कचरे के ढेर से अपने काम के चीजे जमा करते लोग; प्रतीकात्मक तस्वीर; सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट 
पर्यावरण

बजट से पहले सीएसई की मांग: ‘ग्रीन अर्थव्यवस्था’ को रफ्तार देने के लिए जीएसटी में सुधार जरूरी

सीएसई का कहना है जीएसटी में सुधार से एमएसएमई मजबूत होंगे, श्रमिकों की आजीविका सुरक्षित होगी और भारत की आयात पर निर्भरता घटेगी।

Lalit Maurya

  • सीएसई ने बजट 2026 से पहले जीएसटी में सुधार की मांग की है ताकि भारत हरित अर्थव्यवस्था की दिशा में तेजी से बढ़ सके।

  • वित्त मंत्री को लिखे पत्र में सीएसई ने कहा है कि मौजूदा कर प्रणाली रीसाइकल्ड सामग्री और नई (वर्जिन) सामग्री में भेद नहीं करती और उनपर एक जैसा कर लगाती है।

  • इसका सीधा नुकसान उन उद्योगों को हो रहा है जो कचरे को संसाधन में बदलने का काम कर रहे हैं। मतलब कि कहीं न कहीं ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ को आगे बढ़ाने वाले क्षेत्रों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।

  • सीएसई के अनुसार, रीसाइकल कचरे पर मौजूदा जीएसटी ढांचे से दोहरा नुकसान हो रहा है, एक तरफ बड़ी संख्या में लेनदेन अनौपचारिक क्षेत्र में चले जाते हैं और दूसरी तरफ इससे रीसाइक्लिंग, संसाधन सुरक्षा और उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कमजोर पड़ती है।

  • सीएसई का कहना है कि जीएसटी में यह सुधार सिर्फ राजस्व का मामला नहीं है। इस कदम से छोटे और मझोले उद्योगों (एमएसएमई) को मजबूती मिलेगी, लाखों अनौपचारिक श्रमिकों की आजीविका सुरक्षित होगी और भारत की नए मैटेरियल के लिए आयात पर निर्भरता घटेगी।

सरकार की बजट 2026 की तैयारियों के बीच सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने कहा है कि कर व्यवस्था में सुधार भारत को हरित अर्थव्यवस्था की दिशा में निर्णायक बढ़त दिला सकता है। अपनी नई रिपोर्ट में सीएसई ने भारत की वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था के अहम पहलुओं में सुधार के लिए इस मौके का इस्तेमाल करने की जोरदार पैरवी की है।

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को लिखे एक पत्र में सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने कहा है कि ऊर्जा, उद्योग, कचरा, परिवहन और कृषि जैसे क्षेत्रों में सरकारी नीतियों के जरिए भारत पर्यावरण अनुकूल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। उनका कहना है कि जीएसटी और वित्तीय ढांचा इस बदलाव को और तेज करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

सीएसई ने हाल ही में ‘रिलैक्स द टैक्स’ नाम से एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें कर व्यवस्था की बड़ी खामी को उजागर किया है।

रीसाइक्लिंग पर टैक्स, प्रदूषण को फायदा

वित्त मंत्री को लिखे पत्र में सीएसई ने कहा है कि मौजूदा कर प्रणाली रीसाइकल्ड सामग्री और नई (वर्जिन) सामग्री में भेद नहीं करती और उनपर एक जैसा कर लगाती है। इसका सीधा नुकसान उन उद्योगों को हो रहा है जो कचरे को संसाधन में बदलने का काम कर रहे हैं। मतलब कि कहीं न कहीं ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ को आगे बढ़ाने वाले क्षेत्रों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।

सीएसई के अनुसार, रीसाइकल कचरे पर मौजूदा जीएसटी ढांचे से दोहरा नुकसान हो रहा है, एक तरफ बड़ी संख्या में लेनदेन अनौपचारिक क्षेत्र में चले जाते हैं और दूसरी तरफ इससे रीसाइक्लिंग, संसाधन सुरक्षा और उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कमजोर पड़ती है।

90,000 करोड़ तक का फायदा संभव

सीएसई में औद्योगिक प्रदूषण कार्यक्रम के निदेशक निवित कुमार यादव बताते हैं, 'रिपोर्ट में मेटल स्क्रैप, प्लास्टिक, ई-वेस्ट, बैटरी, कागज, कांच, टायर और एंड-ऑफ-लाइफ वाहनों समेत 12 प्रमुख कचरा और रीसाइक्लिंग क्षेत्रों का विश्लेषण किया गया है।'

उनके मुताबिक, हर क्षेत्र में संसाधनों के दोबारा इस्तेमाल की अपार संभावनाएं हैं। इससे न सिर्फ कचरा और प्रदूषण घटेगा, बल्कि संसाधनों का बेहतर उपयोग भी होगा।

योगेन्द्र आनंद / सीएसई

रिपोर्ट का आकलन है कि अगर रीसाइकल कचरे पर जीएसटी को पांच फीसदी या शून्य कर दिया जाए और अनौपचारिक आपूर्ति शृंखलाओं को औपचारिक व्यवस्था से जोड़ा दिया जाए, तो नुकसान, फायदे का सौदा बन सकता है। इस तरह आंशिक एकीकरण से हर साल करीब 34,000 करोड़ रुपये और पूर्ण एकीकरण में 90,000 करोड़ रुपये से अधिक का शुद्ध राजस्व प्राप्त हो सकता है।

लघु उद्योगों, रोजगार और आत्मनिर्भरता को मिलेगा सहारा

सीएसई का कहना है कि जीएसटी में यह सुधार सिर्फ राजस्व का मामला नहीं है। इस कदम से छोटे और मझोले उद्योगों (एमएसएमई) को मजबूती मिलेगी, लाखों अनौपचारिक श्रमिकों की आजीविका सुरक्षित होगी और भारत की नए मैटेरियल के लिए आयात पर निर्भरता घटेगी।

साथ ही देश सर्कुलर इकोनॉमी की दिशा में आगे बढ़ेगा। इससे फाइनेंशियल पॉलिसी को देश की सर्कुलर इकॉनमी और औद्योगिक प्राथमिकताओं के साथ अलाइन किया जा सकता है।

सीमेंट-स्टील सेक्टर में भी बड़ा मौका

सीएसई में औद्योगिक प्रदूषण कार्यक्रम के प्रबंधक पार्थ कुमार बताते हैं कि "सीमेंट और लौह-इस्पात जैसे भारी उद्योगों में कचरे के पुन: उपयोग से उत्सर्जन घटाने की अपार संभावना है।"

उनके मुताबिक एक अन्य रिपोर्ट में सामने आया है कि कचरे का पुनः उपयोग, जैसे सीमेंट में स्लैग, फ्लाई ऐश या म्युनिसिपल वेस्ट और इस्पात उद्योग में स्टील स्क्रैप, कचरे के साथ-साथ उत्सर्जन को कम करने का बड़ा मौका देता है। लेकिन विडंबना यह है कि रीसाइकल्ड और कम-कार्बन युक्त सामग्री पर 18 फीसदी जीएसटी होना, इस दिशा में एक बड़ा हतोत्साहन है।

ग्रीन सीमेंट को क्यों नहीं मिल रहा प्रोत्साहन?

सुनीता नारायण का कहना है भारत में कई प्रकार के सीमेंट बनते हैं, जिनमें कार्बन उत्सर्जन का स्तर अलग-अलग होता है। इनमें सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन ओपीसी (ऑर्डिनरी पोर्टलैंड सीमेंट) से होता है, जबकि अन्य तरह के सीमेंट में कम उत्सर्जन होता है, क्योंकि इनके उत्पादन में कचरे का उपयोग होता है।

लेकिन समस्या यह है कि जीएसटी सीमेंट के इन प्रकारों में कोई भेद नहीं करता। ऐसे में नारायण का कहना है, “जब टैक्स में कोई अंतर नहीं होगा, तो न उद्योगों को और न ही उपभोक्ताओं को ग्रीन विकल्प चुनने का कोई प्रोत्साहन मिलेगा।"

सीएसई ने अपनी रिपोर्ट ‘डिकार्बनाइजिंग इंडिया: द सीमेंट सेक्टर’ में सुझाव दिया है कि सीमेंट की जिन किस्मों से कम कार्बन उत्सर्जन होता है - जैसे पीपीसी, पीएससी, सीसी और एलसी3, उन्हें कम जीएसटी के दायरे में रखा जाए।

ये वे सीमेंट हैं जिनमें कच्चे माल की जगह कचरे का इस्तेमाल किया जाता है, जैसा कि सरकार पहले ही तय कर चुकी है। इससे ओपीसी के उत्पादन पर लगाम लगेगी और देश में कम कार्बन उत्सर्जित करने वाले सीमेंट का उत्पादन व मांग दोनों बढ़ेंगे।

‘कचरा नहीं, संसाधन’ - बदलनी होगी सोच

वित्त मंत्री को लिखे पत्र में सीएसई ने साफ कहा है कि कचरे पर कर को व्यवस्थित करना केवल वित्तीय सुधार का मामला नहीं है, बल्कि यह सोच में बदलाव का सवाल है। यह इस बात को मान्यता देना भी है कि कचरा एक मूल्यवान संसाधन है।

सुनीता नारायण कहती हैं, “टैक्स में ढील देकर हम ग्रीन उद्योगों के लिए समान अवसर पैदा कर सकते हैं। साथ ही अपने संसाधनों का भविष्य सुरक्षित कर सकते हैं और उन लाखों कमजोर श्रमिकों की रक्षा कर सकते हैं जो रीसाइक्लिंग अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।“

बजट 2026 से पहले सीएसई का संदेश साफ है, अगर भारत को सचमुच पर्यावरण-अनुकूल और आत्मनिर्भर बनना है, तो जीएसटी को भी उसी दिशा में कदम बढ़ाने होंगे।