हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में तेजी से बढ़ते बहुमंजिला निर्माण ने पर्यावरण और लोगों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोलन-बड़ोग क्षेत्र में 21 निर्माण परियोजनाओं की जांच में आठ ऐसी इमारतें सामने आईं, जिनमें छह मंजिल से अधिक निर्माण हुआ है।
अब हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि जब पहाड़ी क्षेत्रों में इमारतों की अधिकतम ऊंचाई 25 मीटर निर्धारित है, तो इससे ऊंची इमारतों को मंजूरी किस आधार पर दी गई?
13 अक्टूबर, 2026 को मामले की सुनवाई के दौरान हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने भवनों के बीच पर्याप्त दूरी, अग्नि सुरक्षा मानकों और जरूरी पर्यावरणीय मंजूरियों पर भी सवाल उठाए। अदालत ने पाया कि कई निर्माण स्थलों की मौजूदा स्थिति की जानकारी तक संबंधित अधिकारियों के पास उपलब्ध नहीं है। इससे निर्माण कार्यों की निगरानी और नियमों के पालन पर गंभीर संदेह पैदा होता है।
अदालत ने राज्य सरकार से सोलन-बड़ोग की 21 परियोजनाओं के साथ-साथ पिछले दस वर्षों में भूमि खरीद से संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत दी गई अनुमतियों का विस्तृत ब्योरा मांगा है। शिमला जिले में इस अवधि में ऐसी 801 अनुमतियां दी गईं, जबकि बड़ोग में 187 अनुमतियां जारी हुईं।
होटलों, अपार्टमेंट और व्यावसायिक परियोजनाओं के लिए पहाड़ों पर बढ़ता निर्माण अब केवल नियमों के उल्लंघन का मामला नहीं रह गया है। यह पहाड़ी पर्यावरण, भवनों की संरचनात्मक सुरक्षा और आपात स्थितियों में लोगों की जान बचाने की तैयारियों से भी जुड़ा है।
हाईकोर्ट की सख्ती ने सवाल उठाया है कि विकास की दौड़ में पहाड़ों की सुरक्षा और निर्धारित मानकों की अनदेखी आखिर क्यों हो रही है।
हिमाचल प्रदेश में पहाड़ों पर तेजी से खड़ी हो रहीं बहुमंजिला इमारतों के निर्माण और उनकी सुरक्षा को लेकर हाईकोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं।
अदालत ने पूछा है कि जब पहाड़ी इलाकों में इमारतों की अधिकतम ऊंचाई 25 मीटर निर्धारित है, तो इससे अधिक ऊंची इमारतों के निर्माण की मंजूरी कैसे दी गई? अदालत ने यह भी जानना चाहा है कि इन इमारतों के बीच आग से बचाव के लिए पर्याप्त दूरी रखी गई है या नहीं और इनके लिए जरूरी अग्नि सुरक्षा मानकों का पालन किया जा रहा है या नहीं।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने 13 अक्टूबर, 2026 को राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह सोलन जिले के सोलन-बड़ोग क्षेत्र में निर्माण संबंधी अनियमितताओं के मामले में विस्तृत हलफनामा दाखिल करे।
अदालत ने कुल्लू, कांगड़ा और सिरमौर जिलों में हिमाचल प्रदेश भू-राजस्व एवं काश्तकारी सुधार अधिनियम, 1972 की धारा 118 के तहत दी गई अनुमतियों का ब्योरा भी मांगा है। इसके साथ ही सरकार को पिछले दस वर्षों में पूरे राज्य में इस धारा के तहत दी गई सभी अनुमतियों की जानकारी देने को कहा गया है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि बड़ी निर्माण परियोजनाओं को उनके क्षेत्रफल के हिसाब से जरूरी पर्यावरणीय मंजूरियां मिली हैं या नहीं।
गौरतलब है यह मामला सोलन-बड़ोग क्षेत्र में कथित अवैध निर्माण से जुड़ा है। अदालत के 15 सितंबर, 2026 के पिछले आदेश के अनुपालन में राज्य के नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग के अवर सचिव सुख राम ठाकुर ने हलफनामा दाखिल किया है।
हलफनामे के अनुसार, सोलन-बड़ोग क्षेत्र में 21 बहुमंजिला इमारत परियोजनाओं की जांच के लिए राज्य नगर नियोजक की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई थी। समिति को इन परियोजनाओं में धारा 118 के तहत मिली अनुमतियों और स्वीकृत भवन नक्शों की जांच करनी थी।
जांच के दौरान 21 में से आठ परियोजनाओं में छह मंजिल से अधिक निर्माण पाया गया। हलफनामे में बताया गया कि इन मामलों में निर्माण की मंजूरी हाईकोर्ट के 11 मई, 2026 के उस आदेश से पहले दी गई थी, जिसमें सोलन में छह मंजिल से अधिक ऊंची इमारतों के निर्माण पर रोक लगाई गई थी।
राज्य सरकार ने 29 अगस्त, 2026 को छह मंजिल से अधिक निर्माण रोकने के निर्देश जारी किए थे। हालांकि, इन परियोजनाओं में निर्माण की वास्तविक स्थिति को लेकर भी सवाल सामने आए हैं।
हाईकोर्ट ने पाया कि कई मामलों में संबंधित अधिकारियों के पास निर्माण स्थलों की मौजूदा स्थिति की जानकारी तक उपलब्ध नहीं है। इससे भवन निर्माण की निगरानी और नियमों के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
अदालत ने कहा कि नियोजन संबंधी अनुमतियां सामान्य तौर पर इस शर्त पर दी जाती हैं कि निर्माण दो साल के भीतर पूरा किया जाए। निर्धारित प्रक्रिया के तहत समय बढ़ाने के लिए आवेदन और मंजूरी जरूरी होती है। संबंधित वैधानिक प्रावधानों के अनुसार, तय समय में निर्माण नहीं होने पर अनुमति स्वतः निरस्त मानी जा सकती है।
अदालत ने यह भी गौर किया कि धारा 118 के तहत जमीन खरीदने की अनुमति मिलने के बाद कई डेवलपर छह मंजिल से अधिक ऊंची इमारतों की स्वीकृति हासिल कर चुके हैं। इससे जमीन खरीदने की अनुमति और निर्माण की मंजूरी के बीच नियामकीय निगरानी को लेकर सवाल उठे हैं।
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की पीठ ने हलफनामे के साथ पेश की गई तस्वीरों पर भी गौर किया। तस्वीरों में बड़े-बड़े अपार्टमेंट ब्लॉक बनते दिखाई दिए। अदालत ने प्रथम दृष्टया चिंता जताई कि इस तरह का निर्माण पहाड़ी इलाकों के लिए उपयुक्त संरचनात्मक मानकों के अनुरूप नहीं भी हो सकता है।
पीठ ने इमारतों के अलग-अलग ब्लॉकों और फ्लैटों के बीच छोड़ी गई दूरी पर भी संदेह जताया। अदालत ने सवाल उठाया कि आग लगने जैसी आपात स्थितियों से निपटने के लिए पर्याप्त जगह छोड़ी गई है या नहीं। साथ ही, आसपास के भवनों के बीच न्यूनतम दूरी तय करने वाले नियमों और अग्नि सुरक्षा संबंधी मानकों की जानकारी भी मांगी।
अदालत ने 'रेगुलेशंस फॉर डेवलपमेंट ऑफ अपार्टमेंट्स एंड कॉलोनिज' का उल्लेख करते हुए कहा कि इन नियमों के अनुसार, मैदानी क्षेत्रों में इमारत की अधिकतम ऊंचाई 30 मीटर और पहाड़ी क्षेत्रों में ढलानदार छत सहित 25 मीटर निर्धारित है। करीब 25 मीटर की ऊंचाई सामान्यतः छह से सात मंजिल के बराबर हो सकती है।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को हलफनामा दाखिल कर यह बताने का निर्देश दिया कि 25 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली इमारतों को मंजूरी किस आधार पर दी गई। इसमें उन 21 परियोजनाओं का भी ब्योरा शामिल करना होगा, जिनके निर्माण पर रोक लगाने के नोटिस जारी किए गए हैं। सरकार को इमारतों के बीच जरूरी दूरी और अग्नि सुरक्षा मंजूरी से जुड़े मानकों की जानकारी भी देनी होगी।
राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव (राजस्व) अनिल चौहान की ओर से दाखिल अलग हलफनामे में धारा 118 के तहत दी गई अनुमतियों के आंकड़े भी सामने आए हैं।
हलफनामे के अनुसार, सोलन जिले के बड़ोग पटवार सर्किल में गैर-कृषकों को कुल 187 अनुमतियां दी गईं। इनमें 64 अनुमतियां विभिन्न उद्देश्यों के लिए जमीन खरीदने और 123 निर्मित संपत्तियों या फ्लैटों की खरीद के लिए थीं।
रुझान दर्शाते हैं कि पिछले दस वर्षों में शिमला जिले में धारा 118 के तहत कुल 801 अनुमतियां दी गईं। वहीं, सिरमौर जिले की नाहन तहसील में 270 अनुमतियां जारी की गईं। इनमें 159 औद्योगिक और पर्यटन संबंधी उद्देश्यों के लिए, जबकि 111 आवासीय और पर्यटन संबंधी उद्देश्यों के लिए थीं।
इन आंकड़ों के बीच अदालत की चिंता केवल यह नहीं है कि कितनी अनुमतियां जारी की गई, बल्कि यह भी है कि उनके आधार पर बन रही इमारतें निर्धारित ऊंचाई, अग्नि सुरक्षा और पहाड़ी क्षेत्रों के लिए जरूरी निर्माण मानकों का पालन कर रही हैं या नहीं।
अब राज्य सरकार के जवाब से स्पष्ट होगा कि इन परियोजनाओं को मंजूरी देने के पीछे क्या आधार था और नियमों के पालन की निगरानी किस तरह की गई।
देखा जाए तो यह रिपोर्ट सिर्फ आंकड़ों या अदालती कार्यवाही का पुलिंदा नहीं है, यह एक चेतावनी है। हॉलिडे होम, कमर्शियल होटलों और लक्जरी अपार्टमेंट्स की अंधी दौड़ में पहाड़ों का सीना चीरा जा रहा है।
ऐसे में यदि वक्त रहते इन अवैध और मानकों के विपरीत बने निर्माणों पर अंकुश न लगाया गया, तो देवभूमि की खूबसूरती और सुरक्षा दोनों ही इतिहास बनकर रह जाएंगे।