शुरुआती 1,000 दिनों में कम चीनी का सेवन भविष्य में कुछ गंभीर बीमारियों के कम खतरे से जुड़ा पाया गया है।
ब्रिटेन में चीनी राशनिंग के दौरान जन्मे लोगों में बाद के जीवन में कुछ कैंसर का खतरा कम दिखाई दिया।
कम चीनी खाने वाले बच्चों में बड़े होने पर भी कम मीठा खाने और बेहतर खान-पान की आदतें देखी गईं।
शोध में कम चीनी वाले शुरुआती जीवन और धीमी जैविक उम्र बढ़ने के बीच भी संबंध सामने आया है।
एक अन्य अध्ययन में शुरुआती कम ग्लूकोज स्तर और भविष्य में डिमेंशिया के कम खतरे के बीच संबंध मिला।
छोटे बच्चों के खान-पान को लेकर माता-पिता अक्सर चिंतित रहते हैं। खासकर यह सवाल बहुत आम है कि बच्चों को चीनी कितनी मात्रा में देनी चाहिए। अब सामने आए कुछ नए शोधों ने शुरुआती उम्र में चीनी के सेवन को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी दी है। शोध पत्र में शोधकर्ताओं का कहना है कि जीवन के शुरुआती वर्षों में कम चीनी का सेवन आगे चलकर कई गंभीर बीमारियों के जोखिम से जुड़ा हो सकता है।
हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार, इन अध्ययनों का मतलब यह नहीं है कि केवल चीनी कम करने से कैंसर या डिमेंशिया को निश्चित रूप से रोका जा सकता है। शोध मुख्य रूप से शुरुआती जीवन में कम चीनी और बाद की बेहतर सेहत के बीच संबंध दिखाते हैं।
जीवन के पहले 1,000 दिन बेहद महत्वपूर्ण
प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (पीएनएएस) में प्रकाशित एक अध्ययन में जीवन के शुरुआती करीब 1,000 दिनों यानी गर्भावस्था से लेकर बच्चे के लगभग दो साल की उम्र तक के समय पर ध्यान दिया गया। शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि इस दौरान खान-पान का असर बहुत आगे तक रह सकता है या नहीं।
इस अध्ययन के लिए ब्रिटेन के एक पुराने दौर को आधार बनाया गया। वहां सितंबर 1953 में चीनी की राशनिंग खत्म कर दी गई थी। राशनिंग के दौरान लोगों को सीमित मात्रा में चीनी मिलती थी। प्रतिबंध हटने के बाद चीनी की खपत तेजी से बढ़ गई।
शोधकर्ताओं ने ऐसे हजारों लोगों के स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों का अध्ययन किया, जिनका जन्म राशनिंग खत्म होने के आसपास हुआ था। इससे उन्हें शुरुआती जीवन में कम और अधिक चीनी के संपर्क में आए लोगों के स्वास्थ्य की तुलना करने का अवसर मिला।
कैंसर के खतरे में कमी का संकेत
अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों ने जीवन के शुरुआती दौर में कम चीनी वाले वातावरण का अनुभव किया था, उनमें बाद के जीवन में कुछ प्रकार के कैंसर का जोखिम कम देखा गया। शोध में लिवर, रेक्टल, प्रोस्टेट, स्तन और फेफड़ों के कैंसर जैसे रोगों का उल्लेख किया गया।
कुछ मामलों में जोखिम में कमी काफी बड़ी दिखाई दी। लेकिन शोधकर्ताओं ने भी इस तरह के आंकड़ों को संबंध के रूप में देखा है, न कि इस बात के प्रमाण के रूप में कि कम चीनी सीधे तौर पर कैंसर को रोकती है।
कम मीठा खाने की आदत जीवनभर रह सकती है
शोध में एक अहम बात यह भी सामने आई कि शुरुआती उम्र में कम चीनी का संपर्क बाद की खान-पान की आदतों से जुड़ा हो सकता है। जिन लोगों ने बचपन में कम चीनी का सेवन किया था, वे बड़े होने पर भी कम मीठा खाने की प्रवृत्ति रखते थे। इसका मतलब यह हो सकता है कि जीवन के शुरुआती वर्षों में बनने वाली खाने की आदतें लंबे समय तक बनी रह सकती हैं। अगर बच्चा शुरू से ही बहुत मीठे स्वाद का आदी नहीं होता, तो आगे चलकर भी वह कम मीठे भोजन को आसानी से अपना सकता है।
जैविक उम्र बढ़ने पर भी असर
शोधकर्ताओं ने शरीर में उम्र बढ़ने से जुड़े कुछ जैविक संकेतों पर भी गौर किया। कम चीनी के संपर्क वाले लोगों में जैविक उम्र अपेक्षाकृत कम होने के संकेत मिले। कुछ विश्लेषणों में यह अंतर दो साल से अधिक बताया गया। इसके अलावा उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली और शरीर की कार्यप्रणाली से जुड़े कुछ संकेत भी बेहतर पाए गए। हालांकि जैविक उम्र और वास्तविक उम्र अलग-अलग चीजें हैं। इसलिए इन परिणामों को समझने के लिए आगे और शोध की जरूरत है।
डिमेंशिया से भी जुड़ा एक और अध्ययन
इसी तरह एक अन्य अध्ययन में गर्भावस्था के दौरान और बच्चे के जीवन के पहले एक से दो वर्षों में कम ग्लूकोज के संपर्क और बाद में डिमेंशिया के जोखिम के बीच संबंध देखा गया। इस शोध में भी यह नहीं कहा गया कि कम चीनी खाने से डिमेंशिया को पूरी तरह रोका जा सकता है। शोध का मुख्य संकेत यह है कि जीवन की शुरुआत में पोषण का प्रभाव शरीर और मस्तिष्क की सेहत पर लंबे समय तक रह सकता है।
माता-पिता क्या समझें?
इन शोधों से एक सीधी बात जरूर सामने आती है कि छोटे बच्चों के भोजन में अतिरिक्त चीनी को सीमित रखना बेहतर हो सकता है। बच्चों को मीठे पेय, मिठाई और बहुत अधिक चीनी वाले पैकेज्ड खाद्य पदार्थ देने से बचना चाहिए।
हालांकि बच्चे के लिए संतुलित और पौष्टिक आहार भी उतना ही जरूरी है। फल, सब्जियां, अनाज, दालें और उम्र के अनुसार अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ उसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कुल मिलाकर, नए शोध यह संकेत देते हैं कि जीवन के शुरुआती वर्षों में खान-पान की आदतों का असर केवल बचपन तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव लंबे समय तक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। फिर भी कैंसर या डिमेंशिया से बचाव के लिए केवल चीनी को जिम्मेदार मानना सही नहीं होगा। इसके लिए पूरी जीवनशैली, आनुवंशिक कारणों और अन्य स्वास्थ्य कारकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।