तापमान वृद्धि: पर्वतीय क्षेत्रों का तापमान आसपास के मैदानी इलाकों की तुलना में औसतन 0.21 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक तेजी से बढ़ रहा है। प्रतीकात्मक छवि, फोटो साभार: आईस्टॉक
जलवायु

तेजी से बढ़ रहा है पर्वतीय इलाकों में तापमान, अरबों लोगों के लिए बन सकता है खतरे का सबब

अध्ययन में कहा गया है कि पर्वतीय इलाके तेजी से गर्म हो रहे हैं, बर्फबारी में कमी आ रही है और बारिश के पैटर्न में असमानता दिखाई दे रही है

Dayanidhi

  • तापमान वृद्धि: पर्वतीय क्षेत्रों का तापमान आसपास के मैदानी इलाकों की तुलना में औसतन 0.21 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक तेजी से बढ़ रहा है।

  • वर्षा का अस्थिर होना: पर्वतीय इलाकों में बारिश असमान और अनियमित हो रही है, जिससे बाढ़ और सूखे जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ रहा है।

  • बर्फबारी में कमी: गर्म होने के कारण बारिश के रूप में अधिक बारिश होती है, जिससे हिमपात घट रहा और ग्लेशियर पिघल रहे हैं।

  • जल संकट: दुनिया भर में एक अरब से अधिक लोग पर्वतीय बर्फ और ग्लेशियर से मिलने वाले पानी पर निर्भर हैं, जल संकट बढ़ रहा है।

  • पारिस्थितिकी बदलाव: भारी ऊंचाई पर पौधे और जानवर ठंडी जगह खोजने के लिए ऊपर जा रहे हैं, जिससे कई प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं।

जलवायु परिवर्तन एक गंभीर चुनौती बन चुका है। खासकर पर्वतीय क्षेत्रों में यह परिवर्तन और भी तेजी से हो रहा है। हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में यह पाया गया कि पर्वतीय इलाकों का तापमान आसपास के मैदानी इलाकों की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस असमान रूप से गर्म होना अरबों लोगों के लिए खतरा बन सकता है, जो पर्वतीय क्षेत्रों पर निर्भर हैं।

यह अध्ययन नेचर रिव्यु अर्थ एंड एनवायरमेंट में प्रकाशित हुआ है, जो ऊंचाई पर निर्भर जलवायु परिवर्तन (ईडीसीसी) को समझाता है। इसका मतलब है कि जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती है, पर्यावरणीय बदलाव भी तेजी से होते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह प्रभाव दुनिया के पर्वतीय क्षेत्रों में जलवायु को पूरी तरह से बदल रहा है

वैश्विक विश्लेषण: पर्वतों में जलवायु परिवर्तन

अध्ययन में दुनिया के प्रमुख पर्वत श्रृंखलाओं जैसे रॉकी माउंटेंस, आल्प्स, एंडीज और तिब्बत पठार पर तापमान, बारिश और हिमपात में हो रहे बदलावों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं की टीम ने वैश्विक जलवायु आंकड़े और कई केस स्टडी का उपयोग किया।

तेज गर्म होना और हिमपात में बदलाव

1980 से 2020 तक के आंकड़ों से यह सामने आया कि पर्वतीय इलाकों का तापमान आसपास के क्षेत्रों की तुलना में औसतन 0.21 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक तेजी से बढ़ा। बारिश के पैटर्न अस्थिर हो रहे हैं और अधिक गर्म मौसम के कारण बर्फ की बजाय बारिश होने लगी है।

शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि पर्वत और आर्कटिक क्षेत्रों में समान रूप से तेजी से बदलाव हो रहे हैं। दोनों क्षेत्रों में बर्फ और ग्लेशियर तेजी से घट रहे हैं और पारिस्थितिकी प्रणालियों में गहरा बदलाव आ रहा है

अरबों लोगों के लिए खतरा

पर्वतीय ग्लेशियर और बर्फ से बहने वाला पानी दुनिया में एक अरब से अधिक लोगों के लिए जीवनदायिनी स्रोत है। विशेषकर हिमालय क्षेत्र, चीन और भारत के बड़े हिस्सों में पानी की आपूर्ति का मुख्य स्रोत है। शोध के अनुसार, गर्मी बढ़ने से हिमालय की बर्फ तेजी से घट रही है। जब बर्फ की बजाय बारिश होती है, तो बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है और आपदाएं अधिक गंभीर हो सकती हैं।

पर्वतीय पारिस्थितिकी पर प्रभाव

पर्वतों में बढ़ते तापमान के कारण पौधे और जानवर ऊंचाई की ओर चले जा रहे हैं, ताकि ठंडी जगह मिल सके। लेकिन जब वे ऊंचाई की सीमा तक पहुंच जाते हैं, तो उनके पास और कोई विकल्प नहीं होता। इससे कई प्रजातियों का विलुप्त होने के आसार हैं और पारिस्थितिकी प्रणाली में बदलाव आ सकता है।

प्राकृतिक आपदाएं और बढ़ते खतरे

हाल ही में एशिया के कुछ हिस्सों में आई घातक बाढ़ ने यह साबित कर दिया कि पर्वतीय क्षेत्रों में चरम मौसमीय घटनाएं बढ़ रही हैं। भारी बारिश और बादलों की अचानक बरसात ने जीवन और संपत्ति दोनों के लिए गंभीर खतरा पैदा किया।

शोध और भविष्य की चुनौतियां

यह अध्ययन पिछले दशकों के शोध पर आधारित है। 2015 में प्रकाशित एक अध्ययन में पहली बार स्पष्ट रूप से दिखाया गया था कि पर्वतों में तापमान अधिक तेजी से बढ़ रहा है। इसके पीछे कई कारण हैं:

फिर भी, पर्वतीय जलवायु परिवर्तन की पूरी तस्वीर समझना मुश्किल है। एक बड़ी चुनौती है ऊंचाई वाले क्षेत्रों में लंबी अवधि के आंकड़े न होना। पर्वत कठिन और दूरदराज इलाके हैं, इसलिए मौसम और जलवायु स्टेशन बनाए रखना कठिन है।

पर्वतीय क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन तेजी से हो रहा है और इसके प्रभाव दुनिया भर के लोगों और पर्यावरण पर पड़ रहे हैं। ग्लेशियर और बर्फ की कमी, पानी की आपूर्ति में कमी, बाढ़ का खतरा, और पारिस्थितिकी में बदलाव जैसे गंभीर परिणाम सामने आ रहे हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए बेहतर निगरानी, सटीक डेटा और उच्च-स्तरीय जलवायु मॉडलिंग की आवश्यकता है।

जलवायु परिवर्तन केवल पर्वतों का ही मुद्दा नहीं है, यह पूरे ग्रह की चुनौती है। अगर हम इसे समय रहते नहीं समझेंगे और उपाय नहीं करेंगे, तो इसके परिणाम अनिश्चित और घातक हो सकते हैं।