ऊर्जा

भारत में स्वच्छ ऊर्जा की राह में रोड़ा बन रहे पुराने बिजली खरीद समझौते: सीएसई रिपोर्ट

सीएसई रिपोर्ट के मुताबिक सौर ऊर्जा बढ़ने के बावजूद पुराने और लंबे बिजली खरीद समझौते डिस्कॉम व उपभोक्ताओं पर आर्थिक बोझ बढ़ा सकते हैं

Lalit Maurya

  • भारत में स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ता बदलाव अब केवल नई सौर और पवन क्षमता जोड़ने का सवाल नहीं रह गया है।

  • सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की नई रिपोर्ट ने चेताया है कि कोयला आधारित बिजलीघरों से जुड़े पुराने और लंबे बिजली खरीद समझौते (पीपीए) इस बदलाव की राह में आर्थिक बाधा बन सकते हैं।

  • आरटीआई के जरिए आठ राज्यों से जुटाई गई जानकारी के विश्लेषण से पता चला है कि सौर ऊर्जा बढ़ने के साथ दिन में कोयला बिजलीघरों का उपयोग घट रहा है, लेकिन लंबे पीपीए के तहत डिस्कॉम को तय भुगतान की जिम्मेदारी उठानी पड़ सकती है।

  • सीएसई के मुताबिक, 11 साल के पीपीए को 25 साल तक बढ़ाने से भले ही वार्षिक टैरिफ में 70 से 114 पैसे प्रति यूनिट की बचत दिखे, लेकिन कुल उपभोक्ता भुगतान दोगुने से अधिक हो सकता है।

  • आठ राज्यों में अध्ययन की गई 67.1 गीगावाट क्षमता में 6.1 गीगावाट 2040 और उसके बाद तक के अनुबंधों से बंधी है।

  • रिपोर्ट का संदेश स्पष्ट है—बदलती बिजली व्यवस्था के साथ पीपीए को भी आधुनिक बनाना होगा, वरना आज के अनुबंध कल की स्वच्छ ऊर्जा व्यवस्था और उपभोक्ताओं की जेब पर भारी पड़ सकते हैं।

भारत में स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ते बदलाव के बीच कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से जुड़े लंबे और कठोर बिजली खरीद समझौते (पीपीए) नई चुनौती बनकर उभर रहे हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) द्वारा जारी नई रिपोर्ट ‘बियॉन्ड बेसलोड: रिफॉर्मिंग थर्मल पीपीएज फॉर इंडियाज एनर्जी ट्रांजिशन’ के मुताबिक, मौजूदा थर्मल पीपीए उस दौर की जरूरतों के हिसाब से बनाए गए थे, जब बिजली की कमी थी और कोयला आधारित संयंत्रों को लगातार पूरी क्षमता के करीब चलाने की जरूरत पड़ती थी।

लेकिन आज सौर और अन्य स्रोतों से अक्षय ऊर्जा की बढ़ती हिस्सेदारी के कारण बिजली व्यवस्था तेजी से बदल रही है। ऐसे में यदि इन पीपीए में समय रहते सुधार नहीं किया गया तो ये भारत के ऊर्जा बदलाव की राह में बड़ी चुनौती बन सकते हैं।

सीएसई ने सूचना के अधिकार (आरटीआई) के जरिए आठ राज्यों से मिली जानकारी का विश्लेषण कर यह रिपोर्ट तैयार की है।

रिपोर्ट के निष्कर्ष दर्शाते हैं कि यदि भारत को सस्ती, किफायती और स्वच्छ बिजली व्यवस्था की ओर बढ़ना है, तो थर्मल पीपीए में जल्द सुधार जरूरी है। इन समझौतों को न केवल अक्षय ऊर्जा के अनुकूल बनाना होगा, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इनका आर्थिक बोझ अंततः बिजली उपभोक्ताओं पर न पड़े।

रिपोर्ट के मुताबिक, थर्मल पीपीए में बदलाव और उन्हें आधुनिक बनाना जरूरी है। इससे बिजली उत्पादन की लागत कम हो सकती है और सौर व पवन जैसी अक्षय ऊर्जा को ग्रिड में बेहतर तरीके से शामिल किया जा सकेगा। साथ ही, यह भी सुनिश्चित होगा कि लंबे समय के बिजली खरीद समझौते भारत के तेजी से बदलते बिजली क्षेत्र की जरूरतों के अनुरूप बने रहें।

बदल रही कोयले की भूमिका, लेकिन पुराने ढर्रे पर पीपीए

सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण का इस बारे में कहना है, “भारत का बिजली क्षेत्र एक बुनियादी संरचनात्मक बदलाव से गुजर रहा है। देश में सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता और उससे होने वाला बिजली उत्पादन तेजी से बढ़ा है। आज कोयले से बनने वाली हर सात यूनिट बिजली के मुकाबले सौर ऊर्जा से एक यूनिट बिजली पैदा हो रही है। वहीं 2019-20 में यह अनुपात कोयले की हर 19 यूनिट बिजली पर सौर ऊर्जा की महज एक यूनिट के बराबर था।“

उनके अनुसार बिजली व्यवस्था में कोयले की भूमिका भी बदल रही है। पहले कोयला बिजलीघर लगातार चलकर मुख्य रूप से बिजली की जरूरत पूरी करते थे, लेकिन अब उनकी भूमिका सौर और पवन ऊर्जा जैसे अक्षय स्रोतों के उतार-चढ़ाव को संतुलित करने वाले एक स्रोत की होती जा रही है। लेकिन कोयला बिजलीघरों के संचालन में बदलाव आने के बावजूद, उनसे जुड़े व्यावसायिक समझौते यानी पीपीए लगभग पुराने ढर्रे पर ही चल रहे हैं।

उनका कहना है कि स्वच्छ ऊर्जा की ओर सुचारू बदलाव के लिए पीपीए को भी बदलती बिजली व्यवस्था के अनुरूप विकसित करना जरूरी है।

सीएसई की सस्टेनेबल इंडस्ट्रियलाइजेशन यूनिट के प्रोग्राम मैनेजर पार्थ कुमार कहते हैं कि “जैसे-जैसे भारत की स्थापित गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली क्षमता 50 फीसदी से ऊपर जा रही है, बिजली की कीमत और संयंत्रों के संचालन से जुड़े अनुबंधों को भी नए सिरे से डिजाइन करना होगा।“ उनके मुताबिक, ऐसा नहीं करने पर पर्यावरणीय लाभ तो मिलेंगे, लेकिन उपभोक्ताओं पर अनावश्यक आर्थिक बोझ भी बढ़ सकता है।

आखिर क्या है पीपीए और इसमें समस्या कहां है?

गौरतलब है कि बिजली खरीद समझौते या पीपीए वह अनुबंध है, जिसके तहत कोई बिजली उत्पादक कंपनी बिजली खरीदने वाली संस्था, जैसे डिस्कॉम या राज्य बिजली निगम, को तय शर्तों पर बिजली देने के लिए सहमत होती है।

सीएसई के मुताबिक, मौजूदा पीपीए मुख्य रूप से इस सोच पर आधारित हैं कि कोयला बिजलीघर लगातार और अधिकतम क्षमता के करीब चलते रहेंगे। अधिकांश थर्मल पीपीए उस दौर के हिसाब से बने हैं, जब देश में बिजली की कमी थी और कोयला बिजली संयंत्रों का अधिकतम इस्तेमाल किया जाता था। इनमें भुगतान, संचालन संबंधी जिम्मेदारियां और जोखिम का बंटवारा लगातार बेसलोड संचालन को ध्यान में रखकर तय किया गया है।

लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ने के साथ ग्रिड की जरूरतें बदल रही हैं, जबकि पुराने पीपीए ढांचे उन्हीं जरूरतों के अनुरूप नहीं बदल पाए हैं। सौर ऊर्जा बढ़ने के कारण अब दिन के समय कोयला बिजलीघरों की जरूरत कम हो रही है। इसके बावजूद इन संयंत्रों से जुड़े तय खर्च और अन्य वित्तीय भुगतान जारी रहते हैं।

उदाहरण के लिए, पहले कोई कोयला बिजलीघर दिनभर अपनी 80 फीसदी क्षमता पर चलता था। लेकिन अब सौर बिजली उत्पादन अधिक होने पर उसे दिन के समय अपना उत्पादन काफी कम करना पड़ सकता है। इसके बावजूद उनकी तय लागत का भुगतान जारी रहता है। इससे प्रति यूनिट बिजली की वास्तविक लागत बढ़ सकती है और अंततः इसका बोझ उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।

कम टैरिफ का दावा, ज्यादा भुगतान का जाल

मौजूदा नियामकीय व्यवस्था में पांच साल से अधिक अवधि वाले सभी पीपीए को ‘दीर्घकालिक’ माना जाता है। हालांकि मध्यम अवधि के अनुबंध और 25 साल के अनुबंध के बीच वित्तीय जोखिम, अनुबंध में बंधे रहने की अवधि और बिजली व्यवस्था की योजना पर पड़ने वाले असर में बड़ा अंतर होता है।

सर्वे में जवाब देने वाले आठ राज्यों में करीब-करीब पूरी क्षमता लंबे समय के पीपीए से जुड़ी हुई है। ये निवेश को निश्चितता देते हैं, लेकिन बदलती बिजली व्यवस्था में इनकी कठोरता समस्या बन सकती है। कोयला संयंत्रों का उपयोग घटने के बावजूद डिस्कॉम को भुगतान के लिए लंबे समय तक प्रतिबद्ध रहना पड़ सकता है।

रिपोर्ट में एक अहम विरोधाभास सामने आया है। पीपीए की अवधि बढ़ाने से कागज पर सालाना क्षमता शुल्क कम दिखाई दे सकता है, लेकिन लंबे समय में उपभोक्ताओं को कुल मिलाकर कहीं ज्यादा भुगतान करना पड़ सकता है।

सीएसई विश्लेषण के मुताबिक, एक मानक कोयला आधारित पीपीए की अवधि 11 साल से बढ़ाकर 25 साल करने पर वार्षिक क्षमता शुल्क कम हो सकता है। इससे 70 से 114 पैसे प्रति किलोवाट घंटा तक की बचत हो सकती है। लेकिन यह बचत एक अलग वित्तीय तस्वीर छिपाती है। तय लागत को लंबी अवधि में बढ़ाने से वार्षिक टैरिफ तो कम होता है, मगर उपभोक्ताओं का कुल भुगतान दोगुने से भी अधिक हो जाता है, क्योंकि उन्हें लंबे समय तक भुगतान के लिए प्रतिबद्ध रहना पड़ता है।

सीएसई ने आठ राज्यों में आरटीआई के जरिए 67.1 गीगावाट बिजली क्षमता से जुड़े पीपीए का अध्ययन किया। इसमें से करीब 6.1 गीगावाट क्षमता 2040 और उसके बाद तक के अनुबंधों से बंधी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, यह ऐसे समय में एक तरह का पीढ़ियों तक चलने वाला वित्तीय बंधन पैदा कर सकता है, जब भारत की बिजली व्यवस्था तेजी से बदल रही है और अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है।

सर्वे में बृहन्मुंबई इलेक्ट्रिक सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट अंडरटेकिंग (बेस्ट) ही ऐसा डिस्कॉम पाया गया, जिसके पास केवल पांच साल का पीपीए था। यह भी एक मौजूदा कोयला आधारित बिजलीघर के साथ किया गया था। इससे संकेत मिलता है कि कम अवधि के अनुबंध भी एक व्यवहारिक विकल्प हो सकते हैं।

दिन में 80 गीगावाट तक कोयला क्षमता हो सकती है अतिरिक्त

सौर बिजली उत्पादन बढ़ने के साथ दिन के समय कोयला आधारित बिजली की जरूरत घट रही है। सीएसई विश्लेषण के अनुसार, सौर उत्पादन अधिक होने के दौरान कोयले की 80 गीगावाट तक क्षमता अतिरिक्त या कम उपयोग वाली रह सकती है।

यानी देश के पास बड़ी कोयला बिजली क्षमता तो मौजूद रहेगी, लेकिन उसका पूरा उपयोग नहीं होगा। इसके बावजूद यदि डिस्कॉम को लंबे पीपीए के तहत निश्चित भुगतान करना पड़ा, तो बिजली की लागत बढ़ने का खतरा बना रहेगा।

कर्ज चुकने के बाद भी जारी रह सकता है भुगतान

रिपोर्ट के मुताबिक, आज एक नए कोयला बिजलीघर को बनाने में करीब 11.5 से 13 करोड़ रुपए प्रति मेगावाट की लागत आ सकती है। इसमें आमतौर पर 30 फीसदी इक्विटी और 70 फीसदी कर्ज के जरिए निवेश किया जाता है।

मौजूदा पीपीए मॉडल के तहत बिजली उत्पादकों को इन लागतों पर सालाना 8 से 15 फीसदी तक का तय रिटर्न मिल सकता है। इससे उपभोक्ताओं पर पड़ने वाला कुल वित्तीय बोझ संयंत्र की मूल निर्माण लागत और उचित रिटर्न से कहीं अधिक हो सकता है।

कोयला बिजली परियोजनाओं का कर्ज आमतौर पर 10 से 12 साल में चुक जाता है। लेकिन लंबे समय के पीपीए के कारण शेष अनुबंध अवधि के दौरान भी तय क्षमता भुगतान और इक्विटी पर रिटर्न जारी रह सकते हैं। सीएसई ने इसे ‘टोल-गेट प्रभाव’ बताया है, जहां मूल निवेश और उचित रिटर्न की सीमा से आगे भी लंबे समय तक भुगतान की बाध्यता बनी रह सकती है।

कोयला आपूर्ति समझौते भी बन सकते हैं जकड़न

रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि फ्यूल सप्लाई एग्रीमेंट यानी एफएसए भी एक दूसरी तरह की व्यावसायिक जकड़न पैदा कर सकते हैं।

लंबे समय के लिए कोयले की खरीद से जुड़े ये समझौते तब समस्या बन सकते हैं, जब अक्षय ऊर्जा बढ़ने के कारण कोयला बिजलीघरों का उपयोग कम होने लगे। सीएसई का कहना है कि कोयले की आपूर्ति से जुड़े समझौतों को भी पीपीए में होने वाले सुधार और बदलती बिजली जरूरतों के अनुरूप बनाना जरूरी है।

रिपोर्ट में टाटा मुंद्रा यूएमपीपी का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि प्रतिस्पर्धी बोली के जरिए हुए अनुबंधों में भी आपसी सहमति से बदलाव संभव है। सीएसई के अनुसार, यह दिखाता है कि बदलती व्यावसायिक परिस्थितियों के अनुसार पीपीए में संशोधन या पुनर्विचार एक व्यावहारिक रास्ता हो सकता है।

पीपीए में बदलाव का रास्ता अब भी खुला

सीएसई की सस्टेनेबल इंडस्ट्रियलाइजेशन यूनिट में सीनियर रिसर्च एसोसिएट कुशाग्र गोयल के मुताबिक, मौजूदा पीपीए में दक्षता और उत्सर्जन से जुड़े प्रदर्शन-आधारित मानकों का अभाव है। इससे बिजली उत्पादकों को बाजार आधारित प्रदर्शन संकेतों से काफी हद तक अलग रखा जाता है।

रिपोर्ट में पीपीए में सुधार के लिए कानूनी रास्तों, दोबारा बातचीत और अनुबंधों के पुनर्गठन की संभावनाओं पर चर्चा की गई है। साथ ही, भारत की बदलती बिजली व्यवस्था के अनुरूप आधुनिकीकृत थर्मल पीपीए ढांचा प्रस्तावित किया गया है।

क्या हैं सीएसई की प्रमुख सिफारिशें?

रिपोर्ट में थर्मल पीपीए को भारत की बदलती बिजली जरूरतों के अनुरूप बनाने के लिए कई अहम सुधार सुझाए हैं। इसके तहत मॉडल पीपीए को अपडेट कर उसमें बिजली उत्पादन की परिचालन दक्षता, उत्सर्जन की तीव्रता और सौर उत्पादन वाले तथा गैर-सौर घंटों की अलग-अलग जरूरतों को शामिल करने की सिफारिश की गई है।

साथ ही, डिस्कॉम और बिजली निगमों के लिए थर्मल अनुबंधों की नियमित समीक्षा अनिवार्य करने पर जोर दिया गया है। ताकि यह देखा जा सके कि वे बदलती बिजली जरूरतों के अनुकूल हैं या नहीं।

रिपोर्ट में स्वैच्छिक रूप से पीपीए पर दोबारा बातचीत और आपसी सहमति से अनुबंध समाप्त करने के लिए एक स्पष्ट और मानक ढांचा बनाने की भी बात कही गई है, जिसमें मुआवजा केवल वास्तविक और अभी तक न वसूली गई लागत तक सीमित हो।

इसके अलावा, सभी बिजलीघरों के लिए एक जैसे उपलब्धता मानक लागू करने के बजाय क्षमता भुगतान को बिजली व्यवस्था की वास्तविक जरूरतों से जोड़ा जाए। रिपोर्ट ने दक्ष और कम-कार्बन थर्मल बिजली उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए अनुबंधों में दक्षता और उत्सर्जन के स्पष्ट मानक तय करने तथा बेहतर प्रदर्शन करने वाले संयंत्रों को मेरिट ऑर्डर डिस्पैच या प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन देने की सिफारिश की है।

आधुनिक पीपीए का नया रोडमैप

सीएसई में सस्टेनेबल इंडस्ट्रियलाइजेशन कार्यक्रम के निदेशक निवित कुमार यादव का कहना है कि भारत की स्थिति कई अन्य देशों से अलग है, क्योंकि देश की बड़ी कोयला बिजली क्षमता सरकारी स्वामित्व वाली है और अधिकांश डिस्कॉम भी सरकारी हैं।

उनके मुताबिक, ऐसे में आपसी सहमति से अनुबंधों में बदलाव करना, उनके खत्म होने का इंतजार करने या लंबे कानूनी विवादों में फंसने की तुलना में अधिक तेज और सहयोगात्मक रास्ता हो सकता है। ऐसे सुधार भारत के ऊर्जा बदलाव को गति देने के साथ-साथ बिजली उपभोक्ताओं पर बढ़ते लंबे समय के वित्तीय बोझ को भी कम करने में मदद कर सकते हैं।

देखा जाए तो भारत के सामने चुनौती सिर्फ स्वच्छ ऊर्जा क्षमता बढ़ाने की नहीं, बल्कि उस पुरानी व्यवस्था को बदलने की भी है जो अब बदलते बिजली तंत्र के साथ कदम नहीं मिला पा रही।

सीएसई रिपोर्ट का संदेश बेहद स्पष्ट है, अगर भारत को अपनी ऊर्जा व्यवस्था को किफायती, लचीला और स्वच्छ बनाना है, तो कोयला आधारित बिजलीघरों से जुड़े लंबे और कठोर पीपीए में समय रहते सुधार करना होगा। वरना आज के अनुबंध भविष्य की बिजली व्यवस्था को बांध देंगे और ऊर्जा बदलाव की कीमत अंततः उपभोक्ताओं को चुकानी पड़ सकती है।