मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ने ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले रसायनों के इस्तेमाल को कम करने में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। फोटो साभार: आईस्टॉक
जलवायु

विश्व ओजोन दिवस: धरती की सुरक्षा के लिए मिलकर कदम बढ़ाने की जरूरत

ओजोन परत की सुरक्षा से जुड़ी वैश्विक पहल, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की सफलता, भारत के प्रयास और टिकाऊ कूलिंग से पर्यावरण संरक्षण की नई उम्मीद।

Dayanidhi

  • विश्व ओजोन दिवस हर साल 16 सितंबर को मनाया जाता है और ओजोन परत की सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाता है।

  • ओजोन परत सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से मानव स्वास्थ्य, फसलों, समुद्री जीवन और पर्यावरण की रक्षा करती है।

  • मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ने ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले रसायनों के इस्तेमाल को कम करने में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है।

  • भारत ने ओजोन संरक्षण के लिए सीएफसी जैसे हानिकारक रसायनों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।

  • टिकाऊ कूलिंग, ऊर्जा दक्ष उपकरण और पर्यावरण अनुकूल तकनीक अपनाकर जलवायु परिवर्तन तथा प्रदूषण से निपटने में मदद मिल सकती है।

हर साल 16 सितंबर को विश्व ओजोन दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमें ओजोन परत के महत्व और इसे बचाने की जरूरत की याद दिलाता है। ओजोन परत धरती के चारों ओर मौजूद एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच है, जो सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से जीवन की रक्षा करती है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना और ओजोन परत को बचाने के लिए किए जा रहे प्रयासों को मजबूत करना है।

ओजोन परत क्यों जरूरी है?

ओजोन परत वायुमंडल के समताप मंडल में स्थित है। यह सूर्य से आने वाली हानिकारक यूवी-बी किरणों का बड़ा हिस्सा रोक लेती है। अगर ये किरणें सीधे धरती तक पहुंचें तो मनुष्यों में त्वचा कैंसर, आंखों की बीमारी और रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।

ओजोन परत केवल इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि पेड़-पौधों, फसलों, समुद्री जीवों और पूरे पर्यावरण के लिए जरूरी है। अधिक पराबैंगनी विकिरण से फसलों और समुद्री जीवन को भी नुकसान पहुंच सकता है।

इंसानी गतिविधियों से हुआ नुकसान

ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने में मानवजनित गतिविधियों की बड़ी भूमिका रही है। रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर, एयरोसोल और आग बुझाने वाले उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले कुछ रसायनों ने ओजोन परत को गंभीर नुकसान पहुंचाया। इनमें क्लोरोफ्लोरोकार्बन यानी सीएफसी, हैलोन और कुछ अन्य रसायन प्रमुख हैं।

जब ये रसायन वायुमंडल की ऊपरी परत तक पहुंचते हैं तो सूर्य की किरणों के प्रभाव से क्लोरीन और ब्रोमीन जैसे तत्व निकलते हैं। ये तत्व ओजोन अणुओं को लगातार नष्ट करते हैं। इसका असर केवल वायुमंडल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका प्रभाव मानव स्वास्थ्य, खेती और समुद्री पारिस्थितिकी पर भी पड़ता है।

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल से मिली उम्मीद

ओजोन परत की सुरक्षा के क्षेत्र में दुनिया ने एक बड़ी सफलता हासिल की है। साल 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर सहमति बनी। इसके तहत ओजोन को नुकसान पहुंचाने वाले रसायनों के उत्पादन और इस्तेमाल को धीरे-धीरे कम किया गया। इस अंतरराष्ट्रीय समझौते के कारण ऐसे लगभग 99 प्रतिशत नियंत्रित पदार्थों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जा चुका है।

वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, अगर मौजूदा प्रयास जारी रहे तो ओजोन परत के 2040 के आसपास वैश्विक स्तर पर पुराने स्वरूप में लौटने की उम्मीद है। अंटार्कटिका के ऊपर इसकी पूरी बहाली में अधिक समय लग सकता है। यह उपलब्धि बताती है कि दुनिया के देश विज्ञान और आपसी सहयोग के साथ किसी बड़े पर्यावरण संकट से निपट सकते हैं।

भारत की महत्वपूर्ण भूमिका

भारत भी ओजोन परत की सुरक्षा के प्रयासों में अहम भूमिका निभा रहा है। देश ने 2008 में सीएफसी के उत्पादन को समाप्त किया और बाद में इनके इस्तेमाल को भी कम किया। कार्बन टेट्राक्लोराइड और हैलोन जैसे पदार्थों के उत्पादन और उपयोग को भी चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया गया।

भारत ने 2019 में इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान शुरू किया। इसका उद्देश्य देश में बढ़ती कूलिंग जरूरतों को पूरा करते हुए ऊर्जा की खपत और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को कम करना है। इसमें ऊर्जा-कुशल उपकरणों, बेहतर तकनीक और पर्यावरण के अनुकूल रेफ्रिजरेंट को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है।

टिकाऊ कूलिंग की जरूरत

आज एयर कंडीशनर और रेफ्रिजरेटर हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन इन उपकरणों में इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा और कुछ रेफ्रिजरेंट जलवायु परिवर्तन को बढ़ा सकते हैं। इसलिए अब ऐसी तकनीक की जरूरत है जो कम ऊर्जा खर्च करे और कम ग्लोबल वार्मिंग क्षमता वाले रेफ्रिजरेंट का इस्तेमाल करे।

इमारतों में प्राकृतिक हवा और छायादार डिजाइन को बढ़ावा देना, पुराने उपकरणों का सही तरीके से निपटान करना और रेफ्रिजरेंट के रिसाव को रोकना भी जरूरी है। प्रशिक्षित तकनीशियन और बेहतर प्रबंधन इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

पर्यावरण संरक्षण सबकी जिम्मेदारी

ओजोन परत की सुरक्षा हमें यह सिखाती है कि पर्यावरण की रक्षा केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है। उद्योगों, वैज्ञानिकों, तकनीशियनों और आम लोगों को भी इसमें योगदान देना होगा। ऊर्जा-कुशल उपकरणों का इस्तेमाल, पुराने इलेक्ट्रॉनिक और कूलिंग उपकरणों का सही निपटान, पेड़ लगाना और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना ऐसे कदम हैं जिनसे पर्यावरण को लाभ मिल सकता है।

ओजोन परत की धीरे-धीरे हो रही बहाली दुनिया के लिए उम्मीद की किरण है। यह साबित करती है कि जब देश मिलकर विज्ञान आधारित फैसले लेते हैं तो पर्यावरण को हुए नुकसान को कम किया जा सकता है। विश्व ओजोन दिवस हमें इसी सहयोग की भावना को जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और अन्य पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए आगे बढ़ाने का संदेश देता है।

धरती और उसके वायुमंडल की रक्षा किसी एक देश की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की साझा जिम्मेदारी है। आज उठाया गया एक छोटा कदम आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य की नींव बन सकता है।