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स्वास्थ्य

चिप्स से कोल्ड ड्रिंक तक: क्या स्वाद के नाम पर बेची जा रही आदत?

सवाल यह है कि क्या जंक फूड महज खराब खानपान है, या कंपनियों की सोची-समझी डिजाइन की गई आदत?

Lalit Maurya

  • क्या जंक फूड महज खराब खानपान है, या मुनाफे के लिए गढ़ी गई आदत? शोध बताता है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड को इस तरह इंजीनियर किया जाता है कि “बस एक और कौर” धीरे-धीरे लत में बदल जाए।

  • बढ़ती खपत और बीमारियों के आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि यह सिर्फ डाइट का नहीं, सार्वजनिक स्वास्थ्य का संकट है—और अब सख्त नियमों की जरूरत पहले से ज्यादा है।

वह चिप्स का पैकेट, जिसे आप सिर्फ “थोड़ा सा” खाने की सोचते हैं…वह एनर्जी ड्रिंक, जो जाने कब एक से शुरू होकर तीन पर पहुंच जाती है…या देर रात पिज्जा-बर्गर का वह ऑर्डर, जिसे टालना लगभग नामुमकिन लगता है…!

क्या आपने कभी सोचा है कि “बस थोड़ा सा” कब पूरे पैकेट में बदल जाता है? क्या यह सचमुच आपकी इच्छाशक्ति की कमी है, या फिर कोई आपके स्वाद और दिमाग को उसी हिसाब से गढ़ रहा है?

इस बारे में की गई एक नई स्टडी का दावा है कि कई अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य उत्पादों को सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पादों की तर्ज पर इस तरह डिजाइन किया जाता है कि वे आपको बार-बार अपनी ओर खींचें, और धीरे-धीरे ‘एक और कौर’ आदत में बदल जाए।

मिशिगन, हार्वर्ड और ड्यूक विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं का इस बारे में कहना है कि कई अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड- जैसे पैकेट बंद स्नैक्स, मीठे पेय, सॉफ्ट ड्रिंक, चिप्स, कुकीज, रेडी-टू-ईट भोजन और फास्ट फूड, महज खराब खानपान नहीं हैं। इन्हें इस तरह “इंजीनियर” किया जाता है कि लोग इन्हें बार-बार और ज्यादा मात्रा में खरीदे और खाएं।

इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल द मिलबैंक क्वार्टरली में प्रकाशित हुए हैं। इसमें लत (एडिक्शन) से जुड़े विज्ञान, पोषण संबंधी अध्ययन और तंबाकू नियंत्रण के इतिहास का सहारा लिया गया है। अध्ययन में पाया गया कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड बनाने वाली कंपनियां तंबाकू उद्योग से मिलती-जुलती रणनीतियां अपनाती हैं।

सिगरेट की तरह ‘डिजाइन’ किए जा रहे जंक फूड

शोधकर्ताओं ने पाया है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड और तंबाकू उत्पादों के बीच कई चौंकाने वाली समानताएं हैं। दोनों को सोच-समझकर इस तरह तैयार किया जाता है कि वे दिमाग के ‘रिवार्ड सिस्टम’ को तेजी से सक्रिय करें, बार-बार खाने की आदत डालें और मुनाफे को बचाने के लिए जनधारणा को अपने पक्ष में ढालें।

इन उत्पादों में नमक, चीनी और वसा की मात्रा को इस तरह संतुलित किया जाता है कि वे “लत लगाने वाले” प्रभाव पैदा करें और उपभोक्ता ज्यादा से ज्यादा खपत करें। मतलब कि ये सिर्फ पोषक तत्वों का मिश्रण नहीं हैं, बल्कि जानबूझकर तैयार किए गए, अत्यधिक प्रोसेस्ड और स्वाद को अधिकतम करने के लिए बदले गए उत्पाद हैं।

अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता एशले गियरहार्ट, जो यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन में क्लिनिकल साइकोलॉजी की प्रोफेसर हैं, कहती हैं कि “यह महज संयोग नहीं कि कुछ स्नैक्स को खाना बंद करना असामान्य रूप से मुश्किल लगता है।“

उनके मुताबिक, इन उत्पादों को इस तरह तैयार किया जाता है कि हाथ अनायास ही बार-बार उसी पैकेट की ओर बढ़े। उनका कहना है कि दशकों से सार्वजनिक स्वास्थ्य संदेश लोगों से कहते रहे हैं - बेहतर चुनाव करें, आत्म-नियंत्रण बढ़ाएं, कोशिश करें। लेकिन अब समय आ गया है कि फोकस बदला जाए।

जिम्मेदारी सिर्फ व्यक्ति की नहीं, व्यवस्था की भी

शोधकर्ताओं का तर्क है कि हमें यह भी देखना होगा कि बाजार में क्या परोसा जा रहा है, क्या सस्ता है और किस चीज का सबसे ज्यादा विज्ञापन हो रहा है। जिस तरह तंबाकू नियंत्रण की नीतियां धीरे-धीरे धूम्रपान करने वालों को दोष देने से हटकर कंपनियों की जवाबदेही तय करने की ओर बढ़ी हैं, उसी तरह खाद्य नीति में भी बड़े बदलाव की जरूरत है।

गियरहार्ट स्पष्ट करती हैं कि खाना और धूम्रपान एक जैसे नहीं हैं। लेकिन कुछ आम खाद्य उत्पाद इस तरह डिजाइन किए गए हो सकते हैं कि ‘संयम’ रखना असामान्य रूप से कठिन हो जाए। आज की पीढ़ी, जो चमकीले पैकेट वाले स्नैक्स, ड्राइव-थ्रू सुविधा और 24×7 डिलीवरी ऐप्स के बीच बड़ी हुई है, उसके लिए यह सवाल सिर्फ डाइट ट्रेंड का नहीं है।

यह सवाल है—उत्पाद कैसे बनाए जा रहे हैं? और जब “बस एक और कौर” आदत बन जाता है, तो इसका फायदा किसे होता है?

जनवरी 2025 में जर्नल ऑफ ओबेसिटी एंड मेटाबॉलिक सिंड्रोम में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में सामने आया है कि अमेरिका में अल्ट्रा प्रोसेस्ड फ़ूड कुल ऊर्जा सेवन का 57.5 फीसदी, ब्रिटेन में 56.8 फीसदी, कनाडा में 46.8 फीसदी और ऑस्ट्रेलिया में 42 फीसदी योगदान देते हैं। भारत और अन्य विकासशील देशों में भी इसी तरह की वृद्धि देखी जा रही है। मतलब कि कहीं न कहीं यह खाद्य उत्पाद हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में घर करते जा रहे हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक करीब 14 फीसदी वयस्क और 12 फीसदी बच्चे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स की लत का शिकार बन चुके हैं। लोगों में स्वास्थ्य के नजरिए से हानिकारक इन खाद्य पदार्थों को लेकर जो लगाव है, वो शराब और तम्बाकू जितना ही बढ़ चुका है।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) द्वारा भारत में किए गए अध्ययन में भी इस बात का खुलासा हुआ है कि जंक फूड और पैकेटबंद भोजन हमें जाने-अनजाने बीमारियों के भंवरजाल में धकेल रहा है। अध्ययन के नतीजे दर्शाते हैं कि जंक फूड में मौजूद नमक, वसा, ट्रांस फैट की बेहद ज्यादा मात्रा होती है जो मोटापा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह और हृदय की बीमारियों को बढ़ा रहा है।

सीएसई की लैब रिपोर्ट के मुताबिक लोगों के पसंदीदा जंक फूड में जरूरत से ज्यादा नमक पाया गया है। ऐसे में स्नैक्स या मील के तौर पर खाए जाने वाले पैकेटबंद फास्ट फूड का सेवन लोगों को बहुत ज्यादा बीमार बना सकता है। वहीं बड़ों की तुलना में बच्चों में यह खतरा और भी ज्यादा है।

स्वस्थ समाज के लिए जरुरी हैं कड़े नियम

ऐसे में शोधकर्ताओं का कहना है कि जिस तरह सिगरेट पर चेतावनी, ऊंचा टैक्स, विज्ञापन पर रोक और स्कूलों-अस्पतालों में प्रतिबंध जैसे नियम लागू हैं, वैसे ही कदम इन अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य उत्पादों पर भी उठाए जाने चाहिए। इसके तहत पैकेट पर साफ और सख्त चेतावनी लेबल होने चाहिए। साथ ही इन उत्पादों पर अधिक टैक्स जरूरी है।

स्कूलों और अस्पतालों में इनकी बिक्री पर रोक होनी चाहिए। इसके साथ ही बच्चों को लक्षित करने वाले विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाए जाने चाहिए।

शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि तंबाकू से अलग, भोजन जीवन का आधार है। इसलिए आधुनिक खाद्य बाजार से पूरी तरह ‘बच निकलना’ आसान नहीं। यही वजह है कि सख्त नियमन और भी जरूरी हो जाता है।

स्पष्ट है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड अब महज खानपान का मुद्दा नहीं रहे, बल्कि यह स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या सरकारें सिगरेट और अन्य तम्बाकू उत्पादों की तरह इन पर भी सख्ती दिखाएंगी, या फिर आने वाली पीढ़ियां इसकी कीमत चुकाती रहेंगी?