्मक या मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा है, जबकि करीब 31 फीसदी हिस्सा कार्यात्मक स्वास्थ्य से संबंधित है।
राज्यों के बीच भी एक बड़ा अंतर सामने आया। 60 वर्ष की उम्र में पंजाब में पुरुषों का अच्छे जीवन के 12.9 वर्ष थे, जो उनकी शेष जीवन प्रत्याशा का करीब 63 फीसदी है। वहीं मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के बुजुर्ग पुरुषों में अच्छे जीवन वर्षों का यह आंकड़ा 6.5 से 6.8 के बीच दर्ज किया गया।
वहीं दूसरी तरफ महिलाओं के लिए दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर दिखाई दी। केरल में ग्रामीण महिलाओं के लिए 60 की उम्र के बाद जीवन के 10.1 साल बेहतर रहे, रहा, जो उनकी शेष जीवन प्रत्याशा का करीब 46 फीसदी हिस्सा हैं।
इसके विपरीत पश्चिम बंगाल में महिलाओं के 60 के पड़ाव के बाद जीवन के औसतन 3.8 साल अच्छे रहे। महाराष्ट्र में ग्रामीण महिलाओं के लिए यह आंकड़ा महज 2.7 वर्ष था, जो उनकी शेष जीवन प्रत्याशा के 14 फीसदी से भी कम है।
देखा जाए तो भारत के लिए शायद अब सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि लोग कितने लंबे समय तक जी रहे हैं। असल सवाल यह भी है कि उनकी जिंदगी के कितने साल ऐसे हैं, जिन्हें वे स्वास्थ्य, सम्मान, स्वतंत्रता और संतोष के साथ जी पा रहे हैं।
जब हम किसी से पूछते हैं कि वह कितनी लंबा जीवन चाहते हैं, तो अक्सर जवाब सौ साल तक जीने की दुआओं में मिलता है। लेकिन क्या सिर्फ सांसों का चलते रहना ही काफी है? क्या उन सांसों में सुकून, बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और गरिमा का अहसास भी शामिल है?
यह सही है कि उम्र बढ़ना जिंदगी का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन क्या ज्यादा साल जीना अपने आप में बेहतर जिंदगी की गारंटी है? भारत में तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी के बीच एक नए अध्ययन ने इस सवाल को गंभीरता से उठाया है।
अध्ययन के मुताबिक, भले ही भारत में लोग पहले की तुलना में लंबी जिंदगी बसर कर रहे हैं, लेकिन उनके जीवन के इन वर्षों का बड़ा हिस्सा अच्छी सेहत, आर्थिक सुरक्षा, स्वतंत्रता और बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के बिना गुजर रहा है।
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज, मुंबई, यूनिवर्सिटी ऑफ विएना और प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से जुड़े शोधकर्ताओं ने अपने इस अध्ययन में ‘ईयर्स ऑफ गुड लाइफ’ नामक सूचकांक का इस्तेमाल कर यह समझने की कोशिश की है कि बुजुर्गों के जीवन में वास्तव में कितने साल ऐसे हो सकते हैं, जिन्हें ‘अच्छे जीवन’ के साल कहा जा सके।
इसके लिए सिर्फ यह नहीं देखा गया कि कोई व्यक्ति कितने साल तक जीवित रहता है, बल्कि यह भी देखा गया कि वह इन वर्षों में किस स्थिति में अपना जीवन गुजार रहा है।
60 के बाद महिलाओं की जिंदगी लंबी, लेकिन अच्छे साल बेहद कम
इस अध्ययन के जो निष्कर्ष सामने आए हैं वे बेहद चौंकाने वाले हैं। नतीजे दर्शाते हैं कि 60 साल की उम्र में भारतीय पुरुषों की औसत शेष जीवन प्रत्याशा करीब 17.5 वर्ष है। हालांकि इनमें से औसतन महज 8.2 वर्ष ही ऐसे होते हैं, जिन्हें ‘जीवन के अच्छे साल’ कहा जा सके।
वहीं महिलाओं की स्थिति इससे अलग है। 60 वर्ष की उम्र में उनकी शेष जीवन प्रत्याशा करीब 19 वर्ष है, यानी पुरुषों की तुलना में उनके अधिक समय तक जीवित रहने की उम्मीद रहती है। लेकिन इनमें से महज 5.7 साल ही अच्छे जीवन के वर्ष होते हैं।
यानी महिलाएं ज्यादा लंबी जिंदगी जी सकती हैं, लेकिन उस अतिरिक्त जीवन का बड़ा हिस्सा अच्छी सेहत और बेहतर जीवन-स्थितियों से वंचित हो सकता है। अध्ययन इसे उम्र बढ़ने से जुड़ा एक महत्वपूर्ण ‘जेंडर पैराडॉक्स’ बताता है, जहां महिलाएं पुरुषों से ज्यादा तो जीती हैं, लेकिन उनके जीवन के अच्छे वर्षों का हिस्सा अपेक्षाकृत कम रहता है।
गांव की बुजुर्ग महिला और शहर के पुरुष के बीच पांच साल से ज्यादा का अंतर
जब उम्र के साथ लिंग और रहने की जगह को भी जोड़ा गया, तो तस्वीर और ज्यादा चिंताजनक नजर आती है। 60 साल की उम्र में एक शहरी पुरुष को औसतन करीब 10.2 साल अच्छे जीवन के मिलने का अनुमान है, जबकि ग्रामीण महिला के लिए यह अवधि महज 4.6 साल है। यानी, दोनों के बीच ‘जीवन के अच्छे वर्षों' का अंतर पांच साल से भी अधिक है।
हैरानी की बात यह है कि दोनों की बाकी बची जिंदगी में बहुत बड़ा अंतर नहीं है। 60 साल की उम्र में शहरी पुरुषों की औसत शेष जीवन प्रत्याशा करीब 19.1 वर्ष है, जबकि ग्रामीण महिलाओं में यह आंकड़ा 18.5 साल दर्ज किया गया। मतलब कि फर्क इस बात में है कि इन बचे हुए वर्षों में वे कितने साल स्वस्थ, सक्रिय और बेहतर जीवन जी पाते हैं।
अध्ययन के अनुसार, 60 वर्ष की उम्र में ग्रामीण महिलाएं अपनी शेष जीवन प्रत्याशा का सिर्फ करीब एक-चौथाई हिस्सा ही ‘अच्छे जीवन’ के रूप में जी पाने की उम्मीद रखती हैं। इसके विपरीत शहरी पुरुषों के लिए यह हिस्सा करीब आधा है। मतलब कि भारत में ग्रामीण बुजुर्ग महिलाओं के लिए लंबी उम्र का मतलब हमेशा बेहतर या स्वस्थ जीवन नहीं होता।
आखिर किसे माना गया ‘अच्छा जीवन’?
ईयर्स ऑफ गुड लाइफ यानी 'अच्छे जीवन के वर्ष' की खासियत यही है कि इसमें केवल आय या जीवन प्रत्याशा को पर्याप्त नहीं माना गया। किसी व्यक्ति के जीवन के एक साल को ‘अच्छा वर्ष’ तभी माना गया है, जब वह एक साथ चार कसौटियों पर खरा उतरता हो।
पहली, व्यक्ति गरीबी के दलदल से बाहर हो। दूसरी, उसे रोजमर्रा के जरूरी काम करने में कोई अधिक शारीरिक परेशानी न हो। तीसरी, वह याददाश्त और सोचने-समझने की समस्या से मुक्त हो। चौथी, वह अपने जीवन से संतुष्ट हो।
इसका मतलब है कि अगर कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से सुरक्षित है, लेकिन उसे नहाने, कपड़े पहनने, चलने या बिस्तर से उठने जैसे रोजमर्रा के कामों में काफी परेशानी होती है, तो उस वर्ष को ‘अच्छा जीवन’ नहीं माना जाएगा। इसी तरह शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति अगर गरीबी या गंभीर मानसिक समस्याओं से जूझ रहा है, तो उसका वह वर्ष भी इस सूचकांक में ‘अच्छे जीवन’ में शामिल नहीं होगा।
66 हजार से ज्यादा लोगों के आंकड़ों पर आधारित अध्ययन
इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने भारत में बुजुर्गों की स्थिति का आकलन करने के लिए लॉन्गिट्यूडिनल एजिंग स्टडी इन इंडिया (एलएएसआइ) 2017-18 के आंकड़ों की मदद ली है। इसमें 45 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों से जुड़ी जानकारी शामिल है। विश्लेषण में 66,606 लोगों के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया।
इसके साथ सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) 2015-19 से प्राप्त उम्र-विशिष्ट मृत्यु संबंधी आंकड़ों को जोड़ा गया। अध्ययन में 21 प्रमुख राज्यों को शामिल किया गया है, क्योंकि सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए आवश्यक स्तर पर मृत्यु संबंधी आंकड़े उपलब्ध नहीं थे।
पुरुषों के लिए शरीर, महिलाओं के लिए दिमाग बड़ी चुनौती
अध्ययन में यह भी सामने आया है कि पुरुषों और महिलाओं के अच्छे जीवन के साल कम होने के पीछे कारण एक जैसे नहीं हैं।
पुरुषों में शारीरिक और कार्यात्मक क्षमता में कमी सबसे महत्वपूर्ण कारणों में सामने आई। राज्यों के बीच पुरुषों के बेहतर जीवन वर्षों में होने वाले अंतर का करीब 45 फीसदी हिस्सा कार्यात्मक स्वास्थ्य में अंतर से जुड़ा है। वहीं संज्ञानात्मक स्वास्थ्य करीब 31 फीसदी अंतर की पुष्टि करता है।
महिलाओं के मामले में तस्वीर उलट है। उनके जीवन के बेहतर वर्षों में राज्यों के बीच अंतर का करीब 46 फीसदी हिस्सा संज्ञानात्मक या मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा है, जबकि करीब 31 फीसदी हिस्सा कार्यात्मक स्वास्थ्य से संबंधित है।
अध्ययन में ग्रामीण महिलाओं की स्थिति इस लिहाज से विशेष चिंता पैदा करती है। अध्ययन में पाया गया कि जहां 96 फीसदी शहरी पुरुष मानसिक या संज्ञानात्मक स्वास्थ्य की निर्धारित कसौटी पर खरे उतरते हैं, वहीं ग्रामीण महिलाओं में यह हिस्सेदारी महज 69 फीसदी थी।
शोधकर्ताओं के अनुसार, महिलाओं के लिए शिक्षा और जीवनभर सीखने के अवसरों में ऐतिहासिक असमानता भी उनके मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी हो सकती है। यही वजह है कि अध्ययन में दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में महिलाओं के बेहतर परिणामों को लंबे समय से लड़कियों की शिक्षा में किए गए निवेश से जोड़कर देखा गया है।
इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित स्प्रिंगर जर्नल सोशल इंडीकेटर्स रिसर्च में प्रकाशित हुए हैं।
पंजाब में पुरुषों के अच्छे जीवन के साल सबसे ज्यादा
अध्ययन में राज्यों के बीच भी एक बड़ा अंतर सामने आया। 60 वर्ष की उम्र में पंजाब में पुरुषों का अच्छे जीवन के 12.9 वर्ष थे, जो उनकी शेष जीवन प्रत्याशा का करीब 63 फीसदी है। वहीं मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के बुजुर्ग पुरुषों में अच्छे जीवन वर्षों का यह आंकड़ा 6.5 से 6.8 के बीच दर्ज किया गया।
वहीं दूसरी तरफ महिलाओं के लिए दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर दिखाई दी। केरल में ग्रामीण महिलाओं के लिए 60 की उम्र के बाद जीवन के 10.1 साल बेहतर रहे, रहा, जो उनकी शेष जीवन प्रत्याशा का करीब 46 फीसदी हिस्सा हैं। इसके विपरीत पश्चिम बंगाल में महिलाओं के 60 के पड़ाव के बाद जीवन के औसतन 3.8 साल अच्छे रहे। महाराष्ट्र में ग्रामीण महिलाओं के लिए यह आंकड़ा महज 2.7 वर्ष था, जो उनकी शेष जीवन प्रत्याशा के 14 फीसदी से भी कम है।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि महाराष्ट्र जैसे राज्य में जीवन प्रत्याशा और जीवन के अच्छे वर्षों के बीच बड़ा अंतर हो सकता है। यानी किसी राज्य में लोग अपेक्षाकृत लंबी जिंदगी जी रहे हों, फिर भी उन वर्षों का बड़ा हिस्सा अच्छे स्वास्थ्य और स्वतंत्रता के बिना गुजर सकता है।
केवल लम्बा जीवन नहीं, अच्छी जिंदगी भी जरूरी
देखा जाए तो अध्ययन का संदेश सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है। यह बताता है कि भारत में तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी के बीच स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा की नीतियों को केवल ‘कितने साल जिए’ के आधार पर नहीं देखा जा सकता।
हमें समझना होगा कि किसी बुजुर्ग के लिए जिंदगी का मतलब सिर्फ सांस लेते रहना नहीं। अपने पैरों पर खड़े रह पाना, बिना सहारे के रोजमर्रा के काम कर पाना, याददाश्त और सोचने की क्षमता बनाए रखना, आर्थिक असुरक्षा से बचा रहना और अपने जीवन से संतुष्ट महसूस करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
इसीलिए बुजुर्गों के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था में केवल इलाज ही नहीं, बल्कि फिजियोथेरेपी, पुनर्वास, सहायक उपकरण, घरेलू स्तर पर मदद और स्वतंत्र जीवन जीने में सहायता जैसी सुविधाओं पर भी ध्यान देने की जरूरत हो सकती है। महिलाओं के मामले में शिक्षा और सामाजिक भागीदारी जैसे जीवनभर के कारक भी भविष्य के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े हो सकते हैं।
शोधकर्ताओं का यह भी कहना है कि ‘ईयर्स ऑफ गुड लाइफ’ जैसे सूचकांक का इस्तेमाल राज्य स्तर पर बुजुर्गों के जीवन की गुणवत्ता की निगरानी और नीतियों की प्राथमिकता तय करने में किया जा सकता है। हालांकि अध्ययन की अपनी सीमाएं भी हैं।
इसमें लॉन्गिट्यूडिनल एजिंग स्टडी इन इंडिया के एक ही दौर के आंकड़े इस्तेमाल हुए हैं, इसलिए समय के साथ राज्यों के बीच अंतर बढ़ रहा है या घट रहा है, यह नहीं बताया जा सकता। इसके अलावा शिक्षा, जाति और धर्म के आधार पर मृत्यु संबंधी विस्तृत आंकड़ों की कमी भी विश्लेषण को सीमित करती है।
लेकिन फिर भी भारत के लिए शायद अब सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि लोग कितने लंबे समय तक जी रहे हैं। असल सवाल यह भी है कि उनकी जिंदगी के कितने साल ऐसे हैं, जिन्हें वे स्वास्थ्य, सम्मान, स्वतंत्रता और संतोष के साथ जी पा रहे हैं।