कुल्लू में नेहरू पार्क को बचाने के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का दखल उस चिंता को सामने लाता है, जो आज कई पहाड़ी शहरों में तेजी से गहराती जा रही है।
पहाड़ी शहरों में सिकुड़ती हरियाली गंभीर समस्या को उजागर करती है। कुल्लू के सरवरी क्षेत्र में स्थित यह पार्क, जिसे लोगों के लिए खुली हवा, बच्चों के खेलने और शहर के पर्यावरण संतुलन के लिए विकसित किया गया था, अब कचरा डंपिंग और निर्माण गतिविधियों की जद में आ गया है।
याचिका के मुताबिक, यहां रेत, बजरी, पत्थर और बेकार मोबाइल शौचालय रखे जाने लगे, जबकि अब मैटेरियल रिकवरी फैसिलिटी बनाने के लिए निर्माण भी शुरू कर दिया गया था।
एनजीटी ने 8 मई 2026 को आदेश देकर कचरा डंपिंग, निर्माण और भूमि उपयोग में बदलाव पर तत्काल रोक लगा दी है। साथ ही संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब कर संयुक्त जांच समिति गठित की गई है।
यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि पार्क सरवरी नदी से 30 मीटर और भुंतर हवाई अड्डे से 10 किलोमीटर से कम दूरी पर स्थित है। हालांकि सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016 के तहत ऐसी सुविधा नदी से कम से कम 100 मीटर और हवाई अड्डे से 20 किलोमीटर की दूरी पर होनी चाहिए। यह विवाद बताता है कि विकास की दौड़ में शहरों की बची हुई हरियाली सबसे पहले निशाने पर आ रही है।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने हिमाचल प्रदेश के कुल्लू शहर में पार्क के तौर पर तय की गई जमीन पर ठोस कचरा फेंकने पर तत्काल रोक लगाने का आदेश दिया है। 8 मई 2026 को दिए आदेश में एनजीटी ने साफ कहा कि इस साइट पर अब किसी भी तरह का कचरा डंप नहीं किया जाएगा।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि अगली सुनवाई तक संबंधित जमीन के भूमि उपयोग में कोई बदलाव नहीं किया जाए और वहां किसी भी नए निर्माण की अनुमति नहीं होगी। ट्रिब्यूनल ने कुल्लू के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट और पुलिस सुपरिटेंडेंट को यह पक्का करने का निर्देश दिया कि उस जगह पर किसी भी तरह का कंस्ट्रक्शन या ठोस कचरा डालने का काम जारी न रहे।
निर्माण-भूमि उपयोग में बदलाव पर लगाई रोक
ट्रिब्यूनल ने कुल्लू म्युनिसिपल काउंसिल, उपायुक्त और अन्य संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर एक महीने में जवाब दाखिल करने को कहा है। साथ ही मामले की सच्चाई जांचने और सुधार के समाधान सुझाने के लिए संयुक्त समिति बनाने के निर्देश दिए हैं।
इस समिति में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी), हिमाचल प्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एचपीएसपीसीबी) और जिला प्रशासन के प्रतिनिधि शामिल होंगे। समिति को एक महीने के भीतर इस मामले में अपनी रिपोर्ट ट्रिब्यूनल के सामने प्रस्तुत करनी होगी।
न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी की पीठ मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा, “शहरों, रिहायशी इलाकों में मौजूद ग्रीन स्पेस और पार्क बेहद जरूरी हैं। ये शहर के फेफड़ों की तरह काम करते हैं और हवा की गुणवत्ता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए इनकी सुरक्षा बेहद जरूरी है। इन पर किसी तरह का अतिक्रमण या निर्माण की अनुमति नहीं दी जा सकती।“
मामला कुल्लू के सरवरी क्षेत्र स्थित नेहरू पार्क से जुड़ा है, जो सरकारी जमीन पर बना सार्वजनिक पार्क है। इसे आम लोगों के लिए विकसित किया गया था और इसकी देखरेख कुल्लू नगर परिषद करती है।
कैसे पार्क बना कचरा डंपिंग साइट
याचिका के अनुसार, पिछले कुछ समय से नगर परिषद पार्क के हिस्से का इस्तेमाल रेत, बजरी और पत्थर डंप करने के लिए कर रही थी। इसके साथ ही वहां बेकार पड़े मोबाइल शौचालय भी खड़े करने शुरू कर दिए। इससे पार्क की स्थिति खराब हो गई और सार्वजनिक उपयोग की यह जगह धीरे-धीरे कूड़ा फेंकने की जगह में बदलने लगी।
आरोप है कि अब यहां मैटेरियल रिकवरी फैसिलिटी (एमआरएफ) बनाने के लिए शेड निर्माण की तैयारी भी शुरू कर दी गई है।
8 जनवरी, 2019 को कुल्लू के डिप्टी कमिश्नर की अध्यक्षता में हुई एक मीटिंग में, नगर परिषद को निर्देश दिया गया कि वे पार्क के मौजूदा स्वरूप में कोई बदलाव न करें और यथास्थिति बनाए रखें। हालांकि, पार्क के विकास और सुधार के लिए कुछ कदम उठाए गए, लेकिन इसके बावजूद पार्क की हालत में कोई खास सुधार नहीं हुआ।
हाल ही में कुल्लू नगर परिषद ने 13 अप्रैल 2026 को एक अल्पकालिक टेंडर जारी किया, जिसमें नेहरू पार्क के भीतर मैटेरियल रिकवरी फैसिलिटी स्थापित करने के लिए शेड निर्माण हेतु निविदाएं मांगी गईं।
विकास बनाम हरियाली: किसकी कीमत पर बनेंगी परियोजनाएं
याचिका में यह भी कहा गया है कि यह पार्क सरवरी नदी से 30 मीटर से भी कम दूरी पर है, जो ब्यास की एक सहायक नदी है। ब्यास नदी भी पार्क से करीब 200 मीटर की दूरी पर बहती है। यह क्षेत्र घनी आबादी के बीच स्थित है और भुंतर हवाई अड्डे से 10 किलोमीटर से भी कम दूरी पर है। हालांकि सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016 के तहत ऐसी सुविधा नदी से कम से कम 100 मीटर और हवाई अड्डे से 20 किलोमीटर की दूरी पर होनी चाहिए।
आरोप है कि कुल्लू के डिप्टी कमिश्नर से मीटिंग और शहरी विकास निदेशालय और कुल्लू नगर परिषद के कार्यकारी अधिकारी को ज्ञापन भी दिया गया। इसके बावजूद टेंडर को अंतिम रूप दे दिया गया और 28 अप्रैल 2026 से विवादित साइट पर निर्माण कार्य शुरू कर दिए गए।
आवेदन में कहा गया है कि अधिकारियों की कार्रवाई एनजीटी के 29 जुलाई 2013 के आदेश का उल्लंघन है। यह आदेश अभिषेक राय बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य के मामले में दिया गया था, जिसमें घनी आबादी वाले शहर के बीच वेस्ट कलेक्शन/सेग्रीगेशन प्लांट लगाने पर रोक लगाई गई थी।
पहाड़ी शहरों में सिमटती हरियाली पर बड़ा सवाल
याचिकाकर्ता ने अदालत में तस्वीरें भी पेश कीं, जिनसे पता चलता है कि जहां कभी सार्वजनिक पार्क था, वहां धीरे-धीरे हरियाली हटाकर कचरा डंपिंग और निर्माण शुरू कर दिया गया। तस्वीरों में साइट पर निर्माण कार्य भी होता दिख रहा है।
देखा जाए तो यह मामला केवल एक पार्क का नहीं, बल्कि पहाड़ी शहरों में तेजी से सिमटते हर भरे क्षेत्रों का है। जिस जमीन को बच्चों के खेलने, खुली हवा में सांस लेने, और शहर को राहत देने के लिए सुरक्षित रखा गया था, वही अब कचरा परियोजनाओं और निर्माण के दबाव में घिरती नजर आ रही है। यह सवाल भी उठता है कि विकास के नाम पर आखिर कब तक शहर अपनी बची हुई हरियाली खोते रहेंगे।