दुनिया के 63 देशों और क्षेत्रों ने जैव-अर्थव्यवस्था से जुड़ी नीतियां अपनाईं, जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने की उम्मीद बढ़ी।
अफ्रीका के नामीबिया, इथियोपिया और केन्या सहित लैटिन अमेरिका के कई देश जैव-अर्थव्यवस्था के विकास में तेजी से आगे बढ़े।
भारत की बायोई3 नीति और तमिलनाडु की बायोविजन 2026 पहल से जैव प्रौद्योगिकी, रोजगार और टिकाऊ विकास को नई दिशा मिली।
वैश्विक रणनीतियों में 94 फीसदी ने शोध का उल्लेख किया, लेकिन केवल 47 फीसदी ने इसके लिए अलग बजट निर्धारित किया।
विशेषज्ञों ने जैव-आधारित उद्योगों में निजी निवेश बढ़ाने, जैव विविधता बचाने और आर्थिक विकास के लाभ आम लोगों तक पहुंचाने पर जोर दिया।
आज दुनिया की ऊर्जा जरूरतों से लेकर उद्योगों में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल तक, तेल और प्राकृतिक गैस की बड़ी भूमिका है। लेकिन इन पर निर्भरता की कीमत पर्यावरण, जलवायु और जैव विविधता को चुकानी पड़ रही है। ऐसे में जैव-अर्थव्यवस्था यानी बायोइकोनॉमी एक नई उम्मीद बनकर उभर रही है। इसका मकसद पौधों, सूक्ष्मजीवों और जैविक कचरे जैसे नवीकरणीय संसाधनों का इस्तेमाल करके ऐसी अर्थव्यवस्था तैयार करना है, जिसमें विकास भी हो और प्रकृति भी सुरक्षित रहे।
इसी दिशा में तैयार ग्लोबल बायोइकोनॉमी पॉलिसी रिपोर्ट 2026 का नया संस्करण 20 अक्टूबर को आयरलैंड की राजधानी डबलिन में जारी किया गया। इंटरनेशनल एडवाइजरी काउंसिल ऑन ग्लोबल बायोइकोनॉमी (आईएसीजीबी) की इस रिपोर्ट के वैश्विक विश्लेषण में जर्मनी के बॉन विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर डेवलपमेंट रिसर्च और इंस्टीट्यूट फॉर फूड एंड रिसोर्स इकोनॉमिक्स के शोधकर्ताओं ने प्रमुख भूमिका निभाई है।
63 देशों में बढ़ रहा जैव-अर्थव्यवस्था का दायरा
रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के 63 देश और क्षेत्र अब जैव-अर्थव्यवस्था से जुड़ी नीतियां अपना चुके हैं। खास बात यह है कि विकासशील देश भी इस बदलाव में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। अफ्रीका में नामीबिया, इथियोपिया और केन्या जैसे देश नई रणनीतियों के जरिए अपनी पहचान बना रहे हैं। वहीं, लैटिन अमेरिका में ब्राजील, उरुग्वे और इक्वाडोर ने इस दिशा में कदम बढ़ाए हैं।
अब जैव-अर्थव्यवस्था केवल पर्यावरण बचाने का विचार नहीं रह गई है, बल्कि रोजगार, उद्योग, कृषि और आर्थिक विकास से भी जुड़ रही है। वर्ष 2024 में ब्राजील की जी-20 अध्यक्षता के दौरान देशों ने जैव-अर्थव्यवस्था पर 10 उच्चस्तरीय सिद्धांतों पर सहमति जताई। यह इस क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
भारत में भी तेज हो रही है तैयारी
भारत के लिए जैव-अर्थव्यवस्था के अवसर काफी व्यापक हैं। देश में कृषि अवशेष, जैविक कचरा, औषधीय पौधे और जैव प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्र नई संभावनाएं पैदा कर सकते हैं। इससे किसानों की आय बढ़ाने, नए उद्योग विकसित करने और रोजगार के अवसर पैदा करने में मदद मिल सकती है।
अगस्त 2024 में केंद्र सरकार ने बायोटेक्नोलॉजी फॉर इकोनॉमी, एनवायरनमेंट एंड एम्प्लॉयमेंट (बायोई3) नीति को मंजूरी दी थी। इसका उद्देश्य अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के बीच बेहतर तालमेल बनाना है। इसके तहत जैव-निर्माण को बढ़ावा देने और बायोफाउंड्री स्थापित करने की दिशा में भी काम शुरू हुआ।
राज्य स्तर पर भी तस्वीर बदल रही है। तेलंगाना ने 2024 में लाइफ साइंसेज विजन 2030 के जरिए इस क्षेत्र को आगे बढ़ाने की योजना बनाई। तमिलनाडु ने बायोविजन 2026 के माध्यम से अपनी जैव-अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने का प्रयास किया है। उपलब्ध अनुमानों के अनुसार, राज्य की जैव-अर्थव्यवस्था का आकार 2023 में 7.7 अरब डॉलर से बढ़कर 2025 में 12.4 अरब डॉलर हो गया। कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और अन्य राज्यों में भी जैव प्रौद्योगिकी से जुड़ी नीतिगत पहल देखने को मिली हैं।
विकास के साथ प्रकृति का संतुलन जरूरी
रिपोर्ट बताती है कि अलग-अलग देशों की प्राथमिकताएं अलग हैं। कुछ देश जैव संसाधनों के इस्तेमाल पर जोर दे रहे हैं, तो कुछ जैव प्रौद्योगिकी, पारिस्थितिकी और सामाजिक कल्याण को प्राथमिकता दे रहे हैं। सामाजिक पहलुओं पर बढ़ता ध्यान बताता है कि अब विकास के लाभ आम लोगों और स्थानीय समुदायों तक पहुंचाने की जरूरत भी समझी जा रही है।
हालांकि चुनौतियां कम नहीं हैं। दुनिया की 94 फीसदी रणनीतियों में सार्वजनिक शोध और विकास का जिक्र है, लेकिन केवल 47 फीसदी में इसके लिए अलग बजट का प्रावधान है। यानी योजनाएं बनाने और उन्हें जमीन पर उतारने के बीच अभी बड़ी दूरी है।
निवेश और जवाबदेही पर देना होगा जोर
विशेषज्ञों का मानना है कि जैव-अर्थव्यवस्था को सफल बनाने के लिए सरकारों के साथ निजी क्षेत्र को भी निवेश करना होगा। बॉन विश्वविद्यालय के शोधकर्ता डॉ. गिडियन टुप्स के अनुसार, जैव-आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए निजी पूंजी जुटाना और जवाबदेही मजबूत करना जरूरी है।
आज दुनिया के सामने चुनौती केवल आर्थिक विकास की नहीं, बल्कि धरती के भविष्य को सुरक्षित रखने की भी है। जैव-अर्थव्यवस्था इस चुनौती का एक महत्वपूर्ण समाधान बन सकती है। लेकिन इसकी असली सफलता तभी होगी, जब नई तकनीक और उद्योगों से कमाई के साथ जंगल, मिट्टी, जलवायु और जैव विविधता की रक्षा भी सुनिश्चित हो।