हिमालय में बढ़ा हिमस्खलन का खतरा, 2000 के बाद घटनाओं में तेजी, जलवायु परिवर्तन से ग्लेशियरों की अस्थिरता बढ़ने की आशंका।
137 हिमस्खलन घटनाओं का अध्ययन, दक्षिणी, दक्षिण-पूर्वी और उत्तर-पश्चिमी हिमालय में सबसे ज्यादा घटनाएं दर्ज, उत्तरी क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम मामले।
करीब 70 फीसदी हिमस्खलनों से जुड़े दूसरे खतरे, मलबे का बहाव, अचानक बाढ़ और ग्लेशियर झीलों के फटने की घटनाएं।
चमोली और सिक्किम हादसों ने दिखाई तबाही, हिमस्खलन और ग्लेशियर झीलों से आई बाढ़ ने जान-माल और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया।
वैज्ञानिकों ने मजबूत निगरानी प्रणाली पर दिया जोर, उपग्रहों, जमीनी उपकरणों और स्थानीय समुदायों की मदद से समय पर चेतावनी देने की जरूरत।
हिमालय की ऊंची चोटियां अपनी खूबसूरती और बर्फ की सफेद चादर के लिए जानी जाती हैं। लेकिन इसी बर्फीली दुनिया के भीतर एक बड़ा खतरा तेजी से सिर उठा रहा है। पहाड़ों पर जमी बर्फ और ग्लेशियरों के बड़े हिस्से टूटकर नीचे गिर रहे हैं। इन हिमस्खलनों की चपेट में आने वाली बस्तियों, सड़कों, नदियों और जलविद्युत परियोजनाओं के लिए खतरा बढ़ता जा रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन और तेजी से बढ़ते तापमान के बीच हिमालयी क्षेत्रों में ऐसी घटनाओं पर गंभीरता से नजर रखने की जरूरत है।
नेपाल और चीन के शोधकर्ताओं की एक टीम ने उच्च पर्वतीय एशिया यानी हाई माउंटेन एशिया (एचएमए) में वर्ष 1900 से 2024 तक हुई 137 हिमस्खलन की घटनाओं का अध्ययन किया है। यह अध्ययन शोध पत्रों, तकनीकी रिपोर्टों और समाचारों में दर्ज घटनाओं के आधार पर तैयार किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि इन घटनाओं की संख्या और उनका आकार, दोनों बढ़ने के संकेत दे रहे हैं।
यह शोध नेपाल की लुम्बिनी बौद्ध यूनिवर्सिटी, अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (आईसीआईएमओडी) और चीन की विज्ञान अकादमी के शोधकर्ताओं के द्वारा किया गया है। इसे 24 अक्टूबर को पत्रिका अर्थ-साइंस रिव्यूज में प्रकाशित किया गया है।
दक्षिणी हिमालय में ज्यादा घटनाएं
शोध के मुताबिक, हिमस्खलन की घटनाएं मुख्य रूप से एचएमए के दक्षिणी, दक्षिण-पूर्वी और उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में केंद्रित हैं। इसके मुकाबले उत्तरी क्षेत्रों में ऐसी घटनाएं अपेक्षाकृत कम दर्ज की गई हैं।
इस अंतर की एक बड़ी वजह क्षेत्रीय जलवायु और ग्लेशियरों की स्थिति है। हिमालय के दक्षिणी हिस्सों में नमी और बारिश अधिक है। यहां बड़े और सक्रिय ग्लेशियर भी मौजूद हैं। वहीं, उत्तरी पर्वतीय क्षेत्र ज्यादा ठंडे और शुष्क हैं, जहां ग्लेशियरों का फैलाव सीमित है।
ऊंची और खड़ी ढलानों पर लटके हुए ग्लेशियर विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं। इनका कोई हिस्सा टूटकर गिरता है तो बर्फ के साथ चट्टानें और मलबा भी तेजी से नीचे आ सकता है। ऐसी घटनाएं कुछ ही समय में बड़े इलाके को प्रभावित कर सकती हैं।
साल 2000 के बाद तेजी से बढ़ीं घटनाएं
शोध में एक अहम बदलाव वर्ष 2000 के आसपास देखने को मिला। इससे पहले हिमस्खलन की घटनाएं धीरे-धीरे बढ़ रही थीं। अध्ययन के अनुसार, इस दौरान वृद्धि की औसत दर करीब 0.01 घटना प्रति वर्ष थी। लेकिन वर्ष 2000 के बाद यह दर बढ़कर लगभग 0.10 घटना प्रति वर्ष हो गई।
यानी घटनाओं में बढ़ोतरी की रफ्तार पहले के मुकाबले काफी तेज हो गई। शोधकर्ताओं ने इसे तेजी से बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों से जुड़ी ढलानों की अस्थिरता के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया है। अध्ययन यह भी बताता है कि वर्ष 1900 के बाद से बड़ी हिमस्खलन घटनाओं का आकार लगातार बढ़ा है और बड़े हादसे ज्यादा देखने को मिले हैं।
एक हादसा, कई मुसीबतें
हिमस्खलन का खतरा केवल बर्फ और चट्टानों के गिरने तक सीमित नहीं रहता। इसके बाद मलबे का बहाव, अचानक बाढ़ और ग्लेशियर झीलों के फटने जैसी घटनाएं भी हो सकती हैं। अध्ययन में शामिल 137 घटनाओं में से करीब 70 प्रतिशत के साथ इस तरह के दूसरे खतरे भी जुड़े थे।
फरवरी 2021 में उत्तराखंड के चमोली में हुआ हादसा इसकी गंभीरता दिखाता है। यहां बड़े पैमाने पर बर्फ और चट्टानों का मलबा तेजी से घाटी में उतरा। इससे तेज बहाव वाले मलबे और बाढ़ की स्थिति पैदा हुई। इस आपदा में 200 से अधिक लोगों की जान गई और कई जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान पहुंचा।
इसी तरह, अक्टूबर 2023 में सिक्किम में हिमस्खलन और भूस्खलन का मलबा एक ग्लेशियर झील में पहुंचा। इसके बाद ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) यानी ग्लेशियर झील से अचानक पानी निकलने की घटना हुई। इससे इमारतों, पुलों और खेतों को व्यापक नुकसान पहुंचा।
चेतावनी प्रणाली मजबूत करने की जरूरत
शोधकर्ताओं के मुताबिक, इन घटनाओं के पीछे मौसम और जलवायु से जुड़े कारण सबसे अधिक सामने आते हैं। ग्लेशियरों की स्थिति, भूकंप और चट्टानों का गिरना भी हिमस्खलन को प्रभावित कर सकते हैं। पहाड़ों की बनावट और भूगर्भीय स्थितियां लंबे समय से ढलानों को कमजोर बनाने में भूमिका निभाती हैं।
हालांकि खतरे की निगरानी और समय रहते चेतावनी देने की व्यवस्थाओं में अभी कई कमियां हैं। दुर्गम पहाड़, सीमित संसाधन, कमजोर बुनियादी ढांचा और विभिन्न संस्थाओं के बीच तालमेल की कमी बड़ी चुनौतियां हैं। स्थानीय लोगों के अनुभव और पारंपरिक ज्ञान का भी पर्याप्त इस्तेमाल नहीं हो पाता।
शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि उपग्रहों, विमानों और जमीन पर लगे उपकरणों की मदद से ग्लेशियरों की लगातार निगरानी की जाए। साथ ही, हिमस्खलन, बाढ़ और मलबे के बहाव जैसे खतरों का एक साथ आकलन करने की व्यवस्था विकसित हो। समय पर चेतावनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप हो और उसके बाद लोगों को सुरक्षित निकालने की तैयारी भी रहे।
हिमालय में बदलते हालात का संदेश साफ है। पहाड़ों की निगरानी, वैज्ञानिक तैयारी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी अब पहले से कहीं ज्यादा जरूरी है। समय रहते उठाए गए कदम ही इन बर्फीली आपदाओं के बीच लोगों की जान और आजीविका बचाने में मदद कर सकते हैं।