हिमाचल प्रदेश की एक दवा फैक्ट्री और दिल्ली के प्रस्तावित ई-वेस्ट इको पार्क से जुड़े दो मामलों ने पर्यावरणीय नियमों के पालन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने दोनों मामलों में संबंधित पक्षों से जवाब तलब करते हुए स्पष्ट संकेत दिया है कि विकास परियोजनाओं और औद्योगिक गतिविधियों को पर्यावरणीय मानकों की कसौटी पर परखा जाएगा।
पहले मामले में हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले स्थित मोरपेन लेबोरेटरीज पर शोर प्रदूषण, मानकों से अधिक प्रदूषित अपशिष्ट जल छोड़ने और सिंचाई के पानी के कथित अवैध औद्योगिक उपयोग के आरोप लगे हैं। एनजीटी ने कंपनी, राज्य सरकार और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से जवाब मांगा है।
वहीं, दिल्ली के होलंबी कलां में प्रस्तावित ई-वेस्ट इको पार्क कानूनी और पर्यावरणीय विवादों में घिर गया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि परियोजना को रिहायशी क्षेत्र और स्कूलों के नजदीक स्थापित किया जा रहा है तथा भूमि उपयोग परिवर्तन और साइट चयन से जुड़े नियमों का पालन नहीं किया गया। एनजीटी ने डीपीसीसी, डीएसआईआईडीसी और सीपीसीबी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
ये दोनों मामले इस बात की अहम परीक्षा बन गए हैं कि पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करने में नियामक संस्थाएं कितनी प्रभावी साबित होती हैं।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कसौली स्थित मोरपेन लेबोरेटरी लिमिटेड को पर्यावरण नियमों के कथित उल्लंघन के मामले में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। कंपनी से चार सप्ताह के भीतर अपना पक्ष रखने को कहा गया है। इस मामले की अगली सुनवाई 10 सितंबर, 2026 को होगी।
29 मई, 2026 को एनजीटी ने इस मामले में हिमाचल प्रदेश सरकार और हिमाचल प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी अपना जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
आरोप है कि हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले की कसौली तहसील के तिरोन गांव में मौजूद यह फार्मा यूनिट पर्यावरण नियमों को ताक पर रख दवा बनाने का काम कर रही है।
क्या कुछ लगे हैं आरोप
याचिकाकर्ता का कहना है कि वह दवा निर्माण इकाई के नजदीक रहता है और संयंत्र में चलने वाले जनरेटर सेट तथा औद्योगिक मशीनों से निर्धारित सीमा से अधिक शोर पैदा हो रहा है। इस दावे के समर्थन में याचिकाकर्ता की ओर से शोर निगरानी (नॉइज मॉनिटरिंग) रिपोर्ट भी प्रस्तुत की गई है।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि उद्योग से निकलने वाले अपशिष्ट जल (एफ्लुएंट) में प्रदूषकों का स्तर निर्धारित मानकों से अधिक है, जिससे प्रदूषण फैल रहा है। इसके अलावा कंपनी पर सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी को बिना अनुमति अवैध रूप से औद्योगिक उपयोग के लिए डाइवर्ट करने का भी आरोप लगा है।
इन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए एनजीटी ने संबंधित पक्षों से विस्तृत जवाब मांगा है। अब मामले की अगली सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट होगा कि उद्योग पर्यावरणीय मानकों का पालन कर रहा है या नहीं।
विवादों में होलंबी कलां का ई-वेस्ट इको पार्क: क्या नियमों को दरकिनार कर दी गई मंजूरी?
दिल्ली के होलंबी कलां गांव में प्रस्तावित ई-वेस्ट इको पार्क को लेकर उठे पर्यावरणीय और कानूनी सवालों पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है।
इस मामले में एनजीटी ने दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी), दिल्ली स्टेट इंडस्ट्रियल एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (डीएसआईआईडीसी) और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। 29 मई, 2026 को सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल ने संबंधित एजेंसियों से मामले पर अपना पक्ष रखने को कहा है।
कानूनी शिकंजे में ई-वेस्ट पार्क
यह आदेश होलंबी कलां गांव में 8.5 हेक्टेयर भूमि पर बनाए जा रहे ई-वेस्ट इको पार्क के खिलाफ दायर एक याचिका पर आया है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि नियमों को ताक पर रख रिहायशी इलाके के पास इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दी जा रही है, जिससे स्थानीय आबादी और पर्यावरण को गंभीर खतरा हो सकता है।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह जमीन मूल रूप से रिहायशी श्रेणी में थी, लेकिन बाद में इसका भूमि उपयोग (लैंड यूज) बदलकर 'यूटिलिटी' श्रेणी में कर दिया गया।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने 18 जून, 2025 की उस अधिसूचना का हवाला दिया, जिसके तहत भूमि उपयोग में बदलाव किया गया था। उन्होंने दिल्ली मास्टर प्लान के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए तर्क दिया कि 'यूटिलिटी' श्रेणी में जिन सेवाओं और गतिविधियों को अनुमति दी गई है, उनमें ई-वेस्ट प्रबंधन संयंत्र शामिल नहीं है। इसलिए इस भूमि पर ई-वेस्ट इको पार्क स्थापित करना नियमों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
क्या कहते हैं नियम-कानून
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि ई-वेस्ट प्रबंधन संयंत्र 'रेड कैटेगरी' यानी अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों की श्रेणी में आता है। इन्हें प्रदूषण के लिहाज से अधिक संवेदनशील माना जाता है। ऐसे उद्योगों के लिए "जल प्रदूषण नियंत्रण दिशानिर्देश, 2025" के तहत निर्धारित साइटिंग क्राइटेरिया जैसे कड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य है।
याचिकाकर्ता के वकील ने ट्रिब्यूनल को बताया कि इन दिशानिर्देशों के अनुसार किसी भी ऐसे औद्योगिक प्रतिष्ठान को आबादी वाले क्षेत्रों, शैक्षणिक संस्थानों, धार्मिक स्थलों, पुरातात्विक स्मारकों, राष्ट्रीय उद्यानों, आरक्षित वनों से कम से कम 500 मीटर की दूरी पर स्थापित किया जाना चाहिए। जबकि प्रस्तावित परियोजना स्थल के पश्चिमी हिस्से में होलंबी कलां गांव स्थित है।
इतना ही नहीं, प्रोजेक्ट साइट से 500 मीटर के दायरे में आठ स्कूल भी मौजूद हैं।
याचिकाकर्ता ने ई-वेस्ट (प्रबंधन) नियम, 2022 के नियम-10 का हवाला देते हुए यह भी दलील दी कि ई-वेस्ट की रीसाइक्लिंग और डिस्मेंटलिंग इकाइयां केवल पहले से स्वीकृत या नए चिन्हित औद्योगिक क्षेत्रों, औद्योगिक पार्कों, औद्योगिक एस्टेटों या औद्योगिक क्लस्टरों में ही स्थापित की जा सकती हैं। उनके अनुसार होलंबी कलां की प्रस्तावित साइट इन श्रेणियों में नहीं आती, इसलिए यहां ई-वेस्ट प्रबंधन सुविधा स्थापित करना नियमों के विपरीत है।
एनजीटी द्वारा मांगे गए जवाब के बाद अब गेंद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और दिल्ली सरकार के पाले में है। 29 मई को होने वाली अगली सुनवाई में यह साफ होगा कि विकास और पर्यावरण के इस टकराव में कोर्ट क्या रुख अपनाता है।