दुनिया हर हफ्ते लगभग एक नया “पेरिस” खड़ा कर रही है। निर्माण क्षेत्र आज वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का 37 फीसदी और ऊर्जा खपत का 28 फीसदी हिस्सा बन चुका है। फोटो: आईस्टॉक 
पर्यावरण

ईंट-सीमेंट के सपने और सुलगती दीवारें: रोजाना 1.27 करोड़ वर्ग मीटर क्षेत्र में हो रहा नया निर्माण

संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट में सामने आया है कि विकास की अंधी दौड़ में दुनिया अनजाने में ऐसे शहर खड़े कर रही है, जहां गर्मी, प्रदूषण और ऊर्जा संकट इंसानी जिंदगी को मुश्किल बना रहे हैं।

Lalit Maurya

  • हर दिन दुनिया में 1.27 करोड़ वर्ग मीटर नए निर्माण के साथ इंसान अपने सपनों के घर तो बना रहा है, लेकिन इसी रफ्तार से धरती को कंक्रीट के ऐसे जाल में भी बदल रहा है, जो जलवायु संकट को और गहरा रहा है।

  • संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट बताती है कि दुनिया हर हफ्ते लगभग एक नया “पेरिस” खड़ा कर रही है। निर्माण क्षेत्र आज वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का 37 फीसदी और ऊर्जा खपत का 28 फीसदी हिस्सा बन चुका है।

  • रिपोर्ट के मुताबिक, इस अंधाधुंध शहरीकरण के कारण 2024 में इमारतों से होने वाला कार्बन उत्सर्जन बढ़कर 9.9 गीगाटन के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया है। आज वैश्विक स्तर पर कच्चे माल का 50 फीसदी हिस्सा अकेले निर्माण क्षेत्र में खप रहा है।

  • हालांकि, 2015 के बाद से 'ग्रीन बिल्डिंग्स' तीन गुणा बढ़ी हैं, लेकिन 2020 के बाद से यह बदलाव बेहद सुस्त पड़ गया है। आज भी इमारतों में सिर्फ 17.3 फीसदी अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल हो रहा है, जिससे 2050 तक 'नेट-जीरो' का लक्ष्य दूर होता जा रहा है।

  • संयुक्त राष्ट्र ने चेताया है कि साल 2050 तक दुनिया की आधी इमारतों का बनना या कायाकल्प होना बाकी है, जो सरकारों के पास नीति बदलने का आखिरी मौका है। इमारतों की ऊर्जा दक्षता में सुधार लाने के लिए 2030 तक 5.9 ट्रिलियन डॉलर के भारी निवेश और जीवाश्म ईंधन से तौबा करने की जरूरत है।

  • भारत सहित तेजी से शहरीकरण वाले देशों में हालात ज्यादा गंभीर हैं। पेड़ों की कटाई, झीलों का खत्म होना और कंक्रीट के फैलते जंगल शहरों को भट्ठी में बदल रहे हैं। आईआईटी के अध्ययन में भी सामने आया है कि भारतीय शहरों में बढ़ती गर्मी के लिए 60 फीसदी तक जिम्मेदार अकेला शहरीकरण है। हालात यह हैं कि दिल्ली जैसे शहरों में लोग साल के महज तीन फीसदी समय ही साफ हवा और आरामदायक मौसम का अनुभव कर पाते हैं।

  • सवाल अब सिर्फ विकास का नहीं, बल्कि इंसानों के रहने लायक भविष्य बचाने का है। संकट के इस दौर में अब समाज और सरकारों को तय करना है कि उन्हें कंक्रीट की सुलगती दीवारें चाहिए या सांस लेती हरी-भरी इमारतें।

एक घर सिर्फ ईंट, सीमेंट और लोहे से नहीं बनता। उसमें लोगों के बेहतर जिंदगी, सुरक्षित भविष्य और अपनेपन के सपने बसते हैं। लेकिन आधुनिकता की दौड़ में आज हम जिस रफ्तार से इमारतें खड़ी कर रहे हैं, उसी रफ्तार से अनजाने में अपनी ही धरती के चारों तरफ कंक्रीट का एक ऐसा जाल बुन रहे हैं जो पर्यावरण के साथ-साथ खुद हम पर ही भारी पड़ रहा है।

आपको जानकार हैरानी होगी कि आज दुनिया भर में हर दिन करीब 1.27 करोड़ वर्ग मीटर क्षेत्र में नया निर्माण हो रहा है। अगर इस रफ्तार को गहराई से समझें, तो इसका सीधा मतलब हुआ कि हम हर हफ्ते दुनिया के नक्शे पर पूरे 'पेरिस' शहर जितना नया कंक्रीट का ढांचा खड़ा कर रहे हैं।

कंक्रीट का नया इतिहास या खुद की तबाही का रास्ता?

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) और ग्लोबल एलायंस फॉर बिल्डिंग्स एंड कंस्ट्रक्शन ने अपनी नई रिपोर्ट में खुलासा किया है कि 2024 में दुनिया भर में इमारतों का कुल क्षेत्रफल 1.7 फीसदी बढ़कर 27,300 करोड़ वर्गमीटर तक पहुंच गया।

विकास की यह अंधी दौड़ सबसे ज्यादा भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में देखी जा रही है, जहां बुनियादी ढांचे का विस्तार तो हो रहा है, लेकिन उसकी कीमत पर्यावरण को चुकानी पड़ रही है।

हकीकत यह है कि आज दुनिया भर में धरती से निकाले जाने वाले कुल कच्चे माल का आधा हिस्सा यानी करीब 50 फीसदी सिर्फ निर्माण और इमारतें बनाने में खप रहा है। इसके अलावा, दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन का 37 फीसदी और वैश्विक ऊर्जा खपत का 28 फीसदी हिस्सा अकेले इन इमारतों और निर्माण क्षेत्र की देन है।

दुनिया में बढ़ती गर्मी के लिए जलवायु परिवर्तन को दोषी माना जाता रहा है, लेकिन साथ ही इसका एक अपराधी बेतहाशा होता शहरीकरण भी है। आज जिस तरह प्राकृतिक आवासों को पाट कंक्रीट के जंगल तैयार करने की जो होड़ लगी है उससे इन शहरी जंगल में रहने वाले लोगों का जीवन ही दुश्वार होता जा रहा है।

इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बढ़ते तापमान के लिए सिर्फ जलवायु परिवर्तन ही जिम्मेवार है। क्या जिस तरह से पेड़ों को काट, झीलों को पाट शहरीकरण किया जा रहा है वो इस गर्मी में इजाफा नहीं कर रहा? वैज्ञानिक भी इससे इत्तेफाक रखते हैं।

दिल्ली जैसे शहरों में तो इसका खुलकर असर सामने आने लगा है, जहां दिन ही नहीं रात में भी तापमान गिरने का नाम नहीं ले रहा। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) से जुड़े शोधकर्ताओं का दावा है कि अकेले शहरीकरण ने भारतीय शहरों में गर्मी को 60 फीसदी तक बढ़ा दिया है।

एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में बढ़ते तापमान और जहरीली हवा की दोहरी मार ने लोगों के लिए सुरक्षित और आरामदायक जीवन का समय बेहद कम कर दिया है। आप को जानकार हैरानी होगी कि दिल्ली में साल के महज 259 घंटे ही ऐसे होते हैं जब लोग साफ हवा और आरामदायक तापमान दोनों का आनंद एक साथ ले सकते हैं। यानी साल का सिर्फ तीन फीसदी वक्त ही सुरक्षित और आरामदायक होता है।

अंधाधुंध निर्माण: तरक्की की बुलेट ट्रेन पर सवार विनाश

सच कहें तो आज कहीं नई कॉलोनियां बस रही हैं, कहीं ऊंची इमारतें आसमान को छू रही हैं, लेकिन इस विकास की चमक के पीछे जलवायु संकट की एक गहरी परछाईं भी छिपी है।

रिपोर्ट में सामने आया है कि 2024 में इमारतों के संचालन से होने वाला कार्बन उत्सर्जन बढ़कर 9.9 गीगाटन के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया है। यह पिछले साल के मुकाबले एक फीसदी अधिक है। संयुक्त राष्ट्र ने चेताया है कि दुनिया में भले ही इमारतें ऊर्जा दक्ष जरूर हो रही हैं, लेकिन बदलाव की रफ्तार इतनी धीमी है कि 2050 तक 'नेट-जीरो उत्सर्जन' का लक्ष्य लगातार दूर होता जा रहा है।

एक अन्य अध्ययन से पता चला है कि यदि अगर निर्माण क्षेत्र की वर्तमान गति जारी रही, तो 2050 तक इसका कार्बन उत्सर्जन दोगुना हो सकता है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन ने इस संकट पर गहरी चिंता जताते हुए कह, “घर, स्कूल, अस्पताल और दफ्तर सिर्फ ईंट-पत्थर की संरचनाएं नहीं हैं, बल्कि इंसानी जीवन की बुनियाद हैं। इन्हें अगर सही तरीके से बनाया जाए तो ये लोगों को सुरक्षित, स्वस्थ और बेहतर जिंदगी दे सकते हैं, लेकिन गलत निर्माण आने वाली पीढ़ियों के लिए जलवायु संकट को और खतरनाक बना सकता है।“

उन्होंने याद दिलाया कि साल 2050 तक दुनिया की आधी इमारतों का बनना या उनका कायाकल्प होना बाकी है, इसलिए सरकारों के पास नीति बदलने का यह आखिरी और सबसे बेहतरीन मौका है।

कागजी चमक बनाम कड़वा सच: तीन गुना ग्रीन बिल्डिंग, फिर भी सुस्त रफ्तार

हालांकि, साल 2015 के बाद से कुछ सकारात्मक बदलाव भी दर्ज किए गए हैं। दुनियाभर में इमारतों की ऊर्जा खपत में सुधार हुआ है। वैश्विक स्तर पर इमारतों के आकार के मुकाबले ऊर्जा की सालाना खपत में 8.5 फीसदी की कमी आई है। इसी तरह पर्यावरण अनुकूल “ग्रीन बिल्डिंग” प्रमाणपत्र पाने वाली इमारतों की संख्या करीब तीन गुणा बढ़ गई है।

पिछले एक दशक में 2015 से ऊर्जा दक्षता पर कुल 2.3 ट्रिलियन डॉलर का निवेश भी हुआ है, जिसमें से अकेले 2024 में 27,500 करोड़ डॉलर खर्च किए गए।

लेकिन इस धुंध में सबसे कड़वा सच यह है कि 2020 के बाद से पर्यावरण को बचाने के इन तमाम प्रयासों की रफ्तार सुस्त पड़ गई है। 2024 में इमारतों की कुल ऊर्जा जरूरतों का महज 17.3 फीसदी हिस्सा ही सौर या पवन ऊर्जा जैसे अक्षय ऊर्जा स्रोतों से पूरा हो सका, जो नेट-जीरो के लक्ष्य से बेहद दूर है। 

सीधे शब्दों में कहें तो 2020 के बाद से ग्रीन ट्रांजिशन की सुस्त गाड़ी, अंधाधुंध निर्माण की बुलेट ट्रेन का मुकाबला नहीं कर पा रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर दुनिया को 2050 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करना है, तो ऊर्जा दक्षता और स्वच्छ निर्माण तकनीकों में बड़े पैमाने पर निवेश करना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इमारतों की ऊर्जा दक्षता में सुधार लाने के लिए 2030 तक इस क्षेत्र में 5.9 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर यानी सालाना करीब 59,200 करोड़ डॉलर के भारी-भरकम निवेश की जरूरत होगी।

साथ ही नीति निर्माताओं को जल्द से जल्द कोयले और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों से तौबा करनी होगी।

संयुक्त राष्ट्र संगठन यूएन-हैबिटेट ने भी अपनी रिपोर्ट में चेताया है कि जलवायु परिवर्तन के चलते 2040 तक शहरों में रह रहे 200 करोड़ से ज्यादा लोगों को तापमान में कम से कम 0.5 डिग्री सेल्सियस की अतिरिक्त वृद्धि का सामना करना पड़ सकता है।

भारत सहित दुनिया के कई देशों ने दिखाई उम्मीद की किरण

निराशा के इस दौर में कुछ देशों ने मिसाल भी पेश की है। उदाहरण के लिए रिपोर्ट में भारत को उन देशों में शामिल किया गया है जहां इमारतों में सौर और अन्य अक्षय ऊर्जा के इस्तेमाल में तेजी आई है।

भारत ने निर्माण क्षेत्र में बदलाव के लिए राष्ट्रीय रोडमैप भी तैयार किए हैं। कुछ ऐसी ही पहल बांग्लादेश, इंडोनेशिया, जॉर्डन, घाना और सेनेगल में भी देखी गई है। इसके अलावा चीन, कोलंबिया, तुर्की और भारत में ग्रीन बिल्डिंग सर्टिफिकेशन का दायरा तेजी से बढ़ा है।

ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी जैसे देशों ने इमारतों में ऑन-साइट सौर ऊर्जा को बढ़ावा देकर उम्मीद की एक नई किरण दिखाई है। इसी तरह जहां एक तरफ यूरोपियन यूनियन ने निर्माण से पहले और बाद के उत्सर्जन को रोकने के लिए कड़े कानून बनाए हैं, वहीं जापान, स्विट्जरलैंड, कैलिफोर्निया और सिंगापुर जैसे देशों ने अपने बिल्डिंग कोड और ऊर्जा दक्षता के नियमों को अपग्रेड किया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु संकट और महंगी होती ऊर्जा के इस दौर में पर्यावरण अनुकूल और ऊर्जा-दक्ष इमारतें सिर्फ पर्यावरण की जरूरत नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी को बेहतर और सुरक्षित बनाने का रास्ता भी हैं।

सच कहें तो आज जब पूरी दुनिया घरों की किल्लत और बिजली के भारी बिलों के संकट से जूझ रही है, तब यह रिपोर्ट याद दिलाती है कि पर्यावरण अनुकूल इमारतें न सिर्फ हमारी जेब पर बोझ को कम करेंगी, बल्कि हमें बदलते मौसम की जानलेवा मार से भी बचाएंगी। ऐसे में अब फैसला सरकार और समाज को करना है कि हमें कंक्रीट की सुलगती दीवारें चाहिए या सांस लेती हरी-भरी इमारतें?