प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
जंगल

दिल्ली: आठ सालों से ठंडे बस्ते में जंगल बचाने का आदेश, एनजीटी ने पूछा—कहां है कार्रवाई?

असोला, साहूपुर और भाटी में वन भूमि को अतिक्रमण मुक्त करने के 2018 के आदेशों के पालन में देरी पर सख्ती दिखाते हुए एनजीटी ने संबंधित अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • दिल्ली के जंगलों से लेकर तमिलनाडु के स्टोन क्रशर तक, पर्यावरणीय नियमों के पालन पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने एक बार फिर सख्त रुख दिखाया है।

  • दिल्ली में असोला, साहूपुर और भाटी की वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने का 2018 का आदेश आठ साल बाद भी कागजों में ही अटका है। इस पर नाराजगी जताते हुए एनजीटी ने संबंधित अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

  • सवाल साफ है—जब अदालत के आदेश ही लागू नहीं होंगे, तो जंगल कैसे बचेंगे?

  • वहीं तमिलनाडु में स्टोन क्रशर से उड़ती धूल पर ट्रिब्यूनल ने कड़े निर्देश दोहराते हुए साफ किया कि अब सिर्फ कागजी उपाय नहीं, जमीनी कार्रवाई जरूरी है। पक्की सड़कें, आधुनिक डस्ट कंट्रोल सिस्टम, नियमित स्वास्थ्य जांच और बड़े पैमाने पर ग्रीन कवर इन सबको अनिवार्य बनाने पर जोर दिया गया है।

  • दोनों मामलों में एनजीटी का संदेश साफ है, पर्यावरणीय नियम अब सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहेंगे। जंगलों पर कब्जा हो या उद्योगों से फैलता प्रदूषण, हर स्तर पर जवाबदेही तय होगी।

दिल्ली के असोला, साहूपुर और भाटी गांवों में वन भूमि पर अवैध कब्जे का मामला एक बार फिर गरमा गया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 29 अप्रैल 2026 को इस मामले में सुनवाई करते हुए साफ कहा कि जमीन को अवैध कब्जों से मुक्त कराने का जो आदेश 9 अगस्त 2018 को दिया गया था, उसका अब तक पालन नहीं किया गया है।

एनजीटी ने संबंधित विभागों से जवाब मांगते हुए उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है। अधिकारियों को बताना होगा कि उन्होंने आदेश लागू करने के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए हैं। इस मामले में अगली सुनवाई 17 अगस्त 2026 को होगी।

दरअसल, एनजीटी ने 2018 दिल्ली सरकार और उसके विभागों खासकर पर्यावरण, वन एवं राजस्व को निर्देश दिया था कि वन भूमि से सभी अवैध और नॉन-फॉरेस्ट स्ट्रक्चर्स तुरंत हटाए जाएं। साथ ही, भविष्य में दोबारा कब्जा न हो इसे रोकने के लिए इलाके की घेराबंदी या बाउंड्री वॉल बनाने को कहा गया था।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि इस कार्रवाई में दिल्ली पुलिस, जिला प्रशासन की मदद ली जाए। एनजीटी ने इलाके की स्पेशल टास्क फोर्स को भी निर्देश दिया कि वे इस काम में दिल्ली सरकार और वन विभाग के अधिकारियों की मदद करे। साथ ही जहां-जहां से अतिक्रमण हटाए जाएं वहां वन विभाग को तुरंत स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पेड़ लगाने के निर्देश भी दिए गए थे।

अब आवेदक ने फिर से याचिका दाखिल कर अगस्त 2018 आदेशों के पालन की मांग की है। ऐसे में सवाल साफ है कि आखिर दिल्ली के जंगल कब तक कागजों में ही बचाए जाते रहेंगे?

तमिलनाडु: स्टोन क्रशर से उड़ती धूल पर सख्त हुआ एनजीटी, फिर दोहराए कड़े नियम

28 अप्रैल 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने स्टोन क्रशिंग इकाइयों से फैल रहे धूल प्रदूषण पर अपने पुराने निर्देशों को फिर सख्ती से लागू करने का आदेश दिया। ट्रिब्यूनल की दक्षिणी पीठ ने साफ कहा कि सभी क्रशर इकाइयों को इन नियमों का पालन करना होगा और इन्हें कड़ाई से लागू कराने की जिम्मेदारी तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (टीएनपीसीबी) की होगी।

एनजीटी ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से कहा कि वह इस बात पर विचार करे कि क्रशर और उनके आसपास की सड़कों को पक्का (कंक्रीट) बनाना मंजूरी (क्लीयरेंस) की शर्त का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए। साथ ही, सिर्फ पानी के छिड़काव से काम नहीं चलेगा, धूल को रोकने के लिए साइक्लोन, डस्ट हॉपर्स जैसे आधुनिक “ड्राई डस्ट कलेक्शन सिस्टम” लगाना भी अनिवार्य किया जाए।

ट्रिब्यूनल ने मजदूरों और आसपास के लोगों के स्वास्थ्य पर भी चिंता जताई। अदालत ने कहा कि बोर्ड को ऐसे नियम बनाने चाहिए जो मजदूरों और आसपास रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा करें। इसके तहत मजदूरों के लिए हर छह महीने और आसपास के लोगों के लिए साल में कम से कम एक बार स्वास्थ्य शिविर लगाना जरूरी करने को कहा गया है।

धूल प्रदूषण को रोकने में पेड़-पौधों (ग्रीन कवर) की अहम भूमिका को देखते हुए, सभी परियोजना संचालकों, चाहे वे अकेली इकाई हो या क्लस्टर उन्हें अपने परिसर, आने-जाने वाली सड़कों के किनारे और तय सुरक्षित दायरे में पर्याप्त पेड़ पौधे लगाना और उन्हें बचाए रखना होगा।

जहां ग्रीन कवर को तुरंत विकसित करना मुमकिन न हो, वहां अस्थाई तौर पर जीआई/एमएस शीट या अन्य उपयुक्त सामग्री से पर्याप्त ऊंचाई की 'विंड-ब्रेकिंग वॉल' (हवा रोकने वाली दीवार) बनाना अनिवार्य होगा।

इसके अलावा, एनजीटी ने यह भी निर्देश दिया कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सिर्फ क्रशर यूनिट्स के आसपास ही नहीं, बल्कि तय सुरक्षित दायरे में आने वाले रिहायशी इलाकों और सार्वजनिक स्थानों में भी हरियाली विकसित करना अनिवार्य करना चाहिए।

ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि इस काम का खर्च परियोजना संचालकों से वसूला जाए और वृक्षारोपण का काम वन विभाग या किसी सक्षम एजेंसी को सौंपा जा सकता है। जस्टिस पुष्पा सत्यनारायण की पीठ ने अपने आदेश में साफ संदेश दिया कि धूल प्रदूषण पर अब ढिलाई नहीं चलेगी, और जिम्मेदारी सीधे परियोजना संचालकों पर तय की जाएगी।