कोरोना संक्रमण के खत्म होने के बाद भी शरीर के भीतर उसकी कहानी खत्म नहीं होती। नेचर में प्रकाशित एक नए अध्ययन से पता चला है कि गंभीर कोविड-19 के दौरान शरीर में वर्षों से निष्क्रिय पड़े कई वायरस दोबारा सक्रिय हो सकते हैं।
अमेरिका के 20 बायोमेडिकल शोध केंद्रों में भर्ती 1,154 गंभीर कोविड मरीजों के 2 लाख से अधिक नमूनों और 100 करोड़ से ज्यादा डेटा पॉइंट के विश्लेषण में पाया गया कि करीब आधे मरीजों में पहले से मौजूद वायरस फिर सक्रिय हुए।
इनमें एपस्टीन-बार वायरस (ईबीवी), साइटोमेगालोवायरस (सीएमवी), हर्पीज सिम्प्लेक्स वायरस-1 और एनेलोविरिडे परिवार के वायरस शामिल थे।
सबसे अहम संकेत एनेलोविरिडे वायरसों को लेकर मिला। इनकी सक्रियता लंबे समय तक बनी रहने वाली थकान, कमजोरी और लॉन्ग कोविड जैसे लक्षणों से जुड़ी पाई गई। शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह सक्रियता शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया में बदलाव से भी संबंधित हो सकती है।
वहीं ईबीवी और सीएमवी का दोबारा सक्रिय होना कमजोर इम्युनिटी के बजाय कोविड के दौरान बढ़ी सूजन से अधिक जुड़ा दिखाई दिया।
हालांकि अध्ययन यह साबित नहीं करता कि ये वायरस सीधे लॉन्ग कोविड पैदा करते हैं। फिर भी यह खोज बताती है कि कोविड के बाद बने रहने वाले लक्षणों की वजह केवल सार्स-कॉव-2 नहीं, बल्कि शरीर में छिपे पुराने वायरसों की बदलती गतिविधि भी हो सकती है।
कोरोना के सबसे बुरे दौर से गुजरने के बाद दुनिया भले ही आगे बढ़ चुकी हो, लेकिन लाखों इंसानी शरीरों में एक खामोश जंग आज भी जारी है।
कोविड-19 को अक्सर हम एक ऐसे संक्रमण के रूप में देखते हैं, जो शरीर में प्रवेश करता है और बीमारी पैदा कर कुछ समय बाद चला जाता है। लेकिन इसके पीछे की कहानी शायद इतनी सरल नहीं है। प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका नेचर में प्रकाशित एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि कोरोना वायरस (सार्स-कॉव-2) केवल फेफड़ों पर हमला करके शांत नहीं बैठता, बल्कि वह शरीर के भीतर सालों से निष्क्रिय पड़े अन्य घातक वायरसों को भी जगा देता है।
ये वायरस लंबे समय से निष्क्रिय अवस्था में शरीर की कोशिकाओं में छिपे रहते हैं और आमतौर पर कोई परेशानी पैदा नहीं करते।
इस खोज के साथ ही कोरोना संक्रमण से उबरने के महीनों बाद भी जो लोग असहनीय थकान, लाचारी और मानसिक सुस्ती से जूझ रहे थे, उनके अनसुने दर्द को अब एक वैज्ञानिक आधार मिल गया है।
कोरोना ने जगाए शरीर में सोए पुराने वायरस
इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने अमेरिका के 20 बायोमेडिकल शोध केंद्रों में कोविड-19 के गंभीर संक्रमण के चलते भर्ती 1,154 मरीजों के नमूनों और स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों का करीब एक साल तक अध्ययन किया। इस दौरान शोधकर्ताओं ने रक्त और नाक से लिए नमूनों सहित 2 लाख से अधिक नमूनों का विश्लेषण किया और 100 करोड़ से अधिक डेटा पॉइंट का विश्लेषण किया है।
इसके नतीजा चौंकाने वाला थे, शोधकर्ताओं के मुताबिक, करीब आधे मरीजों में ऐसा वायरस फिर सक्रिय हुआ, जो संक्रमण से पहले ही उनके शरीर में मौजूद था। इनमें एपस्टीन-बार वायरस (ईबीवी) जिसे ह्यूमन हर्पीसवायरस भी कहा जाता है, के साथ-साथ साइटोमेगालोवायरस (सीएमवी), हर्पीज सिम्प्लेक्स वायरस-1 और एनेलोविरिडे परिवार के वायरस प्रमुख थे।
करीब आधे मरीजों में फिर सक्रिय हुए वायरस
वैज्ञानिकों के मुताबिक हमारा शरीर ज्यादातर वायरसों को खत्म कर देता है, लेकिन कुछ वायरस पूरी तरह बाहर नहीं जाते। उदाहरण के लिए ईबीवी जैसे हर्पीज वायरस शरीर की कुछ कोशिकाओं में लंबे समय तक निष्क्रिय अवस्था में छिपे रह सकते हैं। बीमारी, तनाव या शरीर में होने वाले बड़े बदलाव के दौरान ये दोबारा सक्रिय हो सकते हैं।
कोविड-19 के दौरान भी ऐसा ही कुछ होता दिखाई दिया। अध्ययन में पाया गया कि ईबीवी अक्सर मरीज के अस्पताल में भर्ती होने के समय सक्रिय होते दिखे, जबकि साइटोमेगालोवायरस की सक्रियता कुछ सप्ताह बाद बढ़ी। वहीं एनेलोविरिडे परिवार के वायरस भी संक्रमण के शुरुआती हफ्तों में बड़ी संख्या में दिखाई दिए।
इन वायरसों की सक्रियता को कोविड-19 के शुरुआती दौर में बीमारी के अधिक गंभीर होने से जोड़ा गया। हालांकि शोधकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि वायरसों का दोबारा सक्रिय होना ही बीमारी के गंभीर होने का एकमात्र कारण है।
लॉन्ग कोविड की पहेली में मिला नया सुराग
अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष एनेलोविरिडे वायरसों से जुड़ा है। ये वायरस बेहद आम हैं और माना जाता है कि करीब 90 फीसदी लोगों में इनके संक्रमण के निशान हो सकते हैं। लंबे समय तक निष्क्रिय रहने वाले इन वायरसों को अब तक काफी हद तक हानिरहित माना जाता रहा है।
लेकिन अध्ययन में इन वायरसों के दोबारा सक्रिय होने और लंबे समय तक बनी रहने वाली शारीरिक कमजोरी, थकान तथा लॉन्ग कोविड के बीच संबंध पाया गया है।
यह खोज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लॉन्ग कोविड आज भी एक ऐसी पहेली बना हुआ है, जिसका कोई एक स्पष्ट कारण वैज्ञानिकों के सामने नहीं है। कुछ मरीज संक्रमण से उबरने के महीनों बाद भी थकान, दिमागी धुंध यानी ब्रेन फॉग और शारीरिक कमजोरी जैसी परेशानियों से जूझते रहते हैं।
हालांकि शोधकर्ता अभी यह नहीं कह सकते कि एनेलोविरिडे वायरस लॉन्ग कोविड पैदा करते हैं। लेकिन रक्त के विश्लेषण में इन वायरसों की सक्रियता के साथ कुछ सफेद रक्त कोशिकाओं की गतिविधि बढ़ी मिली। इससे संकेत मिलता है कि ये वायरस महज मूक दर्शक नहीं हो सकते, बल्कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली में गड़बड़ी को बढ़ाने में भूमिका निभा सकते हैं।
सिर्फ कमजोर इम्युनिटी नहीं, शरीर की सूजन भी जिम्मेदार
अध्ययन ने एक पुरानी धारणा को भी चुनौती दी है। अब तक माना जाता रहा है कि शरीर में छिपे वायरस मुख्य रूप से तब दोबारा सक्रिय होते हैं, जब प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाती है। लेकिन शोधकर्ताओं ने पाया कि ईबीवी और सीएमवी की सक्रियता प्रतिरक्षा प्रणाली के कमजोर पड़ने के बजाय शरीर में बढ़ी सूजन से अधिक जुड़ी दिखाई दी।
यानी गंभीर कोविड-19 के दौरान पैदा होने वाली व्यापक सूजन भी इन पुराने वायरसों को सक्रिय करने में भूमिका निभा सकती है। इसका अर्थ यह है कि वायरस सामान्य प्रतिरक्षा क्षमता वाले लोगों में भी गंभीर बीमारी के दौरान फिर सक्रिय हो सकते हैं।
हर कोविड मरीज पर लागू नहीं होंगे नतीजे
वैज्ञानिकों ने अध्ययन की एक महत्वपूर्ण सीमा भी बताई है। इसमें मुख्य रूप से 2021 के मध्य से पहले संक्रमित, बिना टीके वाले और गंभीर कोविड-19 के कारण अस्पताल में भर्ती मरीज शामिल थे। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि वायरस के मौजूदा वेरिएंट, टीकाकरण और हल्के संक्रमण वाले लोगों में भी यह प्रक्रिया उसी तरह होती है या नहीं।
विशेषज्ञों का कहना है कि गंभीर रूप से बीमार शरीर में कई जैविक प्रक्रियाएं तेजी से बदलती हैं। ऐसे में पुराने वायरसों का फिर सक्रिय होना आश्चर्यजनक नहीं है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि इनमें से कौन-से वायरस वास्तव में बीमारी को बढ़ाते हैं और कौन केवल गंभीर बीमारी के दौरान सक्रिय होने वाले ‘साथी’ हैं।
इस सवाल का सबसे मजबूत जवाब तभी मिलेगा, जब वैज्ञानिक यह जांचें कि इन वायरसों को दोबारा सक्रिय होने से रोकने वाली दवाएं लॉन्ग कोविड के जोखिम या लक्षणों को कम कर सकती हैं या नहीं। इसी दिशा में कुछ शुरुआती शोध चल रहे हैं। वैज्ञानिक ईबीएफ जैसे वायरसों की गतिविधि को रोकने वाली एंटीवायरल दवाओं का अध्ययन कर रहे हैं। हालांकि अभी इनसे लॉन्ग कोविड का इलाज होने का दावा करना जल्दबाजी होगी।
अब सवाल है, इन जागे वायरसों को कैसे रोका जाए?
लॉन्ग कोविड को लेकर अब तक ऑटोइम्यून जैसी प्रतिक्रियाओं, सूक्ष्म रक्त के थक्कों और शरीर में सार्स-कॉव-2 के लंबे समय तक बने रहने जैसी कई संभावनाएं सामने आ चुकी हैं। नया अध्ययन इस जटिल पहेली में एक और महत्वपूर्ण टुकड़ा जोड़ता है, शायद कोविड-19 की बीमारी खत्म होने के बाद भी शरीर के भीतर कुछ पुराने वायरस चुप नहीं बैठते।
यह खोज महज लॉन्ग कोविड को समझने के लिए महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि भविष्य की महामारी की तैयारी के लिए भी एक सबक है। कोविड-19 ने दिखाया है कि एक नया वायरस केवल अपने संक्रमण से ही शरीर को प्रभावित नहीं करता, वह शरीर के भीतर वर्षों से छिपी पुरानी जैविक गतिविधियों को भी बदल सकता है।
अब चुनौती यह समझने की है कि इन ‘जागे हुए’ वायरसों को कब और कैसे नियंत्रित किया जाए, ताकि संक्रमण से उबर चुके लोगों को लंबे समय तक बीमारी का बोझ न उठाना पड़े।