जंगल गर्म और शुष्क मौसम में धीमे बढ़ रहे हैं, जिससे कार्बन सोखने की क्षमता घटने और जलवायु परिवर्तन तेज होने की आशंका है। फोटो साभार: आईस्टॉक
जलवायु

गर्म जलवायु में धीमी हो रही पेड़ों की वृद्धि, कार्बन जमा करने में 30 फीसदी की कमी के आसार

गर्मी बढ़ने से जंगलों की वृद्धि धीमी, कार्बन सोखने की क्षमता घटने का खतरा, नए अध्ययन में मौजूदा जलवायु मॉडल पर गंभीर सवाल उठे

Dayanidhi

  • जंगल गर्म और शुष्क मौसम में धीमे बढ़ रहे हैं, जिससे कार्बन सोखने की क्षमता घटने और जलवायु परिवर्तन तेज होने की आशंका।

  • नए अध्ययन में पाया गया कि जलवायु मॉडल जंगलों की कार्बन भंडारण क्षमता को लगभग तीस प्रतिशत तक अधिक आकलित कर रहे हैं।

  • पेड़ों में पानी का दबाव कम होने से कोशिका वृद्धि रुकती है, जिससे प्रकाश संश्लेषण होने पर भी वास्तविक वृद्धि धीमी हो जाती है।

  • स्विट्जरलैंड के आठ साल के जंगल के आंकड़ों से पता चला कि चौड़ी और शंकुधारी दोनों प्रकार के पेड़ों की वृद्धि प्रभावित हुई है।

  • विशेषज्ञों का कहना है कि मॉडल और वास्तविक पर्यावरणीय आंकड़ों के बीच अंतर कम करना जरूरी है, ताकि भविष्य की जलवायु भविष्यवाणी सही हो।

पेड़ और जंगल पृथ्वी के लिए एक प्राकृतिक “कार्बन सिंक” की तरह काम करते हैं। वे वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) सोखकर जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करते हैं। लेकिन हाल ही में सामने आए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने चिंता बढ़ा दी है।

अध्ययन के अनुसार, बढ़ते तापमान और शुष्क मौसम के कारण जंगलों की वृद्धि धीमी हो रही है, जिससे उनकी कार्बन सोखने की क्षमता भी कम हो सकती है। यह अध्ययन वैज्ञानिक पत्रिका जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित हुआ है।

क्या कहता है नया अध्ययन

इस शोध में पाया गया कि मौजूदा जलवायु मॉडल जंगलों की कार्बन भंडारण क्षमता को वास्तविकता से अधिक दिखा रहे हैं। अध्ययन के अनुसार, भविष्य में जंगल जितना कार्बन सोख पाएंगे, मॉडल उससे लगभग 30 फीसदी अधिक अनुमान लगा रहे हैं।

अध्ययन में अध्ययनकर्ता के हवाले से कहा गया है कि जैसे-जैसे वातावरण गर्म और शुष्क हो रहा है, पेड़ों की वृद्धि उतनी तेज नहीं रह पा रही जितनी मॉडल मानते हैं। इसका मतलब यह है कि पेड़ सीओ2 को सोख तो रहे हैं, लेकिन उसे लकड़ी और बायोमास में बदलने की प्रक्रिया धीमी हो रही है।

मॉडल और समस्या

अब तक अधिकांश जलवायु मॉडल यह मानते थे कि यदि पेड़ प्रकाश संश्लेषण कर रहे हैं, तो वे उसी अनुपात में बढ़ भी रहे हैं। लेकिन नया शोध इस धारणा को चुनौती देता है।

शोध बताता है कि गर्म और सूखे मौसम में पेड़ों के अंदर पानी का दबाव कम हो जाता है। इससे कोशिकाओं की वृद्धि रुक जाती है, और पेड़ ठीक से बढ़ नहीं पाते। इसका मतलब यह है कि पेड़ सीओ2 लेते रहते हैं, लेकिन उसका उपयोग विकास में नहीं कर पाते।

कैसे किया गया अध्ययन

इस अध्ययन में स्विट्जरलैंड के जंगलों से प्राप्त आठ साल के आंकड़ों का उपयोग किया गया। इसमें चौड़ी पत्ती वाले और शंकुधारी पेड़ों की वृद्धि का विश्लेषण किया गया।

इसके बाद शोधकर्ताओं ने एक सांख्यिकीय मॉडल तैयार किया और उसकी तुलना मौजूदा जलवायु मॉडल से की। परिणाम चौंकाने वाले थे, मॉडल ने चौड़ी पत्ती वाले पेड़ों की वृद्धि को लगभग दो गुना और शंकुधारी पेड़ों की वृद्धि को तीन गुना अधिक दिखाया।

इसका असर क्या होगा

आज के समय में भूमि (जमीन और जंगल) लगभग 27 फीसदी सीओ2 को सोखती है, जबकि समुद्र लगभग 25 फीसदी सीओ2 को अवशोषित करता है। बाकी सीओ2वातावरण में रहकर गर्मी बढ़ाता है।

यदि जंगलों की वृद्धि धीमी हो जाती है, तो वे कम कार्बन सोख पाएंगे। इसका सीधा असर यह होगा कि वातावरण में सीओ2 की मात्रा बढ़ेगी और जलवायु परिवर्तन तेज हो सकता है।

इसका प्रभाव विशेष रूप से उन क्षेत्रों में अधिक होगा जहां भविष्य में मौसम अधिक गर्म और सूखा होने की संभावना है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि वर्तमान मॉडल प्रकृति की वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं दर्शा रहे हैं। जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा, प्रकृति के लिए वातावरण से कार्बन हटाना और कठिन होता जाएगा।

अध्ययन में कहा गया है कि पारिस्थितिकी और जलवायु मॉडलिंग के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत है, ताकि वास्तविक आंकड़ों को मॉडल में शामिल किया जा सके।

आगे की दिशा

शोधकर्ताओं का मानना है कि भविष्य के जलवायु मॉडल में पेड़ों की वृद्धि को प्रभावित करने वाले नए कारकों को शामिल करना जरूरी है। विशेष रूप से यह समझना महत्वपूर्ण है कि प्रकाश संश्लेषण और वास्तविक वृद्धि हमेशा समान नहीं होते।

शोधकर्ताओं का लक्ष्य है कि इस नए ज्ञान को कंप्यूटर कोड में शामिल किया जाए, ताकि मॉडल अधिक सटीक बन सकें और भविष्य की जलवायु भविष्यवाणी बेहतर हो सके।

यह अध्ययन बताता है कि जंगल अब भी कार्बन सोखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन गर्म होती पृथ्वी उनकी क्षमता को कमजोर कर सकती है। यदि मौजूदा मॉडल इस बदलाव को सही तरह नहीं दर्शाते, तो भविष्य की जलवायु योजनाएं और नीतियां अपेक्षा से कम प्रभावी साबित हो सकती हैं।