इबोला से संक्रमित 266 स्वास्थ्यकर्मियों में से 50 की मौत हुई, जिससे डॉक्टरों और नर्सों की सुरक्षा पर सवाल उठे। फोटो साभार: आईस्टॉक
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इबोला से जंग: खुद मरीज बने डॉक्टर, ठीक होकर फिर लौटेंगे मरीजों की सेवा में

कांगो में इबोला का कहर: 8,728 संक्रमित, 4,205 मौतें, 2,269 मरीज ठीक; 266 स्वास्थ्यकर्मी संक्रमित, 50 की मौत, डॉक्टर ओलेला 16 दिन के इलाज के बाद स्वस्थ होकर लौटेंगे।

Dayanidhi

  • कांगो में इबोला के 8,728 मामले सामने आए, जबकि 4,205 लोगों की मौत हुई और 2,269 मरीज बीमारी से ठीक हुए।

  • इबोला से संक्रमित 266 स्वास्थ्यकर्मियों में से 50 की मौत हुई, जिससे डॉक्टरों और नर्सों की सुरक्षा पर सवाल उठे।

  • डॉक्टर एलेक्स ओलेला 16 दिनों तक इलाज कराने के बाद इबोला से ठीक हुए और दोबारा मरीजों की सेवा करेंगे।

  • उत्तरी किवू प्रांत में इबोला के 1,785 मामले दर्ज हुए, जबकि 1,021 लोगों की मौत हुई और मृत्यु दर 57.2 प्रतिशत रही।

  • बेनी में डॉक्टरों की टीम ने मरीजों की मृत्यु दर लगभग 50 प्रतिशत से घटाकर 30 प्रतिशत तक लाने में सफलता पाई।

एक रिपोर्ट में कहा गया है कि इबोला जैसी जानलेवा बीमारी से दूसरों की जान बचाने वाले डॉक्टर एलेक्स ओलेला को एक दिन खुद अपनी जिंदगी के लिए संघर्ष करना पड़ा। वर्षों तक इबोला के पांच प्रकोपों के दौरान मरीजों का इलाज करने वाले ओलेला इस बार खुद इस खतरनाक वायरस की चपेट में आ गए। लेकिन बीमारी के सामने उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। 16 दिनों तक इलाज कराने के बाद गुरुवार को उन्हें इबोला से मुक्त घोषित कर दिया गया। अब वह पहले से ज्यादा मजबूत इरादों के साथ फिर से मरीजों की सेवा में लौटना चाहते हैं।

जब डॉक्टर खुद बन गया मरीज

कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य के पूर्वी हिस्से में स्थित उत्तरी किवू प्रांत का बेनी शहर इबोला के प्रकोप से बुरी तरह प्रभावित है। इसी शहर के एक उपचार केंद्र में काम करते हुए डॉक्टर ओलेला संक्रमित हो गए। जिस केंद्र में वह कभी मरीजों की जान बचाने के लिए दिन-रात काम करते थे, उसी जगह उन्हें खुद इलाज कराना पड़ा।

इबोला से ठीक होने के बाद ओलेला ने कहा कि इस अनुभव ने उनके इरादों को और मजबूत किया है। वह अपने साथियों के साथ मिलकर इस बीमारी के खिलाफ लड़ाई जारी रखना चाहते हैं। उनका मानना है कि बीमारी से लड़ने के लिए हिम्मत, सतर्कता और एक-दूसरे का साथ बेहद जरूरी है।

जान जोखिम में डालकर सेवा कर रहे स्वास्थ्यकर्मी

इबोला के खिलाफ लड़ाई में डॉक्टरों और नर्सों की भूमिका सबसे अहम है। लेकिन मरीजों के बीच लगातार रहने के कारण उनकी अपनी जान पर भी खतरा बना रहता है। सुरक्षा उपकरणों और तय नियमों का पालन करने के बावजूद संक्रमण का जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं होता।

बेनी में मरीजों के इलाज की जिम्मेदारी संभाल रहे डॉक्टर जेरेमी कात्सावारा ने कहा कि इबोला के मरीजों के संपर्क में रहने वाले स्वास्थ्यकर्मियों को हमेशा संक्रमण का खतरा रहता है। उनके मुताबिक, जरूरी व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण पहनने के बाद भी जोखिम को शून्य नहीं किया जा सकता।

अफ्रीका रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र के अनुसार, 29 सितंबर तक कांगो में इस प्रकोप के दौरान 266 स्वास्थ्यकर्मी इबोला से संक्रमित हो चुके थे। इनमें से 50 लोगों की मौत हो गई थी। ये आंकड़े बताते हैं कि दूसरों की जान बचाने की कोशिश में स्वास्थ्यकर्मियों को कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

शुरुआती लक्षणों को पहचानना जरूरी

डॉक्टर ओलेला के अनुभव ने बीमारी की शुरुआती पहचान के महत्व को भी सामने रखा है। उन्होंने स्वास्थ्यकर्मियों से अपील की कि संक्रमण के बाद बुखार, सिरदर्द या बीमारी के अन्य लक्षण दिखाई देने पर तुरंत चिकित्सकीय जांच कराएं।

इबोला की शुरुआत में बुखार और सिरदर्द जैसे लक्षण सामने आ सकते हैं। परेशानी यह है कि ये लक्षण मलेरिया और दूसरी आम बीमारियों से भी मिलते-जुलते हैं। ऐसे में बीमारी की सही पहचान में देरी हो सकती है, जिससे संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है।

हजारों मरीज, बड़ी चुनौती

कांगो में इबोला का प्रकोप स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती बना हुआ है। देश के स्वास्थ्य अधिकारियों की 6 अक्टूबर तक की रिपोर्ट के अनुसार, सात प्रांतों के 64 स्वास्थ्य क्षेत्रों में 8,728 पुष्ट मामले सामने आए थे। इनमें 4,205 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 2,269 मरीज ठीक हो चुके थे।

उत्तरी किवू प्रांत में 1,785 पुष्ट मामले और 1,021 मौतें दर्ज की गई थीं। यहां मृत्यु दर 57.2 प्रतिशत रही, जो प्रभावित प्रांतों में सबसे अधिक थी।

कुछ इलाकों में संक्रमण की रफ्तार धीमी हुई है, लेकिन दूसरे क्षेत्रों में नए मामले सामने आ रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के महानिदेशक टेड्रोस अधनोम घेब्रेयेसस ने भी चेताया था कि बड़ी संख्या में मरीजों की मौत उपचार केंद्रों के बाहर हो रही है। उन्होंने संपर्क में आए लोगों की पहचान करने की प्रक्रिया को और मजबूत बनाने की जरूरत बताई।

बेहतर इलाज से बढ़ रही उम्मीद

बेनी में मरीजों का इलाज कर रही टीम के अनुसार, उनके यहां मरीजों की मृत्यु दर प्रकोप की शुरुआत में लगभग 50 प्रतिशत थी, जो अब घटकर करीब 30 प्रतिशत रह गई है। डॉक्टर कात्सावारा को उम्मीद है कि बेहतर इलाज और समय पर देखभाल से इसे और कम किया जा सकता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, समय पर जांच, मरीजों को तुरंत उपचार केंद्र पहुंचाना और बेहतर चिकित्सकीय देखभाल जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि इबोला के खिलाफ टीकों और उपचार के विकास की कोशिशें भी जारी हैं।

बीमारी से जीतकर फिर मैदान में उतरने का संकल्प

डॉक्टर ओलेला की कहानी केवल बीमारी से उबरने की कहानी नहीं है, बल्कि उस हौसले की मिसाल भी है, जो मुश्किल हालात में उम्मीद जगाता है। दो सप्ताह से अधिक समय तक मरीज के रूप में रहने के बाद अब वह फिर अपने पुराने काम पर लौटना चाहते हैं।

रिपोर्ट में ओलेला ने कहा, "मैं पहले से ज्यादा मजबूत और दृढ़ निश्चय के साथ वापस आऊंगा। यही संकल्प हमें मिलकर इस बीमारी को हराने में मदद करेगा।"

इबोला के खिलाफ लड़ाई अभी लंबी है। लेकिन ओलेला जैसे स्वास्थ्यकर्मियों का साहस दिखाता है कि सही इलाज, सतर्कता और मजबूत इच्छाशक्ति से इस कठिन लड़ाई में उम्मीद की किरण कायम रखी जा सकती है।